ये संत हैं या राजनेता – शंकराचार्य ने कुम्भ मेले में जाने से मना कर दिया – 25 जनवरी 2013

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

14 जनवरी 2013 को इलाहाबाद में पहले दिन ही पवित्र गंगास्नान के साथ ही कुम्भ मेला का शुभारम्भ हो गया था, पर इससे काफी पहले से ही कुम्भ मेले के बारे में बाते शुरू हो गयी थी। तैयारियां तो वैसे भी चल ही रही थी, लोग शिविर में जाने से पहले ही उसकी बुकिंग कराने में लगे हुये थे, साधुओं, गुरुओं और सभी धार्मिक लोगों ने भी इलाहाबाद जाने की यात्रा प्रारम्भ कर दी थी। तभी मीडिया द्वारा भारत में सबसे बड़ी खबर प्रसारित की गयी कि शंकराचार्य स्वरूपानन्द ने कहा कि वह कुम्भ मेले में नहीं आयेंगे, क्यों नहीं आयेंगे? इसका कारण हैं उनका अहंकार या अहम, इसके विषय में आपको विस्तार से बताता हूँ।

हिन्दू धर्म में चार मुख्य आध्यात्मिक गुरू होते हैं, हिन्दू धर्म के अनुसार चार व्यक्ति मुख्य पदों पर आसीन होते हैं। अतः आप शंकराचार्य को हिन्दू पोप कह सकते हैं, परन्तु यहाँ चार होते हैं। स्वरूपानन्द ने बताया कि वह इस सबसे बड़े पर्व में शामिल नहीं होंगे। एक सनसनी।

अगर हम पिछले कुछ सप्ताह पहले की बात करें तो यह पता चलता है कि सरकारी अधिकारी व सरकारी महकमा पूरे इंतजामात करने में व्यस्त था क्योकि उन्हें आशा थी कि दस करोड़ लोग इस मेले में शामिल होंगे। करोड़ों का खर्चा था इस आयोजन में जिसे कि बहुत सी चीज़ों में जैसे लोगों को रहने की, सोने, खाने-पीने, शौचालय, सुरक्षा, चिकित्सीय व्यवस्था, खाद्य सामग्री एवं साफ-सफाई आदि पर खर्च किया गया। यह भी ध्यान दिया गया कि लोगों ने जहां अपने कैम्प की बुकिंग करायी है वहां पर उनकी सुविधानुसार व्यवस्था की गयी है या नही। व्यवस्था कर्मचारियों के पास उन जगहों के नक्शें है व सूची भी है जिन जगहों के लिये पहले से लोगों ने आवेदन किया हुआ था। वहां पर रहने के लिये आपको धन के साथ-साथ धार्मिक अधिकार भी चाहिये जिससे कि आप वहां रह सकें। यह बात तो तय है कि इन दोनो चीज़ों की शंकराचार्य के पास कोई कमी नहीं थी।

उन्हें स्थान दिया गया पर दुर्भाग्य से यह वह स्थान नही था जो वे चाहते थे। वह एक ही ब्लॉक चाहते थे जहां पर चारों शंकराचार्य एक साथ रह सकें। इसका कारण उन्होंने बताया कि कुछ लोग है जो अपने आपको शंकराचार्य कह रहें हैं और इसलिये वह चाहते हैं कि हम चारों शंकराचार्य एक साथ रहे नही तो लोग असमंजस की स्थिति में पड़ जायेंगें कि वास्तविक शंकराचार्य कौन है? और इसलिये ही वह चाहते है कि चारों शंकराचार्य एक साथ रहें। मेरी राय में तो वह बहुत ही अच्छा स्थान इसलिये मांग रहे थे जिससे मेले में आये हुए लोग आसानी से उन्हें देख सकें। वह चाहते थे कि साधू-सन्यासियों की भीड़ उनके चारों ओर हो।

सदियों से अभिनेताओं, प्रवक्ताओ, प्रवाचकों आदि लोगों को हमेंशा से ही बहुत ही अच्छा स्थान दिया गया है। शंकराचार्यों को भी हमेशा से विशेष व्यवस्था के साथ बहुत ही अच्छा स्थान दिया जाता रहा है जहां पर लोग आसानी से आ जा सकते है और या फिर उनके रहने की व्यवस्था मेन रोड पर ही रखी जाती है। इस बार जो स्थान उन्हें दिया गया उससे वो खुश नहीं थे इसलिये उन्होंने धमकी दे दी कि वह कुम्भ मेले में नहीं आयेंगे।

यहां तक कि मुख्यमंत्री ने भी उनसे अनुरोध किया कि वह कुम्भ मेले में आ जाये और वहां के धार्मिक माहौल में भी उनके इस निर्णय से फर्क पड़ा लेकिन शंकराचार्य तो अपनी जि़द पर ही अड़े रहे। वह अभी तक नही आये। उनके अनुयायी वहां पहले ही आ चुके थे लेकिन अभी उन्होंने वहां पर कदम नही रखा है। वे तो उत्तर प्रदेश में ही नही है बल्कि वह तो मध्य प्रदेश में अपने आश्रम में हैं शायद कुम्भ मेले के समाचार टेलीविज़न पर देख रहें हैं।

तो आपने देखा कि हिन्दू धर्म के सर्वोच्च धार्मिक नेताओं में अपने धर्म के प्रति कितना आदर और सम्मान है? और ये लोग गंगास्नान को कितना महत्वपूर्ण मानते होंगे? इसका जवाब तो स्पष्ट है कि बिल्कुल भी नही। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा पर्व है और धार्मिक लोगों के लिये वहां शामिल होना एक महत्वपूर्ण बात है लेकिन हिन्दू धर्म का उच्चपदासीन व्यक्ति इस मेले में शामिल नही होना चाहता क्योंकि मेले में उसे निश्चित स्थान पर उचित जगह नही दी गयी है। वह गंगा में स्नान नही करना चाहते, वह उस स्थान पर भी नही आना चाहते जहां अमरता का अमृत पृथ्वी पर गिरा था, वह तो बस अपना टेन्ट ऐसी व्यस्त जगह चाहते हैं जहां लोग आसानी से उन्हें व उनकी महत्वता को देख सकें।

यह एक अन्य प्रमाण है इस बात को साबित करने के लिये कि ये सभी धार्मिक नेता वास्तव में राजनेता है और वह इस बात पर जरूर गुस्सा हो जायेंगे अगर उन्हें विशिष्ट व्यक्तियों की तरह सम्मान नही मिलेगा क्योकि यह उनका अधिकार है। यह धर्म की नही सम्मान की बात है। बेशक! उन्हें यह बिल्कुल नही मंजूर है कि उनका टेन्ट ज़रा भी पीछे हो, थोड़ा कमतर भी हो या फिर वह उन साधु सन्यासियों के साथ भी उस ब्लॉक में नही रहना चाहते क्योकि फिर लोग शंकराचार्यों को न देखकर दूसरे साधु सन्यासियों को देखेंगे। इससे तो यही लगता है कि वह प्रदर्शन करना चाहते हैं। वैसे यह प्रदर्शन आप सभी शंकराचार्यों में देख सकते हैं, ये शंकराचार्य हमेशा चांदी के सिंहासन पर रहते है, आभूषणों से युक्त, अनुयायियों की भीड़ चारों ओर रहती है और भीड़ चेतावनी देते हुए चलती हैं कि एक महत्वपूर्ण व्यक्ति (शंकराचार्य) आ रहें हैं। इस उच्च पद पर बहुत अहंकार आ जाता है और अहंकार के साथ-साथ धन भी, जिससे एक बार फिर यह वैराग्य की अवधारणा गलत साबित हो जाती है जो ये लोग बड़ी विनम्रता से अपने प्रवचन में देते रहते हैं। वास्तव में धार्मिक पाखण्ड अपने चरम पर है।

शंकराचार्य स्वरूपानन्द पहली डुबकी और पहले स्नान के समय वहां पर नही थे। कुछ और तिथियां निर्धारित की गयी है जब बड़े-बड़े लोग वहां गंगास्नान करेंगे। हो सकता है कि बाद की तिथियों में शंकराचार्य वहां जाए, पर यह भी स्पष्ट है कि बाद में कुम्भ मेले में जाना व्यापारिक हित को दर्शाता है जिससे कि शिविरों से अच्छी दान दक्षिणा की प्राप्ति हो सके। यह बात न ही पवित्रता के बारे में है, न ही धार्मिकता, न ही पावनता और न ही गंगा में स्नान की है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि यह सब बिल्कुल भी महत्वपूर्ण नही है और वैसे भी यह सब नाटक है।

सावधान! श्रीमान शंकराचार्य जी ऐसा करने से आप स्वर्ग में अपनी जगह को खो सकते है।