जब चुनाव, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को धर्म सीमित करता है – 16 सितंबर 2015

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कल इस्लाम के विषय में लिखते हुए मैंने आपके सामने स्पष्ट किया था कि कैसे मैं इस्लाम के प्रति पूर्वग्रह नहीं रखता। लिखते हुए मेरे मन में, धर्म की कौन सी बातें मुझे पसंद या नापसंद हैं, इस विषय में कुछ और विचार आ रहे हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि न तो मैं किसी से कहना चाहता हूँ कि उन्हें क्या सोचना चाहिए और न ही मैं पसंद करूँगा कि कोई मुझसे कहे कि मैं क्या सोचूँ। मैं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और वैचारिक स्वतंत्रता में विश्वास रखता हूँ और धर्म इस विषय में पूरी तरह भिन्न विचार को प्रश्रय देता है!

आप जानते हैं कि मैं एक नास्तिक व्यक्ति हूँ। मैं काफी समय तक धार्मिक रहा था और अब मैं उसे पूरी तरह छोड़ चुका हूँ- यहाँ तक कि अब मैं ईश्वर पर भी विश्वास नहीं रखता। लेकिन आपको एक बात बताऊँ? मुझे इससे कोई समस्या नहीं है कि आप किसी धर्म के अनुयायी हैं! आप जिसे चाहें, पूजते रहें, सप्ताह में एक, दो या तीन दिन मौन व्रत रखें, उपवास करें, कोई दूसरा काम न करें-सिर्फ बैठकर दस बार या सौ बार पूजापाठ करें, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। वैसे भी धर्म यही कहता है कि वह सिर्फ आपके लिए है, जिससे आप अपनी धार्मिक क्रियाओं को अपनी चार-दीवारी तक सीमित रख सकें! सिर्फ इतनी कृपा करें कि जिस पर आप विश्वास कर रहे हैं, मुझे उस पर विश्वास करने पर मजबूर न करें! इसके अलावा एक बात और: मुझे अपनी बात कहने से रोकने की कोशिश न करें!

मैं एक प्रजातांत्रिक राष्ट्र का नागरिक हूँ, मेरा जनतंत्र पर प्रगाढ़ विश्वास है और, जैसा कि मैंने कहा, मेरा विचार है कि सभी को यह स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वे अपने विचार बिना किसी संकोच या डर के व्यक्त कर सकें। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमारे बीच असहमति है, हमें आपस में किसी वाद-विवाद में पड़ने की ज़रूरत ही नहीं है! दुनिया भर में मेरे बहुत से मित्र हैं जो विभिन्न धर्मों को मानते हैं और इसके बावजूद कि उनकी आस्थाओं के बारे में मेरे विचार उनसे बहुत अलग हैं, मेरे उन सभी लोगों के साथ बहुत स्नेहपूर्ण संबंध हैं!

जब तक हम दूसरों को नुकसान नहीं पहुँचाते या उन्हें परेशान नहीं करते, हम एक-दूसरे के विचारों का सम्मान करते हुए, एक-दूसरे को मनपसंद चुनाव की, अपने विचार रखने की और उन्हें अभिव्यक्त करने की आज़ादी प्रदान करते हुए बड़े मज़े में एक साथ रह सकते हैं-लेकिन दुर्भाग्य से धर्म इसके आड़े आ जाता है और इस बात पर सहमत नहीं होता या इस सिद्धांत पर काम नहीं करता!

सिर्फ कुछ धर्मों के धर्मप्रचारकों के कामों पर नज़र दौड़ाने की ज़रूरत है। ये लोग दुनिया भर के विभिन्न देशों में कार्यरत हैं और एक समय था जब सिर्फ ईसाई धर्मप्रचारकों का बोलबाला था और वही दुनिया भर में लोगों का धर्म-परिवर्तन किया करते थे और अगर वे स्वेच्छा से धर्म-परिवर्तन नहीं करते थे और बप्तिस्मा नहीं करवाते थे तो उनसे जबर्दस्ती ऐसा करवाते थे। लेकिन यह न समझें कि यह अब बंद हो गया है!

यहाँ, भारत में यह अभी भी हो रहा है। ईसाई, हिन्दू और मुस्लिम धर्म-प्रचारक इस काम में एक-दूसरे से होड़ ले रहे हैं! गरीब और सुविधाओं से महरूम लोग भोजन, छत और काम के लालच में उनके झाँसे में आ जाते हैं लेकिन सिर्फ एक शर्त पर: उन्हें धर्म-परिवर्तन करना होगा। बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्होंने एक ही जीवन में कई बार धर्म-परिवर्तन किया है-क्योंकि वे ऐसा करने को मजबूर हैं! ज़िंदा रहने के लिए उन्हें ऐसा करना पड़ता है क्योंकि उन्हें बार-बार यह विकल्प उपलब्ध कराया जाता है। उनके लिए धर्म इतना महत्वपूर्ण नहीं है कि उसके लिए जान दे दें!

इसीलिए संकटग्रस्त इलाकों के लोग आई एस के बारे में भी ऐसा ही महसूस कर सकते हैं, हालांकि इस्लाम इस मामले में और भी अधिक चरमपंथी है: उनका बाकायदा एक सोचा-समझा कार्यक्रम है- दूसरे धर्म को मानने वाले हर व्यक्ति का या तो धर्म-परिवर्तन करना होगा या उनकी हत्या कर दी जाएगी! यह एक असंभव कार्य है-अपने अंदर ठीक इन रूढ़िवादियों की तरह की आस्था पैदा करना असंभव है! आप कुछ भी कर लें, पूरी संभावना होगी कि आप बहुत जल्द उस वर्ग में शामिल हो जाएँ जिनकी हत्या कर दी गई।

और यही वह बिन्दु है जहाँ दूसरों के प्रति धर्म कतई सहिष्णु नज़र नहीं आता। इसके विपरीत, वह दूसरे धर्मावलम्बियों की हत्या करता है या उनका जबरदस्ती धर्म-परिवर्तन करके उन्हें अपनी आस्था पर यकीन लाने को मजबूर करता है।

जी नहीं, मैं इसके बरक्स नास्तिकता और जनतंत्र को वरीयता दूँगा!

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