धर्म का प्रारम्भ-बिन्दु: डर! वर्तमान में धर्म की आय का स्रोत: डर!- 28 मई 2012

धर्म कई शताब्दियों से बल्कि सहस्राब्दियों से अस्तित्व में है। आज जैसा धर्म हम देख रहे हैं, शताब्दियों पहले उसका स्वरूप उससे काफी अलग था। ग्रीक और रोमन सभ्यताओं के रहस्यमय देवताओं, अमरीकी मूल निवासियों के प्रेत-देवताओं या विभिन्न इलाकों में पाए जाने वाले प्राचीन आदिवासियों के प्राकृतिक देवताओं को याद कीजिए। ये सभी लोग, चाहे वे कबीलों में रहने वाले हों चाहे वे ‘सभ्यता की शुरुआत’ के समय के लोग हों, किसी न किसी देवता, राक्षस, जीव या आत्मा आदि की बात करते हैं। आज हम उनकी इन कल्पनाओं को ही उनका धर्म कहते हैं। एक जैसा यह विचार सारी धरती पर एक साथ क्यों विकसित हो रहा था? डर के कारण।

जी हाँ, यह डर ही था, जिसने उन्हें हर नैसर्गिक चमत्कार के लिए किसी अलौकिक शक्ति का निर्माण (आविष्कार) करने पर मजबूर किया। उनके पास कोई स्पष्टीकरण नहीं था, जिसकी सहायता से वे बहुत सी प्राकृतिक घटनाओं को समझ सकते। तूफान, बाढ़, भूकंप या चेचक जैसी छूत की बीमारियाँ आदि बहुत सी नैसर्गिक घटनाएँ उनके मन में भय पैदा करती थीं क्योंकि उनसे बहुत से लोगों की मौत हो जाती थी या उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचता था। ऐसी घटनाएँ उन्हें बहुत परेशान करती थीं, पीड़ा पहुँचाती थीं इसलिए लोग डरे हुए थे। इसके विपरीत सूर्य और चंद्र का उदित होना और अस्त होना, सूर्य और चंद्र ग्रहण आदि घटनाएँ भी थीं, जिनसे उन्हें कोई नुकसान नहीं होता था बल्कि वह उन्हें चमत्कृत कर देती थीं। लेकिन फिर भी हर वक़्त एक तरह का अंदेशा रहा रहता था क्योंकि उन्हें उसके कारणों का पता नहीं था। कल को अगर सूर्योदय न हो तो? या फिर अचानक दिन में इतना अंधेरा क्यों हो रहा है?

एक अनजानी शक्ति की कल्पना की शुरुआत यहाँ से शुरू हुई। कोई न कोई शक्ति होनी ही चाहिए, जो इन सारी बातों पर नियंत्रण कर रही है और जिसे हम जानने में असमर्थ हैं। कुछ लोगों के लिए वह एक ईश्वर था, जो संसार में होने वाली सारी घटनाओं को निर्देशित कर रहा था। दूसरे कुछ लोगों के लिए कई देवता थे, जैसे सूर्य या चाँद आदि आदि, जो अलग-अलग घटनाओं के लिए जिम्मेदार थे। कुछ भी हो, था वह बहुत शक्तिशाली और मायावी, जिसे आप देख नहीं सकते थे, छू नहीं सकते थे और न ही उससे बात कर सकते थे। तो इस तरह उन्हें वही स्पष्टीकरण स्वीकारना पड़ा, जिसे वे सहजतापूर्वक समझ सकते थे।

फिर जब एक बार यह विचार स्थापित हो गया कि कोई न कोई अलौकिक, जादुई शक्ति है, जो सारे विनाश को, बल्कि सारी प्रकृति को नियंत्रित कर रही है तो लोगों ने सोचा कि उन शक्तियों के साथ संपर्क का कोई न कोई तरीका अवश्य होना चाहिए, कम से कम उससे संपर्क की कोशिश की जा सकती है। और इस तरह उन देवताओं की पूजा-अर्चना शुरू हो गई, कर्मकांड शुरू हो गए और उन्हें भेंट चढ़ाने की (अपनी प्रिय वस्तु न्योछावर करने की) प्रथा शुरू हुई। इससे कभी-कभी नैसर्गिक रूप से ही उनका इच्छित काम हो जाता था या कभी-कभी उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति काम कर जाती थी। मगर वे इन बातों को जानते नहीं थे और सोचते थे कि उनकी पूजा-अर्चना का या उनकी भेंट का ही यह असर हुआ है। इस तरह कर्मकांड धीरे-धीरे दृढ़तापूर्वक स्थापित होते चले गए।

लेकिन कभी-कभी उनकी प्रार्थनाओं आदि का कोई असर नहीं होता था। इसके अलावा, कुछ लोगों की प्रार्थनाओं का असर अक्सर देखने में आता था और दूसरे अक्सर असफल रहते थे। इस तरह उन लोगों ने अपने में से ही कुछ लोगों को, जिनकी प्रार्थनाएँ उनके देवता अक्सर सुन लेते थे, पुजारी या पुरोहित या वैद्य बना दिया। उन लोगों को विशिष्ट समझा जाने लगा और दूसरे सभी उनका विशेष सम्मान करने लगे। उनके आसपास के दूसरे लोग समझने लगे कि ये पुजारी या वैद्य उन्हें खतरों से बचाएंगे।

तो आप देख सकते हैं कि यह सब बहुत पुरातन समय में हुआ था, जब लोग बहुत सी वे बातें नहीं जानते थे, जिन्हें अब हम जान गए हैं। धर्म ऐसी बातों के स्पष्टीकरण का माध्यम था, जिन्हें समझा नहीं जा सकता था। आज हम जानते हैं कि तूफान से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है और यह भी कि बीमारियाँ कैसे फैलती हैं और उनसे कैसे बचा जा सकता है। हम जानते हैं कि कल भी सूर्य उदित होगा क्योंकि गृह-नक्षत्र घूमते रहते है, जैसे कि वे हमेशा से घूमते रहे हैं। हम जानते हैं कि नैसर्गिक रूप से जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चंद्रमा आता है तो सूर्यग्रहण होता है। हम दृढ़ इच्छाशक्ति की शक्ति से वाकिफ हैं और यह भी कि विपरीत परिस्थितियों में मानव शरीर कैसे-कैसे काम अंजाम दे सकता है। हम अपने शरीर और मस्तिष्क की सीमाएं भी जानते हैं।

जब हम ये सब बातें जान गए हैं तो धर्म की आवश्यकता ही क्या है? क्यों हम ऐसे पंडे-पुजारियों या गुरुओं के चक्कर में पड़ते हैं, जो खुद को प्रबुद्ध बताते हैं? क्यों हम अपढ़ और विज्ञान, भौतिकी और जीवविज्ञान से अनभिज्ञ लोगों को कुछ लोगों के शोषण का शिकार होने देते हैं? सब कुछ जानने के बावजूद क्यों बहुत से लोग इन बेईमान, जादूगर और धोखेबाज़ लोगों के चंगुल में फंस जाते हैं? और क्यों धर्म आज भी झूठे विश्वासों का लाभ उठाता है, और भी नए-नए अंधविश्वास पैदा करता है और चाहता है कि लोग सदा-सदा के लिए डर की छाया में जीते रहें, जब कि अब हम इन रहस्यों को समझ गए हैं?

आप आधुनिक समय में रह रहे हैं, आप अपने पूर्वजों के ज्ञान का, उनकी खोजों का लाभ उठा सकते हैं। उनके प्रयासों का सम्मान करें, उनका महत्व पहचानें और अंधविश्वास और धर्म से किनारा करें। प्रकृति को उसकी संपूर्णता में स्वीकार करें और समझें कि आप अपने जीवन के उत्तरदायी हैं। अपने जीवन की ज़िम्मेदारी खुद उठाएँ और उसका पूरा मज़ा लें।

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