धर्म कहता है: खुद को पीड़ा पहुंचाओ, भूखे रहो, अपने आपको मारो-पीटो, अपना खून बहाकर पापों का प्रायश्चित्त करो-31 मई 2012

धर्म

कल मैंने बताया था कि धर्म आपराधिक कृत्यों का समर्थन करता है। वह लोगों की अंतरात्मा का आह्वान करता है और उनके भीतर गुनहगार और पापी होने का अपराधबोध पैदा करके उन पर नियंत्रण प्राप्त करता है। वह कहता है कि आप पापी हैं और अगले ही पल उसका प्रायश्चित्त मुकर्रर कर देता है। लेकिन धर्म आप पर नियंत्रण कर सके, आपके साथ छल कर सके इसके लिए यह परम आवश्यक है कि आप न सिर्फ इस बात पर विश्वास करें कि आप पापी हैं बल्कि यह भी समझें कि पापकर्म आपका चारित्रिक गुण है। इसीलिए वह ऐसा भ्रम फैलाता है कि जीवन में आप 100% सुखी और संतुष्ट हो ही नहीं सकते।

मैंने ईसाइयत में ऐसा ही सुना है-खास तौर पर कैथोलिक ईसाइयों में, जिनमें मूलभूत पाप की अवधारणा प्रचलित है, जिसके अनुसार आप पाप के साथ ही जन्म लेते हैं। इस धारणा का संबंध आदम और हव्वा से है, जिन्हें उनके पापकर्म के चलते स्वर्ग से मृत्युलोक में फेंक दिया गया था। इसलिए माना जाता है कि विशेष रूप से औरतों का, और पुरुषों का भी, पाप से विरहित होना संभव ही नहीं है और उन्हें पैदाइशी पापी माना जाता है।

हिन्दू धर्म में भी मनुष्य के जन्म को पाप से जोड़ा जाता है। यह तथ्य कि आपका जन्म हुआ है सिद्ध करता है कि आपके कुछ कर्म बचे रह गए हैं, जिनसे आपको मुक्त होना है। अगर आप पाप-मुक्त होते, आपके किसी कर्म का प्रायश्चित्त बाकी न होता तो आपको धरती पर दोबारा जन्म लेने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती। आप हर तरह से मुक्त हो चुके होते, निर्वाण प्राप्त कर चुके होते।

तो इस तरह धर्म आपको उन बातों के लिए अपराधबोध से भर देता है, जिन्हें आपने किया ही नहीं है और जिस पर आपका किसी तरह का वश नहीं है। धर्म का अगला कदम होता है, उस पाप से आपकी मुक्ति का उपाय निर्धारित करना: आप अपने आपको कष्ट दीजिए, जिससे उन पापों से आप मुक्त हो सकें। आपको प्रायश्चित्त करना होगा। प्रायश्चित्त करने पर ही आपको सही अर्थों में धार्मिक माना जाएगा-अगर आप स्वयं को कष्ट देंगे, अपनी इंद्रियों की नैसर्गिक इच्छाओं का शमन करेंगे, अगर आप अपने आप से घृणा करेंगे।

अपने आपको कष्ट पहुँचाने के लिए और इस तरह अपने आपको धार्मिक सिद्ध करने के लिए आपको कई विकल्प दिए जाते हैं। और जितना ही आप यह सब करते हैं, जितना आप अपने आपको कष्ट देते हैं, उतना ही आप महान कहलाते हैं। और अपने आपको कष्ट देने की और अपने आपको ज़्यादा से ज़्यादा धार्मिक सिद्ध करने की कोई सीमा नहीं है।

शायद प्रायश्चित्त करने का सबसे लोकप्रिय तरीका उपवास है, और मुझे लगता है कि यह सभी धर्मों में प्रचलित है। आपको उपवास करना होगा, भूखा रहना होगा और आपको अपनी सबसे प्रिय वस्तु का परित्याग करना होगा क्योंकि आप प्रायश्चित्त कर रहे हैं। हिन्दू धर्म में महीने में दो उपवास के दिन नियत हैं, जिन्हें एकादशी कहा जाता है और जो हिन्दू पंचांग के मुताबिक पूर्णिमा और अमावस्या के ग्यारहवें दिन आते हैं। बहुत से उपवास के दिन और भी विशिष्ट होते हैं, जैसे निर्जला एकादशी! उस दिन धार्मिक विश्वासुओं से अपेक्षा की जाती है कि भूखे तो रहें ही, पानी भी न पिएँ। 24 घंटे बिना पानी के रहें, जब कि तापमान 50 डिग्री तक पहुँच रहा है। धर्म कहता है कि यह आपको पवित्र कर देगा, आप पाप-मुक्त हो जाएंगे। मैं कहता हूँ कि यह आपकी जान भी ले सकता है!

आत्म-दंड और अपराध-बोध व्यक्त करने के और भी तरीके हैं। आपने मंदिरों में देखा होगा कि कैसे भक्तजन भगवान की मूर्ति के आगे अपने कान पकड़ते हैं, जिसका अर्थ होता है कि वे मानते हैं कि वे दोषी हैं और माफी मांग रहे हैं। वे अपने गालों पर थप्पड़ मारते हैं-ज़्यादातर प्रतीक रूप में, ज़ोर से नहीं-मगर यह अवश्य दर्शाते हैं कि वे प्रायश्चित्त कर रहे हैं।

मैंने मुसलमानों को भी यही सब करते देखा है, मगर कुछ ज़्यादा कठोरता के साथ। वे ज़ोर-ज़ोर से अपनी छातियाँ पीटते हैं और मैंने सुना है कि वे चाकुओं से अपने आपको चोट पहुँचते हैं और अपने आपको लहूलुहान कर लेते हैं। पुराने जमाने में ईसाई भी यही किया करते थे। वे भी पीठ पर तीखे अस्त्रों वाले कोड़े मार-मारकर पीठ लहूलुहान कर लिया करते थे। मेरी नानी के गाँव में नवरात्रि के अवसर पर मैंने खुद अपनी आँखों से देखा है कि लोग अपने दोनों गाल छेद लेते हैं और उनके आर-पार लोहे की राड फंसा लेते हैं। ऊपर का चित्र 2010 में वृन्दावन में आयोजित कुम्भ मेले का है, जो हिंदुओं का सबसे बड़ा धार्मिक त्योहार माना जाता है। आप उसमें छोटे-छोटे बच्चों को अपने शरीर में कई जगहों पर काटकर उनमें चाकू-छुरियाँ फंसाकर, हाथ-पैरों में छुरियाँ, रॉडें फंसाकर बहते रक्त के साथ मज़े में जुलूस बनाकर घूमते देख सकते हैं। वे अपनी चोटें, रक्त और चाकुओं से कटे अपने हाथ, पैर और दूसरे अंगों का प्रदर्शन कर रहे होते हैं।

इन सारे कामों को बहुत भक्तिपूर्ण और ईश्वर के प्रति समर्पण के भाव से देखा जाता है और आप अगर पापों का प्रायश्चित्त करते हुए इतना दर्द और तकलीफ सहन कर सकते हैं तो आपके प्रायश्चित्त को स्वीकार करके आपको क्षमा कर दिया जाएगा। साधारण धार्मिक व्यक्ति ऐसे लोगों को, जो यह पीड़ा सहन कर पाते हैं, बड़ी श्रद्धा की नज़र से देखते हैं और उनकी भी पूजा शुरू कर दी जाती है। गर्मियों में वे आग जलाकर उसके चारों ओर बैठ जाते हैं और ठंड में अपने सारे कपड़े उतार लेते हैं। जितना ज़्यादा आप खुद को पीड़ा पहुंचाएंगे उतना ही ज़्यादा आपका लोग आदर करेंगे, आपके प्रति श्रद्धा से भर जाएंगे क्योंकि वे समझते हैं आप ईश्वर के नजदीक पहुँच चुके हैं! और आप पहुंचे हुए संत बन चुके हैं!

कुछ लोग समझते थे कि मैंने भी प्रायश्चित्त करने के उद्देश्य से ही गुफा में प्रवेश किया था। यहाँ यह प्रथा है कि धार्मिक लोग-जैसा कि मैं उस वक़्त था-अपने आपको प्रताड़ित करने के लिए ऐसे अतिवादी कदम उठाते हैं और मैंने कई बार यह बताया भी कि गुफा में प्रवेश का मेरा उद्देश्य वह नहीं है, जैसा कि वे लोग समझ रहे हैं। फिर भी, जिन्होंने भी मेरे गुफा प्रवेश के बारे में सुना, यही मानते रहे।

तो आपने देखा कि अपने अनुयायियों से ऐसे त्याग की अपेक्षा करना धर्म के लिए बहुत मामूली बात है। क्यों? क्योंकि धर्म चाहता है कि आप उसके बलि के बकरे बनें और हमेशा हमेशा के लिए बने रहें। जब लोगों में डर बैठ जाता है तब उनका हर तरह का शोषण और दमन आसान हो जाता है। धर्म का मूलाधार डर है और वह आपको हमेशा भयभीत रखना चाहता है। नर्क, परगेटरी, कभी न खत्म होने वाले पुनर्जन्म, निचली योनि में जन्म, कभी स्वर्ग न मिलने का डर, हमेशा हमेशा के लिए आग में जलते रहने का डर! धमकियाँ, जो डर पैदा करती हैं। और ये सभी धमकियाँ महज भ्रम होती हैं। इनमें से कोई भी चीज़ यथार्थ नहीं है-लेकिन वे डर पैदा करती हैं।

धर्म सिखाता है कि आपको पूर्ण सुखी नहीं होना चाहिए। आपका पूर्ण सुख पर अधिकार ही नहीं है। अगर आप बहुत खुश हैं और जीवन का भरपूर मज़ा ले रहे हैं तो एक दिन आपको रोना पड़ेगा। सुख की अधिकता एक दिन आपके लिए दर्दनाक साबित होगी। मुझे लगता है कि जब लोग प्रसन्न होते हैं और जब वे निडर होते हैं तब उन पर नियंत्रण करना मुश्किल हो जाता है। यह एक और कारण है कि धर्म का अनुयायी होना व्यर्थ है-क्योंकि आप खुश रहना चाहते हैं, भयभीत नहीं!

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