संथारा की मूर्खतापूर्ण परंपरा की वजह से आत्महत्या को न्यायसंगत नहीं ठहराया जा सकता! 26 अगस्त 2015

धर्म

सोमवार को मैं एक टी वी परिचर्चा के लिए बहुत लघु-सूचना पर दिल्ली गया था। चर्चा का विषय था, संथारा, जो जैन समुदाय की एक धार्मिक प्रथा है। पहले मैं आपको बताता हूँ कि ठीक-ठीक यह प्रथा है क्या और इस विषय पर अभी अचानक टी वी चर्चा क्यों आयोजित की गई और इस पर मेरा रुख क्या रहा, यह भी स्पष्ट करूँगा।

संथारा, जिसे सल्लेखना भी कहते हैं, जैन धर्म में आस्था रखने वालों की एक प्रथा है, जिसके अनुसार 75 साल से अधिक उम्र वाले लोग स्वेच्छा से मृत्यु का वरण करते हैं। जैन धर्म का कोई वृद्ध व्यक्ति यदि यह महसूस करता है कि जीने का अब कोई अर्थ नहीं रह गया है, अगर वह मुक्ति चाहता है, अगर उसे लगता है कि संसार को उसकी ज़रूरत नहीं है या स्वयं उसे संसार की ज़रूरत नहीं रह गई है तो वह व्यक्ति खाना-पीना छोड़ देता है। अब वह एक कौर भी मुँह में नहीं डालेगा, न ही एक घूँट पानी पीएगा। वह भूख और प्यास सहन करते हुए मौत को गले लगाएगा-और उसके सधर्मी नाते-रिश्तेदार और मित्र उसकी प्रशंसा करेंगे।

अतीत में इसी तरह से उनके संतों ने प्राण त्यागे थे और मरने के इसी तरीके को जैन धर्म गौरवान्वित करता है। लेकिन हाल ही में हाई कोर्ट ने इस प्रथा पर पाबंदी लगा दी है क्योंकि कोर्ट उसे आत्महत्या मानता है।

स्वाभाविक ही, जैन समुदाय इससे नाराज़ है और न्याय पाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की शरण लेने का विचार कर रहा है, जिससे इस पाबंदी को हटवाया जा सके। उनका कहना है कि कोर्ट या क़ानून प्राचीन समय से चली आ रही इस प्रथा और परंपरा को वर्जित घोषित नहीं कर सकते।

तो इस विषय पर मैं इन पाँच महानुभावों के साथ टी वी पर बहस कर रहा था। मैंने साफ शब्दों में कहा कि यह आत्महत्या के सिवा और कुछ नहीं है-और इसीलिए कोर्ट ने उस पर पाबंदी लगाई है! भारत में हर साल लगभग 200 लोग इस तरीके से खुद अपनी जान ले लेते हैं! अगर कोई भूख-हड़ताल पर बैठता है तो सरकार उसे मरने नहीं देती- बल्कि वह उसे ज़बरदस्ती खाना खिलाती है! और इधर आप खाना-पीना छोड़ देते हैं कि मर जाएँ-क्या फर्क है, दोनों में?

मेरी बात का ज़बरदस्त विरोध हुआ- यह कहते हुए कि यह आत्महत्या नहीं है बल्कि आत्मा की शुद्धि के लिए किया जाने वाला तप है। आत्मा जानती है कि उसका समय पूरा हो गया है और पुनर्जन्म के लिए यह प्रक्रिया ज़रूरी है।

मैंने उनके इस जवाब का खण्डन करते हुए कहा कि यह महज बकवास है और आत्मा या पुनर्जन्म जैसी कोई चीज़ नहीं होती। अगर आप उन्हें खुद की हत्या की इजाज़त देते हैं तो आपको सभी को आत्महत्या की इजाज़त देनी होगी। फिर ऐसा कानून बनाइए कि सभी अपनी मर्ज़ी से मृत्यु का वरण कर सकें- तब हर कोई, जब उसकी मरने की इच्छा होगी, अपनी हत्या का निर्णय ले सकेगा। लेकिन आप यह अधिकार सिर्फ अपने लिए रखना चाहते हैं क्योंकि दूसरों को इसकी इजाज़त ही नहीं है! और ऐसी मौत को आप गौरवान्वित कर रहे हैं, जिससे लोग उनका अनुसरण करने लगें! आप उन्हें आत्महत्या करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं!

उन्होंने कहा कि उनके पूर्वज भी सदा से इस प्रथा का पालन करते रहे हैं। एक वकील ने, जो इस पाबंदी का विरोध कर रहे हैं, दावा किया कि यह आत्महत्या है ही नहीं क्योंकि आत्मा समय आने पर ही अपने शरीर का त्याग करेगी। इस तरह लोग बिना खाए-पिए महीनों और सालों पड़े रहते हैं। इसके अलावा युवकों को संथारा लेने के लिए नहीं कहा जाता, सिर्फ 75 साल से अधिक उम्र वाले ही संथारा ले सकते हैं।

मेरे विचार से यह कोई तर्क नहीं है कि 'हमारे पूर्वज यही किया करते थे'! इसका अर्थ यह नहीं है कि यह ठीक है और सिर्फ इसलिए कि अतीत में वे कोई गलत बात कर रहे थे इसलिए आपको भी वही करते चले जाना चाहिए! यही तर्क हिंदुओं की सती प्रथा के लिए भी दिया जाता था, जिसमें पति की चिता के साथ पत्नी भी आत्महत्या कर लेती थीं! जब तक उस पर पाबंदी नहीं लगी थी, वास्तव में उन्हें इस परंपरा का अनुपालन करने के लिए मजबूर किया जाता था यहाँ तक कि जबर्दस्ती मृत पति की चिता में झोंक दिया जाता था! तब भी बहुत से लोगों ने इसका विरोध किया था- लेकिन आखिर किसी देश के क़ानून धर्म या परंपरा के अनुसार नहीं बनाए जा सकते!

आपका यह तर्क भी, कि संथारा सिर्फ वृद्ध व्यक्ति ही ले सकते हैं, एक बेहद कमजोर तर्क है! क्योंकि इस बात का निर्णय कौन करेगा कि कौन वृद्ध है और कौन वृद्ध नहीं है? यह दावा कौन कर सकता है कि वृद्ध लोग समाज के लिए उपयोगी नहीं रह गए हैं या उस पर बोझ बन गए हैं? आप उनके मन में यह विचार क्यों डालना चाहते हैं कि आप 75 साल के हो गए हैं इसलिए अब आपको मरना होगा? बहुत से राजनीतिज्ञ और दूसरे क्षेत्रों में काम करने वाले लोग अस्सी-अस्सी साल से ज़्यादा उम्र के हो चुके हैं और अपना काम भलीभाँति अंजाम दे रहे हैं! यह देखते हुए कि मेरी नानी मेरी बेटी के लिए कितनी मूल्यवान है, मैं इस मूर्खतापूर्ण परंपरा की खातिर उसे खोना नहीं चाहूँगा! वह इस समय 95 साल की है, शायद उससे भी अधिक- यानी इस तरह हम उसे 20 साल पहले ही खो चुके होते!

और मैं इस बात का जवाब भी देना पसंद नहीं करूँगा कि कोई व्यक्ति एक घूँट पानी पिए बगैर भी एक माह तक ज़िंदा रह सकता है- सालों जीवित रहने की बात तो छोड़ ही दीजिए! यह बकवास के सिवा कुछ नहीं है और मेरी नज़र में पाखंडियों का बहुत बड़ा कपटपूर्ण दावा है- आखिर धार्मिक धोखेबाज़ों का तो काम ही यही है!

मेरा विश्वास है कि यह पाबंदी बनी रहेगी और मेरे खयाल से यह अच्छा ही है कि आखिरकार यह प्रथा भी समाप्त हो जाएगी।

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