जब आस्थाएँ समान नहीं होती तो बहुत सी दूसरी बातों में भी सामंजस्य नहीं रह पाता! 26 मई 2014

धर्म

मैं व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपसी सहिष्णुता पर विश्वास रखता हूँ। मुझे लगता है कि हर व्यक्ति अपनी मर्ज़ी से अपनी आस्था का चुनाव करने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए। मेरा यह भी विचार है कि अगर आप अपने दोस्तों से अलग कोई आस्था रखते हैं तो इससे दोस्तों के बीच आपस में कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि ऐसा हो, मगर अपने अनुभव से जानता हूँ कि इससे फर्क पड़ता है। सुनकर अच्छा नहीं लगता मगर तथ्य यही है। चलिए, मैं आपसे इस विषय पर अपनी बात कहने का प्रयास करता हूँ।

शायद आप जानते होंगे कि मैं खुद भी बहुत बदला हूँ-एक बहुत धार्मिक और आस्थावान व्यक्ति से एक नास्तिक हो गया हूँ। स्वाभाविक ही इसका यह अर्थ था कि मेरे ऐसे भी कई मित्र भी हों, जिनकी आस्थाएँ मेरी आस्थाओं से कतई मेल न खाएँ। लोग, जिनके विश्वास, धारणाएँ और धार्मिक आस्थाएँ मेरे लिए स्वीकार्य नहीं थीं। कभी मैं सोचा करता था कि ठीक है, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आखिर जीवन में और भी बहुत सी बातें हैं, जिन्हें हम आपस में साझा कर सकते हैं; धर्म ही जीवन में सब कुछ नहीं है!

लेकिन मैंने नोटिस किया कि यह इतना सहज नहीं है। अगर आपमें बहुत अधिक परिवर्तन आ गया है और लोग नहीं बदले हैं तो यह कठिन हो जाता है। आपकी आस्थाएँ आपके सोचने के तरीके या विचार-प्रक्रिया को भी बदलकर रख देती है और आपके मित्र के साथ भी यही होता है। वे अपनी आस्थाओं और धारणाओं के अनुसार सोचते हैं। स्वाभाविक ही उनका नजरिया उनके सोच पर आधारित होता है और तदनुसार वे व्यवहार करते हैं। इस तरह कुल मिलाकर, अंततः उनकी आस्था उनके व्यवहार, बातों और जीवन के हर क्षेत्र में परिलक्षित होती है।

व्यावहारिक रूप में इसका अर्थ यह है कि आपस में आपके राजनैतिक विचार नहीं मिलते, सामाजिक सरोकार पूरी तरह अलग होते हैं, आप पूरी तरह अलग-अलग वातावरण में रहने लगते हैं और विभिन्न परिस्थितियों पर आपकी प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग होती हैं। जैसा कि दोस्ती में स्वाभाविक होता ही है, एक-दूसरे से आपकी कुछ अपेक्षाएँ होती हैं और वे पूरी नहीं हो पातीं क्योंकि सामने वाला अब न तो उस तरह सोचता है और न ही उस तरह कर सकता है जैसा आप चाहते हैं। इस तरह आपके बीच सामान्य लेन-देन का सम्बन्ध भी समाप्त हो जाता है क्योंकि आपको उस चीज़ की आवश्यकता ही नहीं होती जो वे देना चाहते हैं और जो आप दे सकते हैं, उसकी उन्हें ज़रुरत नहीं होती! चर्चा में भी अब आप उनका रवैया पसंद नहीं करते!

यह बताता है कि जीवन के सभी पहलू एक-दूसरे से कितनी मजबूती के साथ जुड़े हुए होते हैं! मैं जानता हूँ कि यह मेरे अकेले का अनुभव नहीं है। अपने दिल में झाँकें और फिर अपने आसपास चारों ओर नज़र दौड़ाएँ-जो आपसे अलग सोच रखते हैं, उनके साथ क्या आप भी यही बात नोटिस नहीं करते? वे आपके मित्र हो सकते हैं, जैसे मेरे लिए होते हैं, वे आपके दिल के करीब हो सकते हैं, जैसे मेरे लिए हमेशा से रहे हैं। लेकिन क्या करूँ मैं इस प्रेम का, चाटूं! जबकि मैं साफ़-साफ़ देख रहा हूँ कि हमारे तौर-तरीके पूरी तरह अलग-अलग दिशाओं में जा रहे हैं? हम एक-दूसरे के साथ नहीं चल रहे हैं। हम धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर नहीं हो रहे हैं बल्कि विपरीत दिशाओं में चल पड़े हैं!

हमारे बीच अंतर पैदा हो गया क्योंकि मेरी आस्था में परिवर्तन हुआ मगर उनकी आस्थाएँ नहीं बदलीं। या उनमें किसी दूसरी तरह से बदलाव आया। इसके अलावा, अपने साथ आप आसपास मौजूद दूसरे लोगों से भी बदलने की अपेक्षा नहीं कर सकते!

हर व्यक्ति सोचता है कि उसका रास्ता ठीक है। इसीलिए हम अपने-अपने अलग-अलग रास्तों पर चलते चले जाते हैं। लेकिन मेरे लिए एक बात स्पष्ट है: अगर हमारे धार्मिक विचार नहीं मिलते तो जीवन के ऐसे बहुत से दूसरे पहलू भी हैं, जिन पर हम आपस में एकमत नहीं होते और एक साथ रहना मुश्किल होता है, भले ही आप एक-दूसरे से प्यार करते हों। इस विचार पर मैं कल चर्चा करूंगा।

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