क्या स्वर्ग की कोरी कल्पना में स्वाहा हो जाती है किसी के गुज़र जाने की पीड़ा? – 1 जनवरी 13

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

2013 में आपका स्वागत है। मुझे उम्मीद है बीते वर्ष का अंत आपके लिए अच्छा रहा होगा और आपने हर्ष और उल्लास के साथ नये वर्ष का स्वागत किया होग। हमने यहां आश्रम में कोई बड़ा उत्सव नहीं मनाया। जैसा कि मैंने पहले भी क्रिसमस के दौरान कहा था कि उत्सव मनाने के लिए आपका सही मिज़ाज में होना बहुत ज़रूरी है और यह भी कि हम बस ऐसे ही इतना खुश नहीं हो सकते कि नाचने-गाने लगें। इन सब के बावजूद हमने साथ मिलकर अच्छा वक़्त बिताया। अपरा, रमोना और मैं जल्दी सोने चले गए लेकिन पूर्णेंदु, थॉमस, आइरिस और हमारे दूसरे अतिथियों को साथ लेकर बेघरों को कंबल बांटने गए – जब आप पार्टी के मूड में न हों तो उत्सव मनाने का इससे बेहतर विकल्प क्या हो सकता है।

जब लोगों को अम्मा जी के निधन का समाचार मिला तो कई लोगों ने शोक प्रकट किया और कई लोगों ने कुछ इस तरह की पंक्तियां भेजीं: ‘मुझे मालूम नहीं कि क्या लिखूं क्योंकि ऐसी कोई चीज़ नहीं है जिसे कह देने से आपकी पीड़ा समाप्त हो पाएगी!’ कई अन्य लोगों ने संकेत के तौर पर सीधा अपना दुःख ज़ाहिर किया कि वे इस शोक में हमारे साथ हैं। हालांकि कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें लगा कि ऐसे मौक़े पर सलाह देना सबसे उचित है, उनकी सलाह कुछ ऐसी थी: ‘आप एक बुद्धिमान व्यक्ति हैं और आपको शोक-संतप्त होने की जगह दूसरी दुनिया में उनके प्रवेश का उत्सव मनाना चाहिए!’ नये वर्ष की शुरुआत मैं ऐसी सलाह देने वाले सभी लोगों को एक स्पष्ट संदेश देकर करना चाहूंगा ताकि इसे लेकर वर्ष 2013 में कोई भ्रांति न रहे: मैं धार्मिक नहीं हूं और मैं गुरू नहीं हूं, मैं एक साधारण व्यक्ति हूं। जब कोई प्रियजन हमेशा के लिए छोड़ जाते हैं, मैं दुखी होता हूं और मैं अपनी इन संवेदनाओं को स्वर्ग या दूसरी दुनिया की कल्पना और भ्रम में जीकर दबाऊंगा नहीं।

इससे पहले कि मेरे पाठकों में से कोई तबका मुझे इस बात के लिए सुनाना शुरू करे कि मैं अपने धार्मिक मित्रों द्वारा प्रकट किए गए शोक का सम्मान नहीं करता, मैं यह साफ़ करना चाहता हूं कि मुझे उन संदेशों और ई-मेल से कोई समस्या नहीं है जो दिल से महसूस कर लिखे गए हैं, जिनमें प्रेम है, सहानुभूति है। मुझे उन संदेशों से आपत्ति है जिसमें यह बताया जा रहा है कि मुझे कैसा महसूस करना चाहिए और कैसा नहीं। मेरी माँ की मृत्यु हुई है। मैं दुखी हूं और मैं रोता हूं। यह एक सत्य है और मैं इसे स्वीकार करने की क्षमता रखता हूं, आपको इससे कोई समस्या क्यूं है?

वास्तव में, वे सभी लोग जो ऐसी सलाह देते हैं, अपने किसी प्रियजन के गुज़रने पर उतना ही रोते हैं जितना मैं। तब उनकी बुद्धिमत्ता भी चली जाती है और उन्हें भी अपनी भावनाओं, संवेदनाओं को स्वीकार करना पड़ता है क्योंकि ऐसी स्थितियों में अपनी भावनाओं को भूलकर दिमाग़ का इस्तेमाल करना आसान नहीं होता। मेरे विचार में, ऐसा करना असल में ग़लत है. बल्कि आपको रोकर अपनी भावनाओं को बाहर आने देना चाहिए – केवल वही एक स्वस्थ प्रतिक्रिया है!

हां, मैंने आंसू बहाए हैं, मेरा पूरा परिवार रोया है और मैं मानता हूं कि यह ठीक है। हो सकता है रोना फ़ैशन में न हो, लेकिन यह अच्छा है। मुझे उस व्यक्ति से सहानुभूति है जो अपने दुख-दर्द को इस तरह ज़ाहिर कर पाने में असमर्थ है। हो सकता है आप एक ड्रामेबाज़ व्यक्ति न हों, बहुत से लोगों के सामने आपको रोने की आवश्यकता भी नहीं है। अपने परिवार के साथ रोएं, अपने साथी के साथ रोएं या अकेले में रो लें। यह मायने नहीं रखता कि आपकी आस्था किसमें है, पर अपनी भावनाओं को दबाएं नहीं।

मैं मृत्यु के बाद की ज़िंदगी में या स्वर्ग में या मोक्ष में यक़ीन नहीं करता लेकिन अगर आपको यह भरोसा है भी कि आपके प्रियजन मृत्यु के बाद किसी ऐसी जगह पर जाएंगे, तो भी आप दुखी होंगे. कोई और रास्ता नहीं है। आपको यह स्वीकार करना होगा, आपकी बुद्धिमत्ता काम नहीं आएगी। इसे बाहर आने दीजिए, रोइए और अगर आप उत्सव मनाने जैसा महसूस नहीं करते तो मत मनाइए। साथ बैठिए, बात कीजिए, जितना हो सके ज़िंदगी का आनंद लीजिए। जितना बेहतर बनाया जा सके, बनाइए। वक़्त गुज़रने के साथ-साथ चीज़ें आसान हो जाएंगी। जो आपको छोड़ गए हैं वो आपके दिल में, आपकी यादों में रहेंगे। लेकिन जब भी आंसू बाहर आना चाहे, उन्हें बहने दीजिए।