पिछले सप्ताह मैंने बताना शुरू किया था कि निश्चित रूप से मैं कुम्भ मेलें में नही जा रहा हूं जो कि इलाहाबाद में पूरे जोर-शोर से चल रहा था। इसके कई कारण है एक तो मैं धार्मिक नही हूं और दूसरा वहां जाने में मुझे कोई फायदा नही दिखाई देता क्योकि वहां पर बालशोषण और बड़े-बड़े धन्धें होते हैं। वहां पर न जाने का एक बहुत बड़ा कारण गंगा का प्रदूषण है जो कि सिर्फ मेरे जैसे अविश्वासी या नास्तिक का ही नही बल्कि बहुत बड़े आस्तिक लोगों का भी न जाने का यही कारण हो सकता है।
इलाहाबाद में यमुना नदी पवित्र गंगा नदी में मिल जाती है और इलाहाबाद से फिर गंगा नदी ही अविरल बहती है। धार्मिक लोगों के लिये यह एक पवित्र स्थान है क्योकि पावन यमुना पतित पावन गंगा में ही समाहित हो जाती है जिससे उसकी पावनता दोगुनी हो जाती है। इसके अतिरिक्त इस जगह के पीछे एक कथा है कि यहां पर अमरता का अमृत गिरा था और इसलिये यह संगम स्थल मेले का मुख्य स्थान है। कुम्भ मेले में आने वाले लोगों का मुख्य उद्देश्य यही रहता है कि वह गंगा में डुबकी लगाये। ऐसा माना जाता है कि यह आपके पापों को धोता है। उनके लिये यह एक पवित्र स्नान है और पापों से मुक्त करता है। मुझे तो यह सबसे ज्यादा गंदगी वाली जगहों में से एक जगह लगती है जहां पर लोग अपने आप को धोते हैं। शायद यह जगह दो नदियों के संगम का सबसे ज्यादा प्रदूषित स्थान है। यमुना नदी दिल्ली, आगरा व अन्य शहरों का प्रदूषण और अपशिष्ट जल अपने साथ लाती है और गंगा नदी भी पहाड़ों से निकलकर मैदानों की सारी गंदगी को इसी में मिला देती है। क्या वास्तव में आप इस गंदगी में कूदना चाहते है जिसमें मानवीय और औद्योगिक अपशिष्ट होता है?
हांलांकि मैं जानता हूं कि उन अंधविश्वासियों को उस प्रदूषित जल में नहाने और कुछ घूंट पानी पीने से से रोकने का कोई रास्ता नही है। ऐसा माना जाता है कि यह आपके पापों को धोता है लेकिन यह भी सच है कि यह जल अपने साथ कई तरह की बीमारियां जैसे एलर्जी, त्वचा रोग, पेट सम्बन्धी रोग, पाचन समस्याएं और भी अन्य गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकता है क्योकि इस पानी में प्रदूषण होता है जो कि हमारे प्रतिदिन पीने वाले पानी के प्रदूषण स्तर से कहीं अधिक होता है।
अगर आप अपने शरीर के साथ ऐसा करना चाहते है तो मुझे नहीं लगता कि आपको बीमार होने से कोई बचा सकता है। मुझे ऐसे कर्मकाण्डीय स्नान से आपत्ति है क्योंकि परोक्ष रूप से यह मुझे भी नुकसान पहुंचाता है। यह बताता हूं कि कैसे? 14 जनवरी के बहुत बड़े जनसैलाब के स्नान से पहले और बाद के किये गये जल के परीक्षणों से पता चला है कि उस जल में प्रदूषण का स्तर बहुत अधिक है और यह स्तर लोगों के नहाने के बाद दोगुना हो गया था।
यह आश्चर्य की बात नहीं है कि लगभग आठ करोड़ लोगों ने अपने पापों को धोने के साथ-साथ अपनी शारीरिक गंदगी को भी उसमें धोया था। उम्मीद की जा रही है कि अपने पूर्ण समय में कुम्भ मेले में दस करोड़ लोग स्नान करेंगे और इसके अतिरिक्त स्नान के साथ वह धार्मिक अनुष्ठानों का अपशिष्ट भी नदी में प्रवाहित करेंगे। ऐसा करने से आप हमारे देश की सबसे बड़ी नदी को प्रदूषित कर रहे हैं। यह एक सच है कि यह मेरे साथ-साथ हर दूसरे भारतीय को प्रभावित कर रही है और भारतीय ही क्यों पृथ्वी पर रहने वाले हर प्राणी को प्रभावित कर रही है।
अधिकारियों ने अब इस पानी में और अधिक पानी छोड़ा है क्योकि वह चाहते है कि इससे प्रदूषण का स्तर एक स्थान पर इतना अधिक न होने पाये और शायद वह यह भी नही चाहते कि इतने बड़े जनसैलाब मे बीमारी और रोगों के फैलने का समाचार अन्तर्राष्ट्रीय ख़बर बने।
निष्कर्ष यही है कि इस त्यौहार में अपनी भागीदारी देना उचित नही है जो कि एक आध्यात्मिक बकवास है, जिसमें मानवीय शोषण होता है। इसमें तो सिर्फ धन्धा ही होता है और यह आपके स्वास्थ्य के साथ-साथ हमारे पर्यावरण को भी हानि पहुंचाता है। अब आप खुद ही सोच सकते है कि आप क्या करना चाहेंगे?
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