धर्म के कपटपूर्ण संसार में दो तरह के लोग रहते हैं – 11 जून 2015

कल मैंने आपको बताया था कि कुछ लोग आधिकारिक आँकड़ों पर भी भरोसा नहीं करते और कहते हैं कि वे महज झूठे आँकड़े हैं। कल के उदाहरण को आगे बढ़ाते हुए वे ज़ोर देकर कहते हैं कि विवाह में बलात्कार जैसी कोई चीज़ संभव होती ही नहीं है भले ही संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन बताते हों कि इनका प्रतिशत भारत में बहुत ज़्यादा है! आज मैं इस भ्रमजाल में रह रहे धार्मिक और दक़ियानूसी लोगों के विषय में और अधिक विस्तार से लिखना चाहता हूँ।

सहज-विश्वासुओं अथवा आस्तिकों के लिए धर्म एक भ्रमपूर्ण संसार रचता है। इस संसार में इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि अनगिनत लोग आपको बताएँ कि बहुत से पति अपनी पत्नियों के साथ बलात्कार करते हैं- उनके लिए विवाह में बलात्कार का अस्तित्व ही नहीं होता। आप विश्वास ही नहीं करेंगे क्योंकि आपके संसार में लोग संयुक्त परिवार में रहते हैं, हर एक की अपनी जगह होती है, महिलाएँ अपने पतियों और पिताओं या ससुरों की आज्ञा का पालन करती हैं और बदले में वे महिलाओं की सुरक्षा और देखभाल करते हैं। अब आप आँख बंद कर लेते हैं और दिखावा करते हैं कि ये आधिकारिक आँकड़े गलत हैं क्योंकि वे आपके भ्रमजाल से मेल नहीं खाते।

बहुत से लोग जानते हैं कि यह गलत है। कि उनका यह संसार भ्रमपूर्ण और झूठा है और यह भी कि बाहर से आने वाली जानकारियाँ, संयुक्त राष्ट्र के आँकड़े, जिन्हें वे मानने से इंकार कर रहे हैं, सही और पुख्ता हैं। यहाँ तक कि उनमें से बहुत से लोग उसके बारे में स्वयं प्रचार करके या प्रवचनों और विभिन्न धार्मिक कर्मकांडों का आयोजन करके इस भ्रम को और आगे फैलाने में अपना योगदान भी देते हैं।

लेकिन इन लोगों के अलावा भी लोग होते हैं, जो वास्तव में और पूरी ईमानदारी के साथ इस भ्रम पर विश्वास करते हैं। अन्य लोगों द्वारा बताई जा रही सच्ची बातों पर वे सीधे आँख मूँद लेते हैं। वाद-विवाद की स्थिति में वे कान बंद कर लेते हैं और आपकी बात मानने से सीधे इंकार कर देते हैं। ऐसी चर्चाओं से वे अपने आपको बाहर कर लेते हैं और फिर आपके प्रश्नों और तर्कों का उत्तर ही नहीं देते क्योंकि वे जानते हैं कि सिर्फ कुछ शब्दों की मदद से आप उनके झूठे पाखंडी संसार की दीवारें गिरा सकते हैं!

तो इस तरह धर्म के इस कपटपूर्ण संसार में दो तरह के लोग रह रहे होते हैं: पाखंडी, जो जानते हैं कि यह गलत है और दूसरे, जड़मूर्ख, जो अंधी भेड़ों की तरह इतना डरे हुए होते हैं कि सच से आँख मिलाने की उनकी हिम्मत ही नहीं होती। प्रथम वे, जो वास्तविकता जानते हैं कि यह गलत है और फिर भी उसी गलत राह पर चलते हैं और हर वक़्त दूसरों के सामने उस झूठ को सच की तरह पेश करते हैं। दूसरे वे, जो यथार्थ की ओर से आँखें मूँदे रहते हैं और बिना कोई प्रश्न पूछे, कि सच क्या है, इस पूरे तामझाम का अर्थ क्या है, किसी पुरोहित या गुरु के मार्गदर्शन में उसी अंधेरे रास्ते पर चलते चले जाते हैं।

अब इन दोनों में से आप क्या होना चाहते हैं?

लेकिन अपनी आँखें खोलने और देख-सुनकर ईमानदारी के साथ सच को स्वीकार करने का विकल्प भी आपके पास मौजूद है। अपने भ्रमजाल से बाहर निकलें। बाहर की ओर एक कदम आगे बढ़ाते ही इस संसार को अपने चारों ओर टूटकर बिखरता देखेंगे-एक बार सक्रिय होकर दिमाग से सोचने और अपने आपसे प्रश्न पूछने की भर ज़रूरत है!

मेरा दावा है कि अंत में आप स्वतंत्र और हल्का महसूस करेंगे, स्वयं सोचने-विचारने की शक्ति आपमें पैदा हो जाएगी।

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