कुम्भ मेले में धर्म बच्चों की जि़न्दगी बर्बाद कर रहा है – 22 जनवरी 2013

धर्म

कल मैंने कुम्भ मेले की पृष्ठभूमि के बारे में बताया कि कैसे शास्त्रों की एक लघु कहानी पृथ्वी के इस त्यौहार की कथा कहती है। 14 जनवरी 2013 को इलाहाबाद में कुम्भ मेला प्रारम्भ हुआ और शुरू से ही मैने टेलीविज़न पर बहुत सी चीजे़ देखी, और मैने सोचा मैं जरूर इसके बारे में आपको लिखूंगा। एक बात जो इस मेले में मैने देखी वह मेरे दिल को छू गयी कि धर्म के नाम पर बच्चों के साथ खिलवाड़ हो रहा है।

कुम्भ मेले के पहले ही दिन सभी टी0वी0 चैनलों ने मेले के सभी दृश्य दिखाये थे कि वहां क्या चल रहा है। एक चीज़ जो मैने देखी उसके बारे में आपको बता रहा हूं। मैने देखा कि कुछ बच्चें जिनकी उम्र लगभग 4 से 7 साल के बीच की ही होगी, उन्होने देवताओं की पोशाक पहनी हुयी थी। एक लड़का भगवान शिव के वेश में था और एक लड़की मां लक्ष्मी के रूप में थी। उन बच्चों के सामने एक कपड़े का टुकड़ा और एक भिक्षापात्र रखा हुआ था और आपने भी देखा होगा कि आने-जाने वाले लोग उन्हें सिक्के देते जाते है। वे या तो खड़े होने या फिर बैठने की मुद्रा बनाये रहते हैं। उन्हें यह बताया गया है कि वे हाथ की मुद्रा ऐसी बनाये,जैसे वह लोगों को आर्शीवाद दे रहें हों।

जो लोग उधर से गुजरते हैं उन्हें बड़े प्यार से देखकर खुश होते हैं। वे लोग उन बच्चों को सिर्फ धन ही नही देते, बल्कि उनके पैर छूकर उनसे आर्शीवाद भी लेते हैं मानो सच में वे भगवान हों। वे उन बच्चों की पूजा करते हैं और साथ ही साथ उन्हें बढ़ावा भी देते हैं कि वे इस रास्ते पर चलते रहे। लोग समझते है यह धार्मिक कार्य है और बहुत अच्छा है। मुझे तो यह बिल्कुल ही नही समझ में आता है।

पहली बात तो मुझे उनके मां-बाप पर हैरानी होती है। क्या आपको यह लगता है कि क्या वास्तव में आप अपने बच्चो का भला कर रहे हैं? सच यही है कि आप अपने छोटे बच्चों से भीख मंगवा रहे हैं, तो क्या हुआ अगर उन्होंने धार्मिक पोशाक पहनी हुयी है काम तो वे भीख मांगने का ही कर रहे है जैसे महानगरों में बच्चें अपने चेहरे पर मूंछें बना लेते है और फिर पैसे मांगने की चालें चलते हैं। आप उस धन का क्या करते है? उनकी शिक्षा पर खर्च करते है, मुझे इस बात पर संदेह है।

आप बच्चों से उनका बचपना छीन लेते हैं। मैंने ऐसे भी बच्चों के बारे में पढ़ा है ,जिन्हें कुम्भ मेले में 14 साल से भी छोटी उम्र में नागा साधू बना दिया गया। नागा साधू वो होते हैं जो कभी वस्त्र नही पहनते। ये बच्चे कभी स्कूल भी नही जाते और उनकी सारी जि़न्दगी नागा साधुओं की भांति ही भिक्षा मांगने में बीतती है।

अगर आप इस महापर्व में शामिल होने जा रहे और इन बच्चों के पास से गुजरते है तो आपका यह उत्तरदायित्व है, जी हां आप ऐसा कर सकते हैं। अगर आप उन बच्चों को एक रूपया भी देते हैं इसका मतलब आप बालशोषण को बढ़ावा दे रहे हैं। आप उन बच्चों के माता-पिता से यह बता सकते है कि सही क्या है भीख मंगवाना या स्कूल भेजना। अब आप इस बात का तर्क देंगे कि वो लोग गरीब है और यह सब वह पेट पालने के लिये करते हैं तो मैं कहूंगा कि अगर धन देना ही है तो उनके भोजन के लिये दें जबकि बच्चे स्कूल जा रहे हों, और मैं इस बात को शत-प्रतिशत मानता हूं आपलोगों में से कोई भी यह नही चाहता होगा कि आपका बच्चा उनकी जगह पर हो, वैसी ही पोशाक पहने हुए और भीख मांगते हुए।

धर्म इन बच्चों की मदद नही करता बल्कि उनका बचपन बर्बाद करता है। वे भीख मांगते है और मांग रहे है। भीख मांगने का यह तरीका धार्मिक और आध्यात्मिक है जिसमें बच्चों का शोषण हो रहा है और यह बहुत ही गलत बात है।

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