धर्म कहता है, बुरे वक़्त पर मरे तो परिवार के पांच लोग और मरेंगे! – 2 जनवरी 13

दुख

अम्मा जी की मृत्यु से लेकर अब तक का समय बहुत तनावपूर्ण रहा। ज़ाहिर है अंदर बहुत-सी भावनाएं जमा थीं जिनके बारे में मैंने लिखा भी है। इसके अलावा बाहर से भी लोगों ने भांति-भांति की भावनाएं व्यक्त की। उनमें बहुत-सी बातें ऐसी थी जो सोचने को विवश करें, मैंने उन बातों को नोट कर लिया ताकि जब भी समय मिले मैं अपनी डायरी में उन बातों को विस्तार से रख सकूं। लिखने को बहुत सी चीज़ें हैं क्योंकि मृत्यु जीवन के सबसे बड़े चमत्कारों में से एक है और लोग हमेशा इसके इर्द-गिर्द कहानियां बुनते रहे हैं, धर्म ने उन कहानियों को अपना तड़का लगाकर पेश किया है और इस तरह से रीतियां और प्रथाएं गढ़ी गई हैं। आज मैं एक और ऐसी ही हिन्दू अवधारणा के बारे में लिखना चाहता हूं जो उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जिनके किसी परिजन की मृत्यु हो जाती है: पंचक

पहले यह बताता हूं कि पंचक होता क्या है. हिन्दू कैलेंडर में सब कुछ चांद की अवस्था के अनुसार होता है। अपने पूरे चक्र में चांद सभी राशि चिह्नों से होकर गुज़रता है और अंत में यह कुम्भ और मीन राशि से होकर जाता है। एक राशि चिह्न पर चांद लगभग ढाई दिनों तक ठहरता है, कभी-कभार उससे थोड़ा कम भी। पंचक की अवधि वह होती है जब चांद कुम्भ और मीन राशि पर ठहरा होता है, यानी लगभग पांच दिन लंबी अवधि जो हर महीने होती है।

हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, अगर कोई पंचक की अवधि के दौरान यानी उन पांच दिनों में मरता है, तो इसका अर्थ है दुर्भाग्यों का तांता लगने वाला है। दुर्भाग्य की अति तो यह है कि असल में ऐसा होने पर उसी परिवार के पांच और लोग काल के गाल में समा जाएंगे। मौत के काल से बचने का एक ही उपाय है कि परिवार द्वारा एक विशेष तरह का आयोजन किया जाए।

अम्मा जी के दाह-संस्कार पर किसी ने हमसे पूछा कि क्या हमने इस बात की जांच की है कि कहीं अम्मा जी का निधन पंचक की अवधि के दौरान तो नहीं हुई। मैंने कहा कि हम इन सब में विश्वास नहीं करते और हमें यह जांचने की कोई आवश्यकता नहीं है। यहां तक कि अगर हमें पता चलता कि उनका निधन उसी अवधि में हुआ तो भी हमारे लिए इसका कोई अर्थ नहीं रहेगा, न ही हम स्वयं को बचाने के लिए कोई कर्म-कांड शुरू करेंगे।

यह सच है कि हमारे लिए इसका कोई अर्थ नहीं है लेकिन स्पष्ट रूप से यह धार्मिक आस्था वाले कई लोगों के लिए बहुत महत्व रखता है। वे घबरा जाते हैं, डर जाते हैं और इस भय से दबकर एक और कर्म-कांड करने पर विवश हो जाते हैं। बीते दिनों में कई लोगों ने मुझसे कहा कि मैं धर्म को नकारात्मक नज़रिए से देखता हूं। कृपया मुझे बताइए, कि क्या पंचक किसी परिजन की मौत के कारण पहले से ही दुखी परिवार को बिना मतलब ही एक और मुसीबत में नहीं डालता। एक परिवार ने अपना एक सदस्य खो दिया है, वे सब दुखी हैं, शोक-संतप्त हैं और ठीक उसी समय आप उन्हें कहते हैं कि आपके परिवार के पांच और सदस्यों की मृत्यु होगी! यह अपने आप में कितना निष्ठुर और क्रूर है? मेरे लिए, यह केवल एक और साक्ष्य ही है कि धर्म का व्यवसाय लोगों में भय बैठाकर ही चलता है।

छोटे परिवारों में क्या होता है? जहां केवल एक परिवार में केवल तीन सदस्य बचे हों? क्या वे सभी मर जाएंगे? एक पूरा परिवार समूल नष्ट हो जाएगा केवल इस कारण कि उसके एक सदस्य की मृत्यु का समय सही नहीं था? यह प्रथा बेतुकी और निरर्थक है जिसे बड़े आराम से सिद्ध किया जा सकता है कि उन लोगों का कुछ नहीं होता जिन्हें पंचक के तथाकथित सिद्धांत के बारे में कुछ पता ही नहीं है। उनके परिवार में कोई नहीं मरता – या फिर शायद यह केवल हिन्दु परिवारों पर लागू होता है?

इस धार्मिक अंधविश्वास के बारे में जब हमें याद दिलाया गया तो हमारा विश्वास और मज़बूत ही हुआ कि हम इस दाह-संस्कार को किसी कर्म-कांड से नहीं जोड़ने वाले। केवल अपना दुख, अपना शोक प्रकट करेंगे और अम्मा जी को सप्रेम अपने दिल में अपनी स्मृतियों में बनाए रखेंगे।

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