शिव लिंग – हिन्दू धर्म में लिंग की पूजा कैसे शुरू हुई – 17 फरवरी 2015

धर्म

आज हिंदुओं का त्योहार शिवरात्रि है, जिसे शिव और उनकी पत्नी पार्वती के विवाह के दिन के रूप में मनाया जाता है। सभी हिन्दू मंदिरों में यह दिन साल की सबसे बड़ी शिव-पूजा का होता है। आप में से अधिकांश यह जानते होंगे कि शिव की पूजा शिवलिंग या शिवलिंगम के रूप में की जाती है, जो लिंग के आकार की एक मूर्ति होती है। आज मैं आपके सामने हिन्दू धर्मग्रंथों में वर्णित इस पूजा की कहानी प्रस्तुत करना चाहता हूँ।

यह कहानी शिव पुराण और कई अलग-अलग ग्रन्थों में वर्णित है और स्वाभाविक ही, सबमें थोड़ा-बहुत अंतर है। आपकी जानकारी के लिए मैं उनमें से दो कहानियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

शिव की पहली पत्नी का देहांत हो गया और शिव उसके दुख में बेचैन, पागलों की तरह नंग-धड़ंग जंगल-जंगल भटकते रहे।

जंगल में बहुत से ऋषि-मुनि रहा करते थे-जो बहुत सी सिद्धियाँ प्राप्त महात्मा थे। उनकी पत्नियाँ भी उनके साथ रहा करती थीं और जब शिव इस तरह भटकते हुए वहाँ पहुँचे तो उन पत्नियों ने उन्हें नंग-धड़ंग देखा। सम्पूर्ण दैवी वैभव के साथ दमकता शिव का नग्न शरीर देखकर वे अपना संयम खो बैठीं और आनंदित होकर उनके पीछे भागने लगीं और अंत में उन्हें छूने लगीं, उनसे लिपटने लगीं।

संयोग से उसी समय उनके पति यानी वे ऋषि-मुनि भी वहाँ पहुँच गए और अपनी पत्नियों को शिव के निकट आलिंगन में देखकर क्रोधित हो उठे और अनैतिकता और व्यभिचार का आरोप लगाते हुए शिव को बहुत बुरा-भला कहने लगे। सबने मिलकर अपनी सिद्धियों को एकत्र किया और शिव को, बल्कि उनके लिंग को शाप दिया कि वह कटकर धरती पर गिर जाए!

इसी कहानी का एक दूसरा रूप भी है, जिसके अनुसार वे ऋषि-मुनि शिव पर नुकीले पत्थर फेंकते हैं, जिनकी चोटों से उनका लिंग कटकर नीचे गिर जाता है।

बहरहाल, कुछ भी हो, लिंग धरती पर गिर जाता है और जहाँ वह गिरता है, उसी जगह स्थिर खड़ा हो जाता है और दावानल की तरह आग के शोले में तब्दील हो जाता है। जहाँ भी वह जाता-कैसे जाता था, यह न पूछिए, मेरी पत्नी ने भी पूछा और मैं उसका जवाब नहीं दे पाया-सामने आने वाली हर चीज़ स्वाहा हो जाती और हर तरफ हाहाकार मच जाता। दुनिया भर में अपशकुन दिखाई देने लगे और हर तरफ विनाशकारी घटनाएँ होने लगीं जैसे प्रलय आ गया हो। पर्वत गड़गड़ाहट के साथ टूट-फूटकर गिरने लगे, हर तरफ आग फैल गई और लोग आतंकित हो उठे। क्या संसार का अंत होने वाला है?

अब तो सभी देवता और ऋषि-मुनि घबरा गए और संसार के रचयिता, ब्रह्मा के पास गए। जानकारी मिलते ही वे उन सभी को लेकर शिव के पास गए और उनसे दया की याचना करने लगे। उनकी पूजा-अर्चना के पश्चात उन्होंने कहा: "कृपा करके अपना लिंग पुनः धारण कर लीजिए, वह सारे संसार को तहस-नहस कर देगा!"

उनकी आराधना से शिव प्रसन्न हुए और अपना लिंग वापस लेने के लिए राज़ी हो गए। लेकिन उन्होंने एक शर्त रखी: "मैं अपना लिंग तभी वापस लूँगा जब आप उसकी पूजा-अर्चना शुरू कर देंगे!"

और इस तरह सारे संसार में, मंदिरों में शिव-लिंगों की स्थापना की गई और शिव के लिंग की पूजा-अर्चना की शुरुआत हुई।

आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि यह एक मज़ाक है! लेकिन नहीं, मज़ाक नहीं है-यहाँ इसी कहानी का एक और संस्करण प्रस्तुत है, उम्मीद है, आप पसंद करेंगे:

इस कहानी के अनुसार शिव का अपनी दूसरी पत्नी, पार्वती के साथ विवाह हो चुका है। और वे जंगलों में नंग-धडंग जंगलों में घूम रहे हैं किसी दुःख से नहीं बस ऐसे ही क्योंकि उनका मन कर रहा है और इस तरह उनका सामना ऋषियों की पत्नियों से होता है। पत्नियाँ उनके शरीर के मनभावन आकर्षण से अपने आपको बचा नहीं पातीं और उनसे लिपटने लगती हैं। लेकिन उनके पतियों को यह अच्छा नहीं लगता। वे शिव के लिंग को शाप देते हैं और वह वहीं धरती पर गिर जाता है और सारे संसार में हाहाकार और प्रलय की स्थिति पैदा हो जाती है।

इस संकट से निपटने के लिए सब इकट्ठा होते हैं और सोचते हैं कि शिव के लिंग को कौन पकड़ कर लाए! और अगर पकड़ भी लाए तो उसे कहाँ रखा जाए? जी हाँ, यह विचार आते ही इसका स्वाभाविक उत्तर भी उन्हें मिल गया: सिर्फ पार्वती ही शिव के लिंग को अपनी योनि में धारण कर सकती हैं!

वे सभी पार्वती की आराधना करते हैं और इस तरह इस प्रथा की शुरुआत होती है: योनि में स्थापित खड़े शिवलिंग की पूजा!

शिवलिंग के बारे में यानी हिन्दू धर्म के सबसे बड़े पाखंड के बारे में कुछ और कहानियाँ लेकर मैं कल फिर हाजिर होऊँगा। तब तक मेरे ब्लॉग का इंतज़ार करें।

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