मैं पिछले दिनों बच्चों और किशोरों के बारे में और उनके लालन-पालन में अभिभावकों की ज़िम्मेदारियों के बारे में लिखता रहा हूँ। स्वाभाविक ही सभी माता-पिता चाहते हैं कि बच्चों के लिए अच्छा से अच्छा करें। प्रश्न यह है कि आखिर यह अच्छा तरीका क्या है? सभी अभिभावक अपने बच्चों को वही जीवन-मूल्य और आस्थाएँ थमा देते हैं, जिन्हें वे खुद मानते हैं। धर्म इन जीवन-मूल्यों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है, एक चश्मा, जिससे वे जीवन को देखते हैं। इस तरह क्या हम अपने बच्चों पर एक विशिष्ट धर्म नहीं थोप रहे हैं?
क्योंकि मैं किसी भी धर्म के पक्ष में नहीं हूँ, मैं कहना चाहता हूँ कि एक बच्चे की परवरिश का सबसे आदर्श तरीका यह हो सकता है: अपने माता-पिता की स्नेहासिक्त देखरेख में बच्चा बड़ा हो रहा है और उसे किसी खास धर्म की शिक्षा नहीं दी जा रही है बल्कि उसके सामने विभिन्न संभावनाओं के द्वार खोलकर रखे जा रहे हैं, जिनमें से वह अपनी मर्ज़ी से कोई भी आस्था चुन सकता है। जब बच्चा वयस्क और परिपक्व हो जाएगा, वह खुद देख लेगा कि उसे कौन सा धर्म सबसे अधिक आकर्षित कर रहा है। इस तरह बच्चे के पास स्वतंत्र निर्णय का अधिकार होगा कि वह हिन्दू, ईसाई, मुस्लिम, यहूदी, बौद्ध या कोई और धर्म अपनाना चाहता है। इस तरह उसके सामने अपना धर्म-परिवर्तन करने या न करने जैसा कोई प्रश्न उपस्थित ही नहीं होगा क्योंकि बच्चे को पहले ही इस विषय में सब कुछ बता दिया गया है और इस संबंध में वह खुद अपना स्वतंत्र निर्णय ले रहा है। अगर कोई युवक या युवती कोई भी धर्म नहीं अपनाना चाहते तो उन्हें किसी धर्म को छोड़ने की औपचारिकता निभाने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
लेकिन हम सब जानते हैं कि यह वास्तविक तसवीर नहीं है और धर्म के मामले में ऐसा नहीं होता। हर बच्चा बिना धर्म के पैदा होता है और अभिभावक बचपन में ही अपना धर्म उस पर लाद देते हैं। आप उसे अलग नहीं कर सकते और जिस धर्म पर आपकी आस्था है और जिसे आपने अपने लिए अच्छा और उपयुक्त पाया, उसे ही आपने अपने बच्चे के लिए भी उपयुक्त समझा।
यहाँ तक कि नास्तिक अभिभावक भी अपने बच्चों को यही सिखाते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है, कि उसे धर्म की कोई आवश्यकता नहीं है और यह भी कि समाज, नियम-क़ानूनों और धर्म की सहायता पर निर्भर रहने की उसे कोई ज़रूरत नहीं है। जो इन शिक्षाओं के साथ बड़ा हो रहा होगा वह बड़ा होने पर अपने लिए शायद ही किसी धर्म को अपनाएगा। क्यों? उसके माता-पिता ने उसे जीवन को देखने का एक अलग नज़रिया दिया हालांकि वे खुद धार्मिक समूहों के प्रति उदारवादी रुख अख़्तियार किए हुए थे।
अगर कोई बच्चा धार्मिक माता-पिता के साथ रहते हुए बड़ा होता है तो उस पर उस धर्म का प्रभाव पड़ता है। वे बच्चों को लेकर मन्दिर, गिरजाघर, मस्ज़िद या सायनागोग जाते हैं। वे अपने धर्मग्रंथ पढ़ते हैं और उनका अर्थ अपने बच्चों को समझाते हैं। इसके अलावा, बहुत से धार्मिक संगठन बच्चों को धर्म की शिक्षा देने के लिए विशेष कक्षाएं चलाते हैं। यह स्वाभाविक है कि वे आस्था के प्रश्नों पर प्रभावित होते हैं। आपके माता-पिता बहुत धार्मिक न भी हों, धार्मिक समाज में वे अधिक सक्रिय भी न हों तो भी अगर आप उस इलाके में रहते हैं, जहाँ आपके माता-पिता का धर्म बहुमत का धर्म भी है तो आप उस धर्म से प्रभावित होते हैं। आपकी मानसिकता ही उसी तरह विकसित हो जाती है और धर्म उसी समय अपना बीज बो देते हैं।
कुछ लोग अपने धर्म के बारे में ज़्यादा सोच-विचार नहीं करते और वह जैसा भी है उसे स्वीकार कर लेते हैं। उनमें धार्मिक कट्टरता नहीं होती मगर वे कुछ आवश्यक मूलभूत धार्मिक संस्कार (कर्मकांड) कर लेते हैं। वे अपना जीवन उन्हीं विश्वासों पर गुज़ार देते हैं और वह उनके लिए विशेष महत्व नहीं रखता। कुछ दूसरे लोग धर्म में कुछ अधिक रुचि लेते हैं और उसके साथ अधिक सक्रियता के साथ जुड़ते हैं। कुछ और ऐसे भी होते हैं जो अपने धर्म में पर्याप्त रुचि लेते हैं और इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि वे उसकी मान्यताओं से सहमत नहीं हैं और वे धर्मपरिवर्तन करके दूसरा धर्म अपना लेते हैं या धर्म का पूरी तरह परित्याग कर देते हैं।
दरअसल, हिन्दू धर्म तो कहता ही है कि अगर आप किसी हिन्दू के घर पैदा नहीं हुए हैं यानी अगर आप जन्मजात हिन्दू नहीं हैं तो आप हिन्दू हो ही नहीं सकते। धर्मपरिवर्तन करके हिन्दू धर्म में आने की कोई सम्भावना ही नहीं है और न ही, कम से कम सैद्धांतिक रूप से, आप उसे छोड़ सकते हैं। मैं इस विचार को बिल्कुल पसंद नहीं करता क्योंकि इसमें आपके पास अपनी मर्ज़ी का कोई विकल्प नहीं है। लेकिन मुस्लिम और ईसाई अधिक से अधिक लोगों का धर्मपरिवर्तन करके अपने धर्म में लाने की कोशिश करते हैं। धर्मप्रचारकों का काम यही है: ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को कायल करके अपने धर्म में दीक्षित करना। और एक बार उस धर्म में आने के बाद उनके बच्चे भी अपने आप ही उसी धर्म में शामिल माने जाते हैं। यह मुझे कुछ-कुछ जाति-व्यवस्था की याद दिलाता है, जो विभिन्न समूहों में लोगों का विभाजन है। आप एक धर्म में जन्म लेते हैं, जैसे एक जाति में लेते हैं और अगर आपके अभिभावक आपको चुनाव की आज़ादी नहीं देते तो आप उसी धर्म में बने रहने के लिए मजबूर होते हैं। तो सभी, एक तरफ जाति प्रथा को लोगों में विभाजन पैदा करने वाली अमानवीय व्यवस्था मानते हैं तो दूसरी तरफ धर्म द्वारा पैदा किए जा रहे विभाजन को सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।
मेरे विचार में आपकी आस्था कुछ भी हो आप अपने बच्चों को हर संभव आज़ादी दें, जिससे वे अपना निर्णय स्वयं ले सकें। अगर आप किसी धर्म को मानते हैं तो ठीक है मगर जब आपके बच्चे वयस्क हो जाएँ तब उन्हें तटस्थता पूर्वक अपनी मर्ज़ी से यह निर्णय करने दें कि वे उस धर्म का हिस्सा बनना चाहते हैं या नहीं। अगर आप अपने बच्चों पर अपना धर्म थोपते हैं तो आप दिमाग से सोचने की उनकी स्वतन्त्रता छीन रहे है और उनके स्वतंत्रतापूर्वक विकास करने के रास्ते में रुकावट पैदा कर रहे हैं।
निश्चय ही, धर्म कुछ मूल्यों की स्थापना करता है और एक समूह तैयार करता है जहां वे मूल्य लागू होते हैं। सच्चाई यह है कि अगर आपको एक सुचारू रूप से काम करने वाला परिवार या मित्रों का समूह या आपस में प्रेम करने वाले लोगों का समूह उपलब्ध है तो फिर आपके पास उन इच्छित मूल्यों के अनुरूप बच्चों का लालन-पालन करने के लिए वह अवलंब भी मौजूद होता है। उसके लिए आपको किसी धर्म की ज़रूरत नहीं होती। अपने बच्चों को अपना निर्णय लेने की स्वतन्त्रता दीजिए।
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