मंदिरों का धंधा – जितना ज़्यादा धन दो उतना ज़्यादा ईश्वर लो! 28 मार्च 2012

पिछले दिनों मैं आंध्र प्रदेश के तिरुपति में स्थित तिरुमाला वेंकटेश्वर मंदिर के बारे में एक ऑनलाइन रिपोर्ट पढ़ रहा था, जिसमें मंदिर की गतिविधियों का, वहाँ पहुँचने वाले श्रद्धालुओं का और वहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत किया गया है। मेरे विचार में वहां चल रही गतिविधियाँ आम जनता को नाराज़ करने के लिए काफी होनी चाहिए मगर विडम्बना यह है कि शायद यह मंदिर देश का सबसे लोकप्रिय और धनी मंदिर है।

रोज़ लगभग 65000 श्रद्धालु इस मंदिर में प्रवेश करना और वहाँ ‘ईश्वर’ का दर्शन करना चाहते हैं। यह एक औसत आंकड़ा है जबकि सप्ताहांत में वहाँ दर्शन करने वालों की संख्या 80000 और धार्मिक त्योहारों के समय 100000 तक पहुँच जाती है। ये आंकड़े अविश्वसनीय लगते हैं और आप सोच सकते हैं कि जिस मंदिर में इतनी बड़ी संख्या में लोग पूजा-पाठ करते हैं वहाँ ईश्वर के दर्शन करना अवश्य ही एक अनोखा आध्यात्मिक अनुभव होता होगा। ईमानदारी से कहूँ तो मैं ऐसा कतई नहीं समझता।

वहाँ की यात्रा में सबसे पहले तो हर तरफ मौजूद विशाल भीड़ से आपको निपटना पड़ता है। जब भी आप वहां जाते हैं वहाँ असंख्य लोग होते हैं और जब आप दरवाजे से मंदिर के भीतर प्रवेश करना चाहते हैं तब समझ लीजिये कि आप एक लगातार आगे बढ़ती विशाल भीड़ से घिरे होंगे। इसलिए आपको भी लगातार आगे बढ़ते रहना है अन्यथा भीड़ आपको रौंदती हुई निकल जाएगी। मंदिर के कर्मचारी लगातार लोगों को आगे बढ़ते रहने की हिदायत देते रहते हैं, यहाँ तक कि फटकारते हैं, ठेलते रहते हैं, जिससे एक ही दिन में ज़्यादा से ज़्यादा दर्शनार्थी देवता का दर्शन कर सकें।

आप कल्पना कर सकते हैं कि इतने लोगों की ठेलती हुई भीड़ के बीच आप भी लगातार आगे बढ़ते हुए किस तरह शांतिपूर्वक बैठकर, अपने देवता की, जिसे आप ईश्वर मानते हैं, पूजा-अर्चना कर पाते होंगे! जी नहीं-अनुमानतः कोई भी श्रद्धालु देवता के सामने डेढ़ सेकंड से ज़्यादा टिका नहीं रह सकता, यानी उसे अपने ईश्वर को देखने का सिर्फ इतना समय ही मिल पाता है! क्या आप अब भी समझते हैं कि यह कोई विशिष्ट अनुभव हो सकता है? देवता का डेढ़ सेकंड का दर्शन क्या इतना बहुमूल्य हो सकता है कि उसके सामने पहुँचने के लिए श्रद्धालुओं को इतना कष्ट उठाना पड़े?

तो दर्शन का यह विशिष्ट सम्मान आपको अत्यंत कष्ट भुगतने के बाद ही प्राप्त हो पाता है! मंदिर के बाहर इतने ज़्यादा लोग लाइन लगाकर खड़े होते हैं कि अक्सर 15 से 20 घंटे धूप में खड़े-खड़े इंतज़ार करने के बाद ही मंदिर में प्रवेश करने का सौभाग्य मिल पाता है! लेकिन मंदिर प्रवेश की त्वरित सेवा भी वहाँ उपलब्ध होती है- बस, थोड़ा अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है! अक्सर मंदिरों में प्रवेश के लिए विभिन्न मूल्यों के टिकिट होते हैं और जितना ज़्यादा कीमती टिकिट आप खरीदेंगे उतना ही जल्दी आप दर्शन लाभ का सौभाग्य प्राप्त कर सकेंगे! जी हाँ, वहाँ मंदिरों में वे ईश्वर बेच रहे हैं! अगर आपके पास पैसा है तो आप ज़्यादा पैसा देकर ईश्वर तक शीघ्रतापूर्वक पहुँचने वाली कतार का टिकिट खरीद सकते हैं।

और अगर आपके पास कुछ ज़्यादा ही धन है तो आप बायपास से निकलकर और जल्दी ईश्वर के दर्शन का लाभ ले सकते हैं! और अगर आपके पास वीआईपी पास है तो फिर बिना लाइन लगाए आप सीधे अंदर प्रवेश कर सकते हैं! जी हाँ, यह मंदिर वीआईपी पास भी जारी करता है। ये पास गवर्नरों, मंत्रियों और दूसरे महत्वपूर्ण सरकारी मुलाजिमों के लिए जारी किए जाते हैं-और स्वाभाविक ही उनके लिए भी, जो एक करोड़ या ज़्यादा की विशाल रकम, जो लगभग 200000 यू एस डॉलर होती है, दान में देते हैं। सुबह और शाम के कुछ खास घंटे होते हैं, जब ईश्वर सिर्फ इन खास लोगों के लिए ही उपलब्ध होता है। साधारण श्रद्धालुओं को इंतज़ार करना पड़ता है, उस समय मंदिर उनके लिए मंदिर बिल्कुल बंद होता है। इस तरह स्पष्ट है कि ईश्वर उन श्रद्धालुओं पर ज़्यादा प्रसन्न रहता है, जिनके पास ज़्यादा धन है- वह उन्हें तुरत-फुरत दर्शन दे देता है और वह भी ज़्यादा समय के लिए भी। मंदिर और धार्मिक भवन धार्मिक व्यापार के केंद्र हैं और वहाँ के पंडे-पुजारी श्रद्धालुओं और आस्थावान लोगों को गाय समझते हैं, जिन्हें आसानी के साथ धन और दान-दक्षिणा हेतु दुहा जा सकता है, यहाँ तक कि टिकिट लगाकर भी।

श्रद्धालुओं को न सिर्फ घंटों लंबी कतारों में इंतज़ार करना पड़ता है बल्कि उन्हें मंदिरों में मौजूद हर तरह के भ्रष्टाचार का सामना भी करना पड़ता है। अपना प्रवेश-पत्र और रहने की जगह पाने के लिए वहाँ कुछ दफ्तरी कार्यवाहियों से गुज़रना होता है, जिन्हें एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय भाग-दौड़ करते हुए आप स्वयं पूरा कर सकते हैं। संभव है आपको घंटों इन कार्यवाहियों में व्यस्त रहना पड़े और सफलता की कोई गारंटी भी नहीं। या फिर आप किसी बिचौलिये (एजेंट) की मदद लें, दुगना खर्च करें और शीघ्र ईश्वर के करीब पहुँच जाएँ! वह भी आपको टिकिट वहीं से लाकर देगा मगर कुछ ज़्यादा कीमत में और अब आपको उसका मेहनताना भी अदा करना होगा। क्या यहाँ मंदिरों में ईश्वर रोजगार पैदा कर रहा है या कि यह सीधी-सीधी श्रद्धालुओं की लूट-खसोट है?

सारांश यह कि: अगर आप औसत आय वाले एक सामान्य व्यक्ति हैं तो पहले तो आपको तपती धूप में भीड़ के साथ कतारबद्ध होकर 20 घंटे इंतजार करना होगा और फिर धक्के खाते हुए ईश्वर की मूर्ति तक पहुँचकर डेढ़ सेकंड उस पर एक नज़र डालकर धक्के खाते हुए ही बाहर निकल जाना होगा। अगर आप कोई वीआईपी, राजनीतिज्ञ या अधिकारी हैं या आपके पास दान देने के लिए बड़ी भारी रकम है तो फिर ईश्वर तुरत-फुरत आपका स्वागत करेगा। है कोई धर्म से बढ़कर आसान और लाभकारी धंधा?

मैं पहले भी इस मंदिर के विषय में लिख चुका हूँ। तब मैंने उसकी विशाल संपत्ति के बारे में बताया था, उसे दान में मिलने वाली विशाल राशियों का ज़िक्र किया था और यह भी बताया था कि इसी तरह के कई और मंदिर देश भर में फैले हुए हैं, जहां इसी तरह का भ्रष्टाचार और पैसे और ताकत का खेल चल रहा है। वे बड़ी-बड़ी राशियाँ दान में प्राप्त करते हैं, उनके पास टनों सोना-चाँदी तिजोरियों में बंद है और वहाँ के पंडे-पुजारी और कर्मचारी अक्सर बहुत धनवान होते है। लाखों की संख्या में लोग रोज़ वहाँ की यात्रा करते हैं और सोचते हैं कि वे अपना जीवन सफल कर रहे हैं, पुण्य-कार्य कर रहे हैं और उनके इस काम से सारे विश्व का भला होगा। लेकिन उनका यह कर्म दरअसल भ्रष्टाचार और अनाचार को बढ़ावा देने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता। क्या आप नहीं समझते कि अगर आप यही समय, पैसा और ऊर्जा गरीबों और दीन-दुखियों की सेवा करने में, उनकी पढ़ाई-लिखाई या स्वास्थ्य-सुधार के काम में व्यय करते तो ईश्वर आप पर ज़्यादा प्रसन्न होता?

इन बातों का पर्दाफ़ाश करने वाली कुछ रिपोर्टों की लिंक्स यहाँ दी जा रही हैं:

21-hour wait for fleeting darshan of the Lord at Tirumala

Is Lord Balaji temple at Tirumala only for VIPs?

Corruption is a way of life in Tirupati Tirumala Devasthanams

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