अतीत में धर्म क्रूर थे और आज भी वैसे ही हैं – 9 अप्रैल 2013

धर्म

कल मैंने उन पुरातन धर्मों के बारे में लिखा था, जिनसे आजकल कुछ लोगों को बड़ा मोह हो गया है। यह अजीब बात है कि वे उनके क्रूर और भयावह पहलुओं को बड़ी आसानी से भूल जाते हैं या उन्हें अनदेखा करते हैं। जब वही आदिम क्रूरताएँ और सांस्कृतिक विश्वास उन्हें आज दिखाई देते हैं तब वे ऐसा नहीं करते!

उस आदिम धर्म या आदिम विश्वास को ढूंढने आपको अतीत में बहुत दूर नहीं जाना पड़ेगा। सिर्फ अफ्रीका के आदिवासियों के बीच जाएँ, जहां आज भी लोग पत्थरों और पेड़-पौधों के प्रेतात्माओं में विश्वास रखते हैं, जहां आज भी छोटी-छोटी बच्चियाँ और युवा औरतें खतने की यातना सहन करने के लिए मजबूर की जाती हैं। ऐसा वे इसलिए करते हैं कि वैसा आदिकाल से किया जा रहा है। परंपरा से, संस्कृति के नाम पर और अंत में पुरातन काल से चले आ रहे विश्वासों के कारण। हो सकता है आप उन्हें उस अर्थ में धर्म न मानें क्योंकि उसके नियम लिखे हुए नहीं हैं, लेकिन वे मौखिक रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रसारित होते रहे हैं इसलिए दोनों में कोई अंतर नहीं हैं, वे भी धर्म ही हैं।

संभव है आप उसे सुदूर अतीत का होने के कारण कंधे उचकाते हुए कहें कि वे इतने पुरातन हैं जबकि यहीं, अफ्रीका में आज भी वैसी ही भयानक वारदातें हो ही रही हैं, बच्चे भूखे मर रहे हैं, युद्ध में रोज़ हजारों की संख्या में लोग मारे जा रहे हैं। आप सोच सकते हैं कि वे अफ्रीकी आदिवासी मानो उसी आदिम अतीत के अवशेष हैं। लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि ऐसी क्रूरता, परंपरा और विश्वासों की वही भयावह क्रूरता आगे फैलती हुई आज के, आधुनिक और विश्व के सबसे बड़े धर्मों का भी अभिन्न हिस्सा बन गई है!

ज़रा सऊदी अरब जैसे देशों पर गौर करें! हाल ही में एक बदमाश ने एक व्यक्ति को चाकू मार दिया जिसकी चोट से वह व्यक्ति लकवाग्रस्त हो गया। वहाँ इस्लामिक शरिया कानून लागू हैं जिनके अनुसार वहाँ के न्यायाधीशों ने उस अपराधी के लिए ऐसी भयानक सज़ाओं का प्रावधान किया जिसमें उसके मेरुदंड को चोट पहुंचाना शामिल था ताकि अपराधी भी किसी तरह लकवाग्रस्त हो जाए। आँख का बदला आँख, और खून का बदला खून!

इस दुनिया में ऐसी भी जगहें हैं जहां औरतें खरीदी बेची जाती हैं क्योंकि धर्म कहता है कि मर्दों के लिए औरतें किसी जिंस की तरह एक संपत्ति ही हैं। इसी दुनिया में ऐसी जगहें हैं जहां औरतों को मारा पीटा जाता है क्योंकि धर्म उनके माता-पिता और पतियों को आदेश देता है कि अगर औरतें आज्ञाकारी नहीं हैं तो उन्हें अनुशासन में रखना उनका कर्तव्य है। मैं कह रहा हूँ 'इस दुनिया में कुछ जगहें', और इससे ऐसा लगता है जैसे ऐसी जगहें कहीं सुदूर इलाकों में हैं। अगर मैं कहूँ कि ऐसा यहीं, आपके आसपास, चारों तरफ हो रहा है तो आप अनुभव करेंगे कि वाकई दुनिया के बहुत से लोगों के लिए यह एक दर्दनाक यथार्थ है! आप इन्हें देखकर अपनी आँखें बंद नहीं कर सकते!

क्रूरता, रक्तपात और युद्ध सभी धर्मों के अभिन्न हिस्से हैं। ईसाइयों की बाइबल में भी बहुत से क्रूर वाक्य हैं और हिंदुओं के विभिन्न धर्मग्रंथों में भी। आप उन धर्मग्रंथों की अच्छी बातों का हवाला देकर यह नहीं कह सकते कि आप सिर्फ उन अच्छी बातों का ही अनुकरण करते हैं। अगर आप किसी धर्म को मानते हैं तो फिर क्रूरता भी उस धर्म का हिस्सा है जिसका आप अनुकरण करते हैं क्योंकि आपका धर्म उन्हीं धर्मग्रंथों पर आधारित है।

अपने आपको धर्म की उस क्रूरता से अलग करने का सिर्फ और सिर्फ एक उपाय है और वह यह कि आप अपने आपको उस धर्म से ही अलग कर लें।

मेरा यह अटूट विश्वास है कि अधिकांश लोग किसी न किसी दिन यह अवश्य करेंगे और यह भी कि आज जिस रूप में हम धर्म को जानते हैं, वह अपना महत्व खो देंगे और अंततः समाप्त होकर इतिहास के गर्त में समा जाएंगे, जैसा कि उनके पहले के धर्मों के साथ भी हुआ है।

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