स्कूलों में धार्मिक शिक्षा देना बच्चों के लिए खतरनाक हो सकता है – 21 जुलाई 2011

जैसा कि कल मैंने ज़िक्र किया था, धर्म व्यक्तिगत चुनाव (पसंद) का विषय होना चाहिए और हमें बच्चों को अपना स्वतंत्र निर्णय लेने का यह अधिकार प्रदान करना चाहिए, भले ही कुछ कट्टर धार्मिक आस्थाओं वाले अभिभावक यह बात स्वीकार न करें। इस दृष्टिकोण से विचार करने पर मुझे एक बात समझ में नहीं आती कि क्यों आज भी बहुत से देशों में धर्म स्कूलों में पढ़ाया जाने वाला विषय बना हुआ है।

बहुत से यूरोपीय देशों में सरकारी स्कूलों में ईसाई धर्म पढ़ाने की कक्षाएं होती हैं, अमरीका में अभिभावक अपने बच्चों को हर रविवार अपने पसंदीदा धार्मिक स्कूलों में भेजते हैं और कई मुस्लिम देशों में तो हर विषय के साथ बच्चों को इस्लाम पढ़ाया जाता है। हालाँकि भारत में एक विषय के रूप में ‘धर्म’ नहीं पढ़ाया जाता मगर हिन्दू धार्मिक कथाएँ बच्चों की किताबों और कक्षाओं में अक्सर प्रवेश पा जाती हैं। अधिकतर देशों में कुछ निजी स्कूल एक विशेष धर्म द्वारा चलाए जाते हैं, जहाँ अभिभावक अपने बच्चों को इसलिए भेजते हैं कि वे चाहते हैं कि उनके बच्चों की परवरिश एक खास धार्मिक माहौल में हो।

इस विषय में मेरा प्रश्न यह है कि आखिर इस शिक्षा से बच्चे क्या प्राप्त करते है? उनके जीवन में यह शिक्षा किस तरह उपयोगी है? फिर उन विषयों पर उन्हें नम्बर दिए जाते हैं, जिससे वे उन्हें बहुत महत्वपूर्ण मानने लगते हैं। तो यह तो सिर्फ धर्मग्रंथों को रटना और उनका अभ्यास करना हुआ और क्या आप उसकी स्मरणशक्ति की जाँच करने हेतु यह शिक्षा दे रहे हैं? या आप इस बात पर उन्हें नंबर देते हैं कि वे कितने धार्मिक हैं?

इन स्कूलों में बच्चे उसी धर्म के बारे में पढ़ते हैं, जो पहले से उनका धर्म होता है और अब वे उस धर्म में पूरी तरह दीक्षित हो जाते हैं। इस बात के अलावा कि बच्चों के लिए इतनी कम उम्र में किसी धर्म विशेष से जुड़ जाना ठीक नहीं है, वहां वे जो सीखते हैं, वह बहुत कुछ शिक्षक पर निर्भर करता है। किस्मत अच्छी है तो उसे कोई उदारवादी शिक्षक मिल जाता है और वह थोड़ा-बहुत दूसरे धर्मों के बारे में भी जान लेता है और उनके सकारात्मक पहलुओं को भी देख पाता है। अगर शिक्षक ज़्यादा ही दकियानूसी है तो बच्चा यही समझता है कि सिर्फ उनका ईश्वर, उनके धर्मग्रंथ और उनका धर्म ही सच्चा है। तो फिर वह पीढ़ी पिछली पीढ़ी से भी ज़्यादा दकियानूसी निकलती है और वह दूसरे धर्मों के लोगों को संदेह की निगाह से देखने लगता है।

मैं समझ नहीं पाता कि क्यों आप सिर्फ अपने धर्मग्रंथ पढाएं और उन्हें सत्य घोषित कर दें। किसी भी धर्म, संस्कृति या देश में वहां के सबसे बुद्धिमान लोगों ने वे धर्मग्रंथ लिखे होंगे और हम उन सभी को महान साहित्यिक रचनाएँ मान सकते हैं। उन्हें किसी आदर्श की भांति बच्चों के मन पर अंकित कर देना उचित नहीं है। वे ग्रन्थ अंततः मिथकीय कथाएँ हैं और उनमें से अधिकांश युद्धों, हत्याओं और बरबादियों से भरी पड़े हैं और जो बच्चों में यह भ्रम पैदा करती हैं कि उनका यह व्यवहार धार्मिक और अच्छा व्यवहार है।

उन बहुत से देशों में, जहाँ मुख्य धर्म इस्लाम है, ये शिक्षाएं बहुत उग्र हो सकती हैं क्योंकि एक धर्मग्रंथ और उनमें बताए गए आदेशों की कई व्याख्याएँ की जा सकती हैं। इस शिक्षा के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके ज़रिए शिक्षक, चाहें तो, बच्चों के मन में दूसरे धर्मों के प्रति घृणा की भावना भर सकते हैं और उन्हें दूसरे धर्मों को मानने वालों के विरुद्ध युद्ध के लिए तैयार कर सकते हैं। इसी का नतीजा है कि बहुत से युवक धर्म के नाम पर आतंकवादी कार्यवाहियां करने के लिए तैयार हो जाते हैं और वे स्कूल आतंकवाद की कार्यशालाएं बन जाते हैं। यह सब धर्म का ही किया-धरा होता है। मैं किसी विशेष धर्म के खिलाफ नहीं हूँ बल्कि धर्म की अवधारणा के ही खिलाफ हूँ, विशेष रूप से स्कूलों में धर्म की शिक्षा दिए जाने के तो सख्त खिलाफ हूँ।

इस निष्कर्ष पर पहुंचना कुछ अतिवादी लग सकता है और आप इतनी दूर तक न भी जाएँ तो भी आप इतना तो मानेंगे कि ये कक्षाएं बच्चों को एक-दूसरे से अलग करती हैं। भाषा या गणित जैसी दूसरी कक्षाओं की तरह वे एक कक्षा में एक साथ बैठ भी नहीं सकते। लोगों को अलग करने और दुनिया को हिस्सों में बाँटने के मामले में धर्म का यह पहला कदम होता है। वह हम सबको अलग-अलग वर्गों में विभक्त कर देता है। यही हमारे बच्चे इन कक्षाओं में सीखते हैं। लेकिन हम सबसे पहले मनुष्य हैं! हमें इस तरह धर्म के नाम पर समाज को बाँटने की इजाज़त नहीं देनी चाहिए।

धर्म ने हमें दिया क्या है? हमें उससे क्या प्राप्त हुआ है? लोगों को अलग-अलग समूहों में बाँटने का ऐतिहासिक काम करने के बाद अब उसकी कोई प्रासंगिकता नहीं रह गई है। हर कोई अपने धर्म को सबसे बेहतर मानता है। सबका अपना अहं है, सबकी एक-दूसरे के साथ प्रतियोगिता है और वे सब दूसरे धर्म वालों से घृणा करते हैं। धर्म हमें बार-बार युद्ध की ओर ले जाते हैं।

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