अपने दुख का मुकाबला कैसे करें? क्या उसे दबाकर? क्या उसका दमन करके? 12 दिसंबर 2013

कल मैंने बताया था कि मेरे विचार में अपने प्रियकर के निधन की पीड़ा में धार्मिक दर्शन किसी तरह मदगार साबित नहीं होते। मैंने कहा था कि आपको यह दर्दनाक सत्य स्वीकार करना ही पड़ता है। निश्चय ही यह एक वास्तविकता है लेकिन इस दुख के कई चरण होते हैं और मैं चाहूँगा कि खुद अपने अनुभवों का संदर्भ लेकर उन पर कुछ प्रकाश डालूँ।

पहला चरण होता है, ज़बरदस्त सदमा। इसकी विकरालता और मियाद इस बात पर निर्भर करती है कि आप उसकी मृत्यु की संभावना और स्वाभाविकता से किस हद तक वाकिफ थे तथा मृतक से आपके कितने प्रगाढ़ संबंध थे।

अगर अपने बारे में कहूँ तो यह मियाद एक हफ्ते की रही, जब मैं 2006 में विदेश दौरे पर था और वहीं मुझे एक दर्दनाक कार हादसे में अपनी छोटी बहन के देहांत की खबर मिली। मैं अपना होशोहवास खो बैठा और यह हालत पूरे एक सप्ताह रही। मैं इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं था कि ऐसा हो सकता है। मैं रोया नहीं और अपने दर्द को बाहर निकालना मेरे लिए मुश्किल हो गया। एक दिन, सबेरे-सबेरे मैंने अपने छोटे भाई से कहा, उसे गूगल में देखो, वह हमें वहाँ मिल जाएगी, चलो हम उससे बात करते हैं। मैं मानने के लिए तैयार ही नहीं था कि वह अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन अंततः एक दिन वास्तविकता मेरे सामने अपने विराट रूप में प्रकट हुई और मेरे आंसुओं का बांध टूटकर बह निकला।

और अम्माजी के देहांत के वक़्त हम सब उनके पास थे और जब अम्माजी को दिल का दौरा पड़ा, हम सब उनके आसपास ही थे लेकिन अस्पताल ले जाने की हमारी हर कोशिश के बावजूद वे हमें छोड़ कर चली गईं। यह स्पष्ट होने के बाद से कि वह सदा-सदा के लिए हमें छोड़ कर चली गई हैं उनके दाहसंस्कार तक मेरी आँख से आंसू नहीं निकले। लेकिन जब मैं आश्रम वापस आया तो बिना माँ का आश्रम बहुत खाली-खाली लगा और दुख अचानक आंसुओं के रूप में फूट निकाला। फिर हम सब साथ-साथ रोने लगे।

मेरे विचार में यह दूसरा चरण होता है और बहुत महत्वपूर्ण होता है। दुख को पूरी तीव्रता के साथ महसूस करें। फिर उसे बाहर निकलने दें, आंसुओं की, सिसकियों की शक्ल में रोएँ। इस प्रक्रिया का पूरा होना आवश्यक है, इस दौरान अपनी भावनाओं को रोकने की कोशिश बिल्कुल न करें!

मैं जानता हूँ कि बहुत से लोग इस प्रक्रिया को ठीक तरह से पूरा नहीं होने देते। अपनी प्रकृति और स्वभाव के चलते या अपनी सांस्कृतिक परंपरा के चलते, वे अपने दिल के चारों ओर पत्थर की कठोर दीवार निर्मित कर लेते हैं और अपने दर्द को बाहर नहीं निकलने देते। वे संयमी होने का नाटक करते हुए उसका दमन करते हैं, जो कि ठीक नहीं है। उसे बाहर निकलने का रास्ता दें। चाहें तो बंद कमरे में आँसू बहाएँ लेकिन मैं कहता हूँ कि लोग उन आंसुओं को देखकर आपके विषय में कोई धारणा नहीं बनाने वाले! अपने दुख को दूसरों के साथ साझा करने पर आप अधिक शीघ्रता के साथ उससे मुक्त हो सकेंगे और आप दूसरों के साथ स्थायी रूप से जुड़ पाएंगे!

जीवन रुकता नहीं है। अपने आपको परिस्थितियों के अनुकूल ढालना पड़ता है और संभव है मृतक द्वारा छोड़ी जगह कभी भर न पाए। कुछ समय के लिए मैं अपनी बहन की तस्वीर की तरफ देख भी नहीं पाता था। अम्माजी की तस्वीर की तरफ देखना भी बहुत समय तक बड़ा मुश्किल था। लेकिन उन स्मृतियों को बीच-बीच में बाहर निकालकर उसमें डूब जाना अच्छी बात है, अतीत की ऐसी स्मृतियाँ सुखद ही होती हैं।

ऐसी परिस्थितियों में कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं जो भविष्य में गकड़िया (जलते कोयले पर सिंकी मोटी रोटियाँ) या गाजर का हलुवा नहीं खाएँगे क्योंकि हमारी माँ ये व्यंजन दुनिया में सबसे अच्छा बनाती थीं। और हमेशा वह उनके हाथों ही उपलब्ध हुआ करता था। लेकिन हम ये व्यंजन बनाना जानते हैं और हमारे पास अम्माजी से सीखे हुए कर्मचारी भी हैं इसलिए हम अक्सर उन्हें बनाते-खाते हैं। जब हम उन्हें खाते हैं तो उन गकड़ियों और गाजर के हलुवे की याद करते हैं, जिसे अम्माजी हमें बनाकर खिलाया करती थीं और साथ-साथ एकाध आँसू बहा लेते हैं या बस उनकी याद में भीगे हुए चुपचाप खाते रहते हैं।

संसार (जीवन) चलता रहता है और उसके अनुसार हमारा जीवन गुज़रता रहता है। हमारे मस्तिष्क में सुखद स्मृतियाँ होती हैं और दिल में प्रेम। स्मृतियों को अपने दिल से दूर न करें। उन्हें जियेँ, उनसे प्रेम करें और आप अनुभव करेंगे कि वह व्यक्ति आपके बिल्कुल करीब आ गया है, आपके दिल में बस गया है।

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