कभी-कभी मुझसे पूछा जाता है कि "आप हिन्दू धर्म के बारे में, विशेषकर उसकी बुराइयों, जैसे जाति प्रथा, के बारे में बहुत लिखते हैं। क्यों?" मैं उनसे कहता हूँ कि मैं इसी धर्म में पैदा हुआ, उसी के बीच पला-बढ़ा और बहुत समय तक वही मेरा रोजगार भी था। स्वाभाविक ही मैं इस धर्म के बारे में बहुत कुछ जानता हूँ। लेकिन मैं सिर्फ हिन्दू धर्म के ही विरुद्ध नहीं हूँ बल्कि सभी धर्मो के विरुद्ध हूँ, धर्म की अवधारणा के ही विरुद्ध हूँ। मैं समझता हूँ कि उन नकारात्मक बातों के अलावा, जो धर्म के कारण घटित हुईं, यह भी उसकी बहुत बड़ी बुराई है कि वह आपको अपना अंधभक्त बनाना चाहता है और सभी को इस बात पर सहमत करना चाहता है कि वे भी ऐसे अंधभक्त अनुयायी बनें।
मैं मानता हूँ कि धर्म जिन धारणाओं पर आधारित है वे गलत हैं। धर्म परिवर्तन करके आपको कोई धर्म अपनाना है तो आपको सबसे पहले यह समझना चाहिए कि वह नया धर्म भी आपसे उस पर और उसके धर्मग्रंथों पर विश्वास करने की अपेक्षा करता है। इसमें भी प्रश्न करने की और संदेह रखने की कोई गुंजाइश नहीं। जो कुछ भी आपसे कहा जा रहा है वह सत्य है, भले ही वह आपको अजीबोगरीब और गलत लग रहा हो। अगर आप धार्मिक होना चाहते हैं तो पूछिए मत, संदेह मत कीजिए!
धर्म प्रश्न करने की और सोचने-समझने की आपकी शक्ति पर सीधे आक्रमण करता है, और आपकी तार्किकता को समाप्त कर देता है। आप सोच तो सकते हैं, मगर सिर्फ एक बंद दायरे में ही। आप उनके धर्मग्रथों के विषय में पूछ तो सकते हैं मगर सीधे धर्म पर कोई प्रतिप्रश्न नहीं कर सकते। आपके लिए एक सीमित दायरा बना दिया गया है, जिसके भीतर ही आप स्वतन्त्रता पूर्वक अपनी समझ का उपयोग कर सकते हैं। वह एक स्टेडियम की तरह है, जिसके चारों ओर आप दौड़-भाग कर सकते हैं। वहीं एक के बाद एक चक्कर लगाते रहें लेकिन एक कदम भी बाहर निकाल नहीं सकते और न ही कोई दरवाजा खोलने का प्रयास कर सकते हैं कि स्टेडियम के बाहर झाँककर भी देख सकें!
इस तरह धर्म लोगों की स्वतन्त्रता को सीमित करता है और उन पर नियंत्रण करने में सफल होता है। संप्रदाय यही काम और भी सख्ती के साथ अंजाम देते हैं। और सोचने-समझने की और अपनी स्वतंत्र राय रखने पर इन पाबंदियों की सहायता से वह अपने अनुयायियों को अपने कब्जे में रखते हैं, वे उन्हें उनके विश्वासों को बदलने से रोकते हैं।
इसके अलावा वे अपने धर्म-प्रचारक, पंडे-पुजारी और दूसरे लोगों को, जिन्हें विभिन्न धर्मों में भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा जाता है, अपने धर्म का प्रचार करने के लिए भेजते हैं। अनगिनत लोग ऐसे होते हैं, जिनका रोजगार ही यह होता है कि धर्म का प्रचार करें और ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को उस धर्म का अनुयायी बनाएँ।
यही वह बिन्दु है, जिसके बाद धर्म सिर्फ़ ‘जीवन-पद्धति’ या महज ‘दर्शन’ नहीं रह जाता। अब यह वह ‘धर्म’ भी नहीं रह जाता, जिसके विषय में मैंने कुछ समय पहले लिखा था।
मेरे धर्म के विषय में आप मुझे कैसे बता सकते हैं? कैसे आप मेरे जीवन जीने के तरीके के बारे में या मैं क्या स्वीकार करूँ या न करूँ, इस विषय में कुछ भी कह सकते हैं? या मैं आपके धर्म या आपके जीवन जीने के तरीके के बारे में क्या कह सकता हूँ? सबका अपना एक व्यक्तिगत धर्म होता है और ऐसा ही होना चाहिए। मैं आपका धर्म स्वीकार कर लूँ यह बात ही मेरे लिए अकल्पनीय है। मैं आपको इस पर कैसे सहमत करा सकता हूँ कि आप मेरा धर्म स्वीकार कर लें?
हमें सोचना होगा कि हम चाहते क्या हैं और अपने जीवन में हम क्या स्वीकार कर सकते हैं। आप कौन होते हैं मेरी ‘जीवन-पद्धति’ का निर्धारण करने वाले? सभी अपनी-अपनी जीवनशैली तय करते हैं और उन सिद्धांतों, विचारों और संकल्पों का निर्धारण और समय-समय पर अपनी समझ के अनुसार उनमें फेर-बदल भी करते हैं, जिन पर वे आगे चलना चाहते हैं। मैं अपनी अंतिम सांस तक एक सामान्य इंसान बना रहना चाहता हूँ और तब तक मानव-धर्म का पालन करना चाहता हूँ, जो प्रेम का दर्शन है न कि किसी धर्म द्वारा किया जाने वाला छल-कपट और न ही उसके द्वारा लादी गई पाबन्दियाँ। इस तरह मैं यह सोचने के लिए स्वतंत्र होऊंगा कि मैं क्या चाहता हूँ। मैं उन सभी बातों पर प्रश्न करने के लिए स्वतंत्र रहूँगा, जिन पर मुझे ज़रा सा भी शक है और स्वतंत्रता पूर्वक खुद अपने द्वारा निर्धारित विश्वासों के साथ जीवन-निर्वाह कर सकूँगा।
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