जब कोई आस्था नुकसान पहुँचाने लगे तो उसके प्रति सहिष्णुता त्याग देनी चाहिए- 17 मई 2012

धर्म

मैंने कल कहा था कि सामान्यतः आप किसी की धार्मिक आस्था अथवा विश्वास पर बहस नहीं कर सकते। लेकिन आप किसी के भी विश्वासों के प्रति अपनी असहमति प्रदर्शित कर सकते हैं और यह काम आप कभी भी कर सकते हैं, इस पर कोई पाबंदी नहीं है। अगर मैं कहूँ कि मैं कुछ विश्वासों का बहुत कड़ाई के साथ विरोध करता हूँ तो लोग मुझे असहिष्णु कह सकते हैं लेकिन मुझे लगता है कि कुछ मामलों में सहिष्णु बने रहना अपनी ज़िम्मेदारी से मुंह मोड़ना ही कहा जाएगा।

अगर उदाहरण ही देना हो कि मैं किस धार्मिक आस्था को बर्दाश्त कर सकता हूँ, भले ही उसे मानता नहीं हूँ तो मैं जैन धर्म का नाम लूँगा। मैं अहिंसा पर विश्वास करता हूँ मगर जैन लोग अहिंसा की इंतेहा कर देते हैं। एक आदर्श जैन धर्मावलम्बी के लिए यह आवश्यक है कि वह ध्यान रखे कि उसके कदमों के नीचे आकर एक चींटी भी मरने न पाए। वह एक झाड़ू साथ रखता है कि रास्ते में पड़े कीड़ों-ककोड़ों को उससे हटाकर आगे बढ़े और वे उसके पैरों के नीचे कुचल न जाएँ। वे अपने चेहरे पर एक जालीदार पर्दा भी लगाए रहते हैं, जिससे गलती से भी कोई छोटा-मोटा कीड़ा उनके मुंह, आँख, नाक में न चला जाए। इसकी तुलना में मैं अपने बारे में यही कहूँगा कि मैं इतना अहिंसक नहीं हूँ। मैं अहिंसा में विश्वास करता हूँ मगर इतना भी नहीं। अगर मैं अपने बेडरूम में मच्छर देखता हूँ तो उसे हाथों के बीच चपेट लेता हूँ क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मुझे मलेरिया हो। लेकिन मैं ऐसे किसी भी जानवर के प्रति हिंसक नहीं होता, जो मुझे नुकसान नहीं पहुंचाता। लेकिन अगर कोई इस धर्म में आस्था रखना चाहता है तो मुझे कोई दिक्कत भी नहीं है। अगर आप इस धर्म की मान्यताओं के अनुसार कठोरता पूर्वक आचरण करना चाहते हैं तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ, आपके प्रति और आपकी भावनाओं के प्रति सहिष्णु, निर्विकार और प्रसन्न हूँ।

जिन आस्थाओं को मैं गलत समझता हूँ और जिनके विषय में अक्सर लिखता भी रहता हूँ वे हैं झूठे गुरु। उनकी मैं अक्सर कटु आलोचना भी करता रहता हूँ। उनमें से किसी पर भी विश्वास करना खतरे से खाली नहीं। अगर आप निर्मल बाबा या कुमार स्वामी पर आस्था रखते हैं तो अमीर होने और बीमारी से निजात पाने के वादे पर आप मेहनत से कमाया अपना धन भी गंवा सकते हैं। यह उन्हें न सिर्फ उन्हें अमीर बनाता है और आपको गरीब बल्कि अगर आप इस बात पर विश्वास करें कि एक गुरु आपका कैंसर या कोई बीमारी ठीक कर देगा तो आप अपना इलाज भी नहीं कराते और आपका स्वस्थ्य और खराब हो सकता है और डॉक्टर से इलाज कराके ठीक होने की जगह आप अपने जीवन से भी हाथ धो सकते हैं।

अगर आप झूठे मक्कार गुरुओं पर आस्था रखने के दुख और नुकसान के और उदाहरण चाहते हैं तो यौन शोषण के आरोपी कृपालु और उसके मुख्य शिष्य प्रकाशनन्द जैसे गुरुओं को देख लें। सुंदर और भड़कीले वस्त्र पहनकर कृष्ण होने का दिखावा करते हुए ये लोग अपने आस्तिक शिष्यों को लुभाकर अपने बेडरूम तक ले जाते हैं। महिलाओं से कहते हैं, वे गोपियाँ हैं और ईश्वर के साथ यौन संबंध बना रही हैं। यह यौन अपराध है, मानसिक झांसा और सम्मोहन-विद्या का अनुचित प्रयोग है।

अगर आप यह कहें कि यह सबकी अपनी-अपनी मर्ज़ी है कि वे किसी धोखेबाज़ पर आस्था रखें या ना रखें तो मैं इस बात से सहमत हूँ। मैं आपको उन गुरुओं के कामों से आगाह कर सकता हूँ। मैं बता सकता हूँ कि ऐसा करने पर क्या हो सकता है मगर यदि आप उन पर आस्था रखने पर आमादा ही हैं तो यह आपका अपना निर्णय होगा! उनके चंगुल से आपको खींचकर लाना मेरा काम नहीं है। स्वतन्त्रता पूर्वक किया गया यह आपका अपना चयन है और मैं यह भी नहीं कहूँगा कि उन पर आस्था रखने के कारण आप एक बुरे व्यक्ति बन जाते हैं। मैं सिर्फ इतना कहूँगा कि आप गलत दिशा में बढ़ रहे हैं।

समस्या तब पेश आती है जब आप उन गुरुओं से दूसरों को ठगने के तरीके सीख लेते हैं! इस बात को मैं बिल्कुल बर्दाश्त नहीं कर सकता क्योंकि अब आप अपने गुरु के झांसे में आकर दूसरों को भी धोखा देना शुरू कर देते हैं, दूसरों को भी नुकसान पहुंचाते हैं। आपका यह व्यवहार दूसरों को धोखा देने वाला होता है और मैं इसका विरोध अवश्य करूंगा। ऐसी ही कुछ और अ-धार्मिक आस्थाएं भी हैं, जो नुकसानदेह हैं। कुछ लोग बेईमानी पर तो कुछ लोग भ्रष्ट आचरण और रिश्वतख़ोरी पर आस्था रखते हैं। कुछ ऐसे भी लोग हुआ करते थे, जो हिटलर पर आस्था रखते थे। कुछ लोग होते हैं, जो हत्या और रक्तपात पर आस्था रखते हैं! धार्मिक आतंकवाद पर कुछ लोगों की आस्था है और कुछ ऐसे लोग भी थे और आज भी हैं, जो उन बातों पर आस्था रखते थे, जिन पर ओसामा बिन लादेन आस्था रखा करता था। भले ही वह मारा जा चुका है मगर न जाने कितने ही लोग आज भी मौजूद हैं, जो मानते हैं कि धर्म-युद्ध छेड़ना उनका फर्ज़ है! अगर आप इन बातों पर आस्था रखते हैं तो इसका अर्थ है आप लोगों की हत्या करने के लिए तैयार हैं, लोगों को नुकसान पहुँचाने के लिए तैयार हैं, लोगों की ज़िंदगी तबाह करने के लिए भी तैयार हैं!

मुझे नहीं लगता कि हमें ऐसी आस्थाओं के साथ नरमी बरतनी चाहिए। अगर हम इन्हें बर्दाश्त करते हैं तो लोगों को अपनी जानें देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है। हालांकि आप इस विषय में ज़्यादा कुछ कर भी नहीं सकते क्योंकि जो व्यक्ति नफरत फैलाने पर आमादा है उसे आप, कितना भी कोशिश कर लीजिए, कुछ नहीं समझा सकते। लेकिन आप उनसे अपनी असहमति व्यक्त कर सकते हैं, नैतिक रूप से उनका समर्थन नहीं कर सकते। जो गलत है वह गलत है और अगर आपने कोई गलत बात होते हुए देखी है तो आपका कर्तव्य है कि आप उसके खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करें, अपने मित्रों, चाहने वालों को उनकी धोखाधड़ी से बचाने की कोशिश करें और उन्हें स्पष्ट बताएं कि आप इन गुरुभक्तों और आस्थाओं के विरोधी हैं। सबसे पहला कदम यह होगा कि आप उन पर अपना अनास्था तथा अविश्वास ज़ाहिर करें। अगर उससे दूसरों का या आपका नुकसान हो रहा है तो आपको उन बातों के खिलाफ उठ खड़ा होना चाहिए। अगर आतंकवाद, धोखेबाज़ी और बेईमानी के विरोध को असहिष्णुता कहा जाता है तो कहा जाता रहे, मैं मानता हूँ कि मैं एक असहिष्णु व्यक्ति हूँ।

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