अम्माजी के बगैर एक साल- 10 दिसंबर 2013

दुख

आज अम्माजी के देहांत की पहली बरसी है। एक साल हो गया मगर उस रात और उस दिन को हम इस तरह याद करते हैं जैसे कल ही की बात हो। पूरा एक साल बीत गया लेकिन एक दिन भी ऐसा नहीं गुज़रा जब हमने उन्हें याद न किया हो, उनकी कमी महसूस न की हो।

बहुत दिनों तक उनके जाने का दर्द इतना सघन था कि हम उनकी कोई तस्वीर नहीं लगा सके। मुझे कंप्यूटर पर उनके चित्रों को देखना भी गवारा नहीं था, खासकर जब अपरा आसपास होती थी। अपरा बेतरह उनकी कमी महसूस करती थी और हम देखते थे कि जब भी वह उनकी कोई तस्वीर देखती है तो उदास हो जाती थी। उसका छोटा सा दिल यह समझ पाने में असमर्थ था कि क्यों अम्माजी अब उसके साथ नहीं रहतीं। आखिरकार इस दीवाली पर हमने उनका एक बड़ा-सा चित्र बनवाया और बब्बाजी के कमरे में एक दीवार पर टांग दिया।

बब्बाजी बताते हैं कि आजकल वे उस फोटो की तरफ देखते हुए अम्माजी से ‘सुप्रभात’ और ‘शुभरात्रि’ कहते हैं। उनके बिस्तर पर अम्माजी का स्थान खाली पड़ा रहता है और हम लोग अम्माजी से उनके वियोग की कल्पना करते रहते हैं, जिनके साथ उन्होंने प्रेम-प्लावित पचास वर्ष व्यतीत किए थे।

10 दिसंबर 2012 के बाद हम सभी के जीवन पूरी तरह बदल चुके हैं। पूरे आश्रम में तब्दीली आ गई है। रसोई उनका साम्राज्य था, जिसने अपनी साम्राज्ञी को खो दिया है। ज़्यादातर हमारे कर्मचारी वही हैं और उन्हीं के द्वारा प्रशिक्षित हैं लेकिन फिर भी हम यह नोटिस करते रहते हैं कि अब रोज़मर्रा के काम उतनी सहजता और निर्विघ्नता से पूरे नहीं होते। सब कुछ उसी तरह चल रहा है, कुछ भी रुकता नहीं है, मगर अब वे दो हाथ अनुपस्थित हैं। भोजन स्वादिष्ट है मगर उसमें अम्माजी का प्रेम नहीं है।

अब वही आस्वाद मिलना मुश्किल है और इसलिए उनके प्रेम-पगे व्यंजनों को याद करते हुए, उनके खास व्यंजनों को सगर्व ग्रहण करते हुए अनायास आँखों में पानी भर आता है। लेकिन हम अब भी नए से नए व्यंजन बनाने की कोशिश करते रहते हैं, तरह-तरह से मसालों को मिलाकर प्रयोग करते हैं और सोचते हैं कि काश आज हमें ऐसा करते हुए देखने के लिए वह हमारे पास होतीं। कैसे वह हमारे प्रयोगों के दौरान उन्हें और ज़्यादा स्वादिष्ट बनाने के लिए सलाह देतीं। कैसे वह बतातीं कि मसालों का अनुपात क्या हो, या उसमें कोई और मसाला मिलाने पर वह अधिक स्वादिष्ट हो सकता है। कैसे अपरा को वह रोटी बेलना या सब्जियाँ चलाना सिखातीं।

अम्माजी का सब्जियों का बाग उनके साथ ही चला गया। हममें से किसी में भी न तो इतना धीरज है न ही समर्पण कि उनकी तरह आश्रम परिसर में ही सब्जियाँ उगा लें। अब कोई बगीचे की बाड़ पार करके भीतर प्रवेश ही नहीं करना चाहता, उसके मन में सगर्व अपने हाथों में मैथी, पालक, गोभी या बैंगन उठाए अम्माजी की तस्वीर उभर आती है और वह हताश हो उठता है।

उनकी और भी बहुत सी यादें हैं, उनसे संबन्धित बहुत से विचार, भावनाएँ हैं और सभी एक ही बात की तरफ इशारा करते हैं: हम सभी अपनी माँ की, पत्नी, बेटी, सास और दादी की कमी महसूस कर रहे हैं। लेकिन अपरा को बड़ा करने के सुख के साथ हर दिन हमारी दुनिया अम्माजी को याद करते हुए एक-एक कदम आगे सरक रही है।

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