जब भगवान भी बलात्कार करते हैं – हिन्दू मिथकों का भारतीय समाज पर असर – 3 नवंबर 2014

आज भी एक त्यौहार है और वृन्दावन में धार्मिक लोग परिक्रमा लगाकर इसे मनाते हैं। हिन्दू मिथकों के अनुसार इस दिन भगवान चार महीनों की लम्बी नींद से जागते हैं। यह विष्णु और तुलसी के विवाह का दिन भी है और भारत में आज के दिन से पुनः विवाहों के मौसम की शुरुआत होती है। आज के ब्लॉग में मैं इन धार्मिक कथाओं पर नज़दीकी नज़र डालते हुए भारतीय संस्कृति पर हुए उनके असरात का जायज़ा लेना चाहूँगा।

संक्षेप में पौराणिक कथा से मैं इसकी शुरुआत करता हूँ:

धर्मग्रंथों के अनुसार जलंधर नाम का एक दैत्य था। उसके पास अपना रूप बदलने की शक्ति थी, जिसके चलते वह किसी भी व्यक्ति का शरीर धारण कर सकता था। अपनी इस शक्ति का प्रयोग वह औरतों पर करता और उनके पतियों का रूप धरकर धोखे से उनका शीलभंग करने में सफल हो जाता। पता चलने पर जब पति उससे लड़ने आते तो कोई भी उसे मार न पाता। यह अद्भुत शक्ति उसे उसकी पत्नी के पतिव्रता होने के कारण प्राप्त थी। जी हाँ, पत्नी की स्वामिभक्ति के कारण वह दैत्य बलात्कार पीड़िता स्त्रियों के पतियों के हाथों मारा जाने से बच जाता।

सारे पति मिलकर विष्णु के पास, जिन्हें सबसे बड़ा परमेश्वर माना जाता है, गए और उससे मदद मांगी। विष्णु ने जलंधर को हराने के लिए उसी के तरीके को आजमाने का निश्चय किया: उन्होंने जलंधर का रूप धरा और दैत्य की पत्नी से सम्भोग करने में सफल रहे। वृंदा पतिव्रता नहीं रही और इस तरह उसके दैत्य पति की शक्ति जाती रही। अंततः विष्णु जलंधर को मारने में सफल रहे।

इस तरह धोखा देने के कारण वृंदा विष्णु पर बहुत क्रोधित हुई और उन्हें पत्थर हो जाने का श्राप दिया। फिर वह मृत जलंधर के साथ सती हो गई।

फिर वही वृंदा पुनर्जन्म लेकर पवित्र तुलसी का पौधा बनी और आखिर तुलसी और शालिग्राम, यानी पत्थर के रूप में विष्णु, का विवाह सम्पन्न हुआ।

इस पौराणिक कथा को हर कोई जानता है। अब मैं वर्तमान काल में भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं पर इस कथा के परिणामों पर नज़र डालते हुए चार बिन्दुओं में अपनी बात रखना चाहता हूँ। स्वाभाविक ही इन्हें समाज पर धर्म के बड़े दुष्परिणामों के रूप में देखा जा सकता है:

1) अगर कोई किसी महिला पर बलात्कार करता है तो आप उसकी पत्नी के साथ बलात्कार कर सकते हैं क्योंकि आपके भगवान ने भी तो यही किया था।

आज इसके कई उदाहरण मिल जाएँगे, जहाँ लोग बलात्कारी के परिवार की स्त्रियों पर बलात्कार करके बदला लेते हैं।

2) अपने धोखेबाज़, बलात्कारी पति की रक्षा के लिए स्त्रियों को वफादार और पवित्र होना चाहिए।

आज के भारतीय समाज में यह आम बात है कि स्त्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वह तो पवित्रता की मूर्ति बनी रहे भले ही उसका पति बाहर जाकर कहीं भी मुँह मारता रहे, नजर आने वाली हर लड़की के साथ छेड़छाड़ करता रहे।

3) पति की मृत्यु के बाद पत्नी को आत्महत्या कर लेनी चाहिए।

दो सौ साल पहले तक यह एक सामान्य बात थी। इस प्रथा को सती प्रथा कहा जाता है और इस तरह आत्महत्या करना बड़े गर्व की बात होती थी क्योंकि यह काम उसकी स्वामिभक्ति का सबूत माना जाता था। राजा राममोहन रॉय ने एक कानून बनवाकर इस प्रथा को समाप्त करवाया लेकिन मेरी किशोरावस्था तक भी हम समाचार-पत्रों में ऐसे प्रकरणों के समाचार पढ़ते रहते थे। आज भी राजस्थान में ऐसे मंदिर हैं, जहाँ सती हुई स्त्रियॉं की पूजा की जाती है।

4) बलात्कार पीड़िता को अपने बलात्कारी उत्पीड़क के साथ विवाह रचाना चाहिए।

भारत में गाँवों की पंचायतों में कई बार ऐसे निर्णय आज भी सुनाए जाते हैं। दोनों परिवार अकसर इस बात पर राज़ी होते हैं कि बलात्कार की यही तार्किक परिणति हो सकती है।

इस चर्चा से आप भारतीय संस्कृति में महिलाओं की स्थिति का स्पष्ट अनुमान लगा सकते हैं। उसे बलात्कार के कारण बलात्कार झेलना पड़ता है, अपने पति के दीर्घ जीवन और संरक्षण के लिए प्रयास करने पड़ते हैं, उसे अपने पति के लिए खुद भी जीवन से हाथ धोना पड़ता है और अंत में, उसे खुद पर बलात्कार करने वाले अत्याचारी अपराधी के साथ विवाह करना पड़ता है और जीवन भर पत्नी बनकर उसकी सेवा भी करनी पड़ती है।

और इस देश के इस पाखंडी धर्म में कहा जाता है कि यहाँ स्त्रियॉं का इतना आदर किया जाता है कि उन्हें देवी का दर्जा हासिल है। ऐसे धर्म और ऐसी संस्कृति का आदर करने की आप मुझसे अपेक्षा भी कैसे कर सकते हैं?

पुनश्च: इन शब्दों के लिए मुझे गाली देने की जिनकी तीव्र इच्छा हो रही हो, वे पहले अपने धर्मग्रंथों को पढ़ें और सबसे पहले उन्हें गाली दें, जिन्होंने इन ग्रन्थों को लिखा है। मैं सिर्फ उनका हवाला देकर उसके दुष्परिणामों की ओर इशारा भर कर रहा हूँ….

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