पापों को धोने वाला कुम्भस्नान – धर्म का सिनेमा स्वर्ग के टिकट को बेचता है – 23 जनवरी 2013

धर्म

मुझसे यह पूछा गया कि कुम्भ मेले के बारे में सामान्यतः मैं क्या सोचता हूं इसके बारे में भी मैं आने वाले दिनों में कुछ विस्तार से लिखूं, जैसे कि मैने कल बताना शुरू किया था। इसलिये मुझे लगता है कि कुम्भ मेले से साधारणतः मैं क्या समझता हूं, थोड़ा इसके बारे में भी आपको बताऊं।

हिन्दू धर्म यह कहता है कि कुम्भ मेले के समय हमें वहां जाकर कुम्भ स्नान जरूर करना चाहिये। इससे आपके सारे पाप धुल जाते है और जब आपकी मृत्यु होती है तो आप स्वर्ग जाते है। आप अपना शेष जीवन नर्क में न बिताकर स्वर्ग में बिताते हैं। ये भी कोई बात है कि आप पूरी जिन्दगी पाप करते रहें और कुम्भ स्नान करते ही आपके सारे पाप धुल जायेंगे। इसका मतलब लोगों को पाप करने में भी कोई झिझक नही होगी क्योकि वो तो अपने सारे पाप धुल ही लेंगे। फिर आप के पास कोई अवगुण ही नही होगा सिर्फ गुण ही गुण होंगे और आपके अच्छे कर्म ही आपको स्वर्ग ले जायेंगे।

अतः धर्म यह बताता है कि आपके पुण्य काल्पनिक धन है जिसके माध्यम से आप स्वर्ग में जाने की टिकट खरीद सकते हो, ठीक उसी प्रकार से जैसे किसी फिल्म को देखने के पहले एक टिकट खरीदी जाती है जिससे आप सिनेमा देख सकें। अगर आप अधिक धनी है तो आपको और भी अच्छा स्थान दिया जायेगा। कुछ लोग ऐसे भी होते है जो फिल्मों का विज्ञापन देते हैं और टिकट भी बेचते हैं और हां धर्म तो यह चाहता ही है कि फिल्म हाउसफुल जाये और लोग पूरा-पूरा शो देखें। इसलिये विज्ञापनदाता हमेशा से यह कोशिश करते आ रहे हैं कि वह दर्शकों को लुभा सकें और बहुत सालों बाद उनकी कोशिशों का ही यह परिणाम है कि दर्शक स्वतः ही आ रहे हैं।

अगर आप इन गुरू, महात्मा, धार्मिक नेता, साधू और बाबाओं को विज्ञापनदाता के रूप में देखें तो आपको यह लगेगा कि इनकी पूरी कोशिश रहती है कि आप यह फिल्म पूरी देखें। अगर आपकी आंखे हैं तो आप यह देख सकते है यह सिर्फ एक कथा, भ्रम व एक नाटक है। कुम्भ मेले में कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से यह सारी चीजें देख सकता है।

ये पुण्य लोग कुम्भ मेलें के मुख्य आकर्षण होते हैं, ये शिविरों में अपना प्रवचन देते है, धन के खिलाफ कर्मकाण्ड व आयोजन करते हैं और हां निश्चित रूप से नये अनुयायियों एक संख्या भी बढ़ा लेते हैं। समाचार पत्र में मैने एक तस्वीर देखी जिसमें आध्यात्मिक लोगों का एक समूह था, जिन्होंने भगवा वस्त्र, नारंगी पगड़ी पहनी हुयी थी और उनके हाथों में शस्त्र थे जैसे कि वो सैनिक हो। उनके पास पुराने समय की सिर्फ तलवारें और हथियार ही नही थे जिसका उल्लेख शास्त्रों में मिलता है बल्कि उनके पास बन्दूकें भी थी। अपने आग्नेयास्त्रों को पकड़े हुए हवा में वे गोली चला रहे थे क्योकि वह कुम्भ मेले का प्रारम्भ इस तरह गोली चलाकर ही करते है। इससे आपको धर्म का एक दूसरा ही चेहरा दिखता है।

इन गुरू, साधुओं और विज्ञापनदाताओं का एक ही मकसद रहता है कि लोग आये और उनके इस नाटकीय व भ्रमपूर्ण सिनेमा को देखें क्योकि अगले तीन साल के बाद कुम्भ मेला किसी अन्य स्थान पर आयोजित होगा और तब तक के लिये ये अपने अनुयायियों से किसी भी तरह से खूब धन इकट्ठा कर लेंगे, इसलिये इनका उद्देश्य रहता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग वहां आये। जो लोग वहां जाते हैं वे भी इस बात को बदल नही सकते है कि यह सब नाटकीय और काल्पनिक है।

अब आपका प्रश्न होगा कि क्या इलाहाबाद के इस कुम्भ मेले में मैं शामिल होने जा रहा हूं तो इसका उत्तर है बिल्कुल नही, मेरा ऐसा कोई इरादा नही है। मैं इस बात को बिल्कुल भी नहीं मानता कि मलिन नदी में स्नान करने से किसी के सारे पाप धुल जायेंगे बल्कि यह मैं बहुत अच्छी तरह से समझता हूं ये धर्म, सिनेमा यह सब धन कमाने का एक ज़रिया है, और लोगों के मनोरंजन के लिये है। इस प्रकार मैं देखता हूं उस व्यक्ति के लिये इस मेले में शामिल होने का कोई मतलब नही बनता, जिसे यह मेला धर्म का एक मायावी चेहरा दिखाता हो।

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