कल के जन्मदिन के बाद, मैं वापस उसी मुद्दे की ओर लौटना चाहूंगा जिस पर मैंने इस हफ़्ते बातचीत शुरू की है – भारत में बलात्कार और यौन-उत्पीड़न के दुखद लेकिन महत्वपूर्ण मुद्दे पर। दिल्ली में हुई बर्बर सामूहिक-बलात्कार की घटना के बाद विरोध-प्रदर्शनों और जनसामान्य के बीच बहसों की वजह से इस विषय को लेकर एक सामान्य जागरुकता फैलती दिख रही है जिसके बाद आवश्यक बदलाव की उम्मीद-सी दिख रही है। कई लोगों ने कारणों-निवारणों पर अपने सुझाव दिए हैं और कई लोगों ने बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड की मांग भी की है। लेकिन क्या आपको वास्तव में यह लगता है कि बलात्कार क़ानून-व्यवस्था की समस्या है? या क्या आपको लगता है कि कड़ी सज़ा के प्रावधान से, मृत्युदंड से, आप इस अपराध को रोक लेंगे? मुझे नहीं लगता कि मौत की सज़ा इसका इलाज है। आपको समस्या की जड़ में जाना होगा – और मेरे हिसाब से वो जड़ धर्म व संस्कृति है। आइए आज धर्म पर चर्चा करते हैं।
समस्या की जड़ धर्म द्वारा पुरुषों को स्त्रियों के बारे में मिलने वाली सीखें हैं। यह एक सत्य है कि धर्म स्त्रियों को अशुभ बताता है, उन्हें भोग की जाने वाले वस्तु, दोयम दर्जे के इंसान के रूप में वर्णित करता है जिस पर पुरुषों का स्वामित्व है और जिन्हें पुरुषों की आज्ञाकारिनी बनकर रहना चाहिए। यह सिर्फ़ हिन्दुत्व की समस्या नहीं है। यह धर्म की ही समस्या है। मैंने क़ुरान में कहीं पढ़ा था, "तुम्हारी औरतें तुम्हारी खेतियां हैं लिहाज़ा अपनी खेती में जब और जिस तरह चाहो जोत सकते हो।" अन्य धर्मों में भी ऐसे उदाहरणों की भरमार है, जो कहते हैं कि स्त्रियों को पीटा जा सकता है, उनका इस्तेमाल किया जा सकता है और यहां तक कि उन्हें दान स्वरूप किसी को दिया जा सकता है। भारत में धर्म और संस्कृति के ठेकेदारों को शर्म आनी चाहिए – आपके इन्हीं तथाकथित सिद्धांतों के कारण, हमारे देश की हालत इस हद तक गिरी हुई है। आप और आपका धर्म औरतों को इंसान की श्रेणी में रखता ही नहीं।
धर्म ने स्त्रियों के लिए एक अजीब किस्म के व्यवहार की परंपरा को जन्म दिया है और यही समस्या का असली जड़ है। पुराने रिपोर्टों के अनुसार, पिछले दस वर्षों में साठ लाख कन्या भ्रुण हत्याएं हुई हैं, कारण केवल उनका बेटी होना था। वैसे मां-बाप जो लिंग पता नहीं कर पाते थे, वे बेटी होने पर भारी मन से उसे स्वीकार करते थे। कई बार तो मैंने बहुत से परिवारों को तब तक बच्चा पैदा करते देखा है जब तक कि एक बेटा न हो जाए! क्यों? क्यूंकि आपका क्रिया-कर्म बेटे के हाथों ही होगा क्यूंकि वंश बढ़ाने का काम बेटा ही कर सकता है, क्यूंकि हिन्दू धर्म लोगों को कहता है कि आप स्वर्ग तभी जा सकते हैं जब आपके पास एक बेटा होगा। कितनी बार मैंने देखा है कि एक लड़की को जन्म देने वाली मां को इस बात के लिए ताने सुनने पड़ते हैं कि उसने बेटे को जन्म क्यूं नहीं दिया!
क्या आप इससे ज़्यादा ठोस उदाहरण चाहिए कि धर्म स्त्रियों को लेकर एक ग़लत रवैये को जन्म देता है? बलात्कार हिन्दु धर्म ग्रंथों के लिए कोई दुर्लभ घटना नहीं है लेकिन इसकी भर्त्सना होने की बजाय देवता ही ऐसा करते हुए दिखते हैं! हिन्दु धर्मग्रंथ आपको स्वर्ग के राजा इंद्र और विष्णु जैसे देवता की पूजा करने को कहता है, जिसने वृंदा को यौन संबंध बनाने के लिए झांसे में लिया था। तो एक बलात्कारी देवता की पूजा होनी चाहिए क्योंकि वह महान है, बड़ा और शक्तिशाली है! इंद्र जिस स्त्री अहिल्या का बलात्कार करता है, उसे उसका पति शाप देकर पत्थर में बदल देता है। इंद्र को खुद भी शाप मिलता है: उसके शरीर में एक हज़ार योनी होने का! शायद यह कहानी के लेखक की कुंठा होगी जो एक साथ हज़ार योनी देखना चाहता हो। लेकिन ग़ौर करने वाली बात ये है कि योनी का होना अपने-आप में एक अभिशाप है! धर्म यही सिखाता है!
धर्म कहता है "जहां नारी होती है, वहां देवता का वास होता है।" यही धर्म ये भी कहता है कि स्त्रियां नर्क का द्वार होती हैं। हिन्दुत्व का एक पंथ यह भी मानता है कि स्त्रियों का चेहरा देखना एक पाप है और अगर आप ऐसा करते हैं तो आपको पश्चाताप करना होगा। इसी पंथ के सदस्यों को हालांकि एक सेक्स स्कैंडल में भी पकड़ा जाता है। दोहरी मानसिकता अपने चरम पर है और स्त्रियों को लेकर एक ऐसा रवैया है जो संकीर्ण तो है ही साथ में अपराध को बढ़ावा देने वाला भी है।
एक समाज जिसमें धर्म मज़बूती से मौजूद हो वहां पुरुषों का राज करना और स्त्रियों का कमज़ोर होना लाज़िमी है। यह पितृ-सत्तात्मक होता है और इसमें स्त्रियों को कमज़ोर बनाया जाता है – ज़ाहिर है पुरुषों के लिए वे एक आसान शिकार बन जाती हैं। धर्म स्त्रियों को दोयम दर्जे का नागरिक बनाता है और इस बात की वकालत करके कि स्त्रियों को अपने पति, पिता, भाई या बेटे के नियंत्रण में रहना होगा, उन्हें कमज़ोर बनाता है। धर्म समानता लाना नहीं चाहता, धर्म नहीं चाहता कि स्त्री और मर्द, दलित और सवर्ण, ग़रीब और अमीर एक पायदान पर खड़ा हो सकें। धर्म ने स्त्रियों को देवी का दर्जा तो दिया है लेकिन पुरुष के बराबर अधिकार देकर इंसान बनाने से वंचित रखा है।
अगर आप बलात्कार रोकना चाहते हैं, तो आपको मानसिकता बदलनी होगी, स्त्रियों को लेकर स्थापित रवैयों का विरोध करना होगा। और उसके लिए लोगों को यह समझना होगा कि उन्हें संकीर्ण और आज के परिप्रेक्ष्य में रद्दी हो चुकी ख़तरनाक धार्मिक मान्यताओं को छोड़ना होगा। अगर आप अपनी बेटियों की परवरिश धर्म के अनुसार करते हैं तो आप उन्हें कमज़ोर बना रहे हैं!
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