जब मैं और रमोना धर्मों के अनुयायियों को लेकर चर्चा कर रहे थे तो एक और सवाल उठा। यह हमारे सामने स्पष्ट था कि जब आप कहते हैं कि आप धार्मिक हैं यानी किसी धर्म के अनुयायी हैं तो आप उस पर वास्तव में विश्वास करते हैं, उसके पूरे पैकेज के साथ उसे स्वीकार करते हैं। मेरी नज़र में इसका मतलब यह होता है कि आप उस धर्म को आँख मूँदकर स्वीकार कर रहे हैं क्योंकि अगर आपने अपनी आँखें खुली रखी होतीं तो आपको धर्म विषयक तमाम विवादास्पद बातें और उसके द्वारा लोगों को धोखा दिए जाने और उन्हें मूर्ख बनाए जाने की घटनाएँ भी दिखाई देतीं। लेकिन क्या आप निश्चित रूप से कह सकते हैं कि या तो आप पूरी तरह धार्मिक हैं या नहीं हैं?
पश्चिमी दुनिया में मैं कई ऐसे लोगों से मिल चुका हूँ जिन्हें वास्तव में धर्म से कोई मतलब नहीं होता लेकिन जब वे कोई फॉर्म भरते हैं जहां एक खाना ‘धर्म’ का होता है, तो बिना कुछ सोचे-समझे लिख देते हैं ‘क्रिश्चियन’, और यह भी जोड़ते हैं कि वे कैथोलिक हैं या प्रोटेस्टंट। वैसे, अपने रोज़मर्रा के जीवन में वे किसी धर्म का पालन नहीं करते। दरअसल वे ‘दस आदेशों’ (टेन कमांडमेंट्स) का पालन भी नहीं करते जिस पर पूरा ईसाई धर्म खड़ा है। यहाँ तक कि वे उन आदेशों के विपरीत आचरण करते हैं!
ईसाइयत में ही नहीं, हर धर्म में आपको इस तरह के विश्वासु मिल जाएंगे। ऐसे हिंदुओं को मैं स्वयं जानता हूँ और ऐसे मुसलमानों के बारे में भी सुना है। अगर आप उनसे पूछें कि क्या वे अपने आपको धार्मिक मानते हैं तो वे या तो साफ़ मना कर देते हैं या फिर जवाब देने में टाल-मटोल करेंगे। वे जानते हैं कि वास्तव में वे धार्मिक नहीं हैं, लेकिन धर्म के लेबल को छोडना भी नहीं चाहते।
दरअसल धर्म ऐसे धार्मिक लोगों को भी अपना लेता है बल्कि स्वागत करता है कि आधे-अधूरे ही सही मगर धर्म में बने रहिए। एक बार किसी ने मुझसे कहा, "मैं आधा मुसलमान हूँ" और मुझे उसकी बात सुनकर बहुत हँसी आई। लेकिन यह सच है कि धर्म आपको यह विकल्प तो देता ही है: जितना चाहो आप अपना लो, 20%, 40% या 60%। शायद ही कोई 100% धार्मिक होगा लेकिन धर्म को इससे कोई मतलब नहीं है; वह सिर्फ यह चाहता है कि किसी तरह आप उसके साथ रहें। वह शक्कर में लिपटा जहर है, एक नशा, जो आपसे बड़े-बड़े वादे करता है और आप बड़ी सावधानी के साथ थोड़ा सा चखते हैं और समझ नहीं पाते कि कैसे धीरे-धीरे उसका जहर आप पर चढ़ता जा रहा है, आप उसके जाल में फँसते जा रहे हैं।
कई धर्म आपसे अपेक्षा करते हैं कि आप अपनी आमदनी का 10% धार्मिक कामों पर खर्च करें। यह जानकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि जर्मनी में, और संभव है कि और भी कई देशों में भी, ‘चर्च टैक्स’ वसूल करने की इतनी तगड़ी व्यवस्था है कि दूसरे सामान्य टैक्सों की तरह उपयुक्त राशि आपके खाते से कटकर सीधे चर्च के खाते में जमा हो जाती है।
मैं नहीं जानता कि कितना प्रतिशत, लेकिन यह ठीक टैक्स की तरह कटकर चर्च के पास जाता है, सरकार के पास नहीं! आप यह पैसा एक ईसाई संस्था, चर्च को देते हैं, या फिर किसी हिन्दू मंदिर में- सब धर्म अपने-अपने तरीके से पैसा वसूल करते हैं लेकिन वे आपसे मांगते ज़रूर हैं। ‘पूरा दीजिये या कुछ भी मत दीजिए’ जैसी मानापमान वाली कोई बात भी इसमें नहीं होती! अगर आप 10% भी नहीं देना चाहते तो चलिए, 5% ही दे दीजिए या 2% भी चलेगा; नो प्रोब्लेम!
मेरी नज़र में आप कभी भी ‘थोड़े-बहुत धार्मिक’ नहीं हो सकते। या तो आप किसी धर्म में हैं या बिलकुल नहीं हैं। अगर आप यह समझते हैं कि आपने किसी धर्म में जन्म लिया है और उसी माहौल में पले-बढ़े हैं मगर अब उसके नियमों और सिद्धांतों को नहीं मानते तो फिर उस धर्म को छोडने के विषय में सोचिए। क्योंकि जब आप उस धर्म में विश्वास नहीं करते, उसके नियमों, सिद्धांतों और आदेशों को नहीं मानते तो फिर उसे अपनी गिनती में आप को शामिल करने की इजाज़त क्यों देते हैं?
मैं आपको सलाह देना चाहता हूँ कि ‘आधे धार्मिक’ बने रहने की सुविधापूर्ण स्थिति से अपने आपको मुक्त करें और हिम्मत बांधकर और सोच-समझकर धर्म के बारे में एक बार निर्णय कर लें: आप उसके पक्ष में हैं या उसके विरुद्ध। मेरी तो सलाह यही होगी कि आप उसके विरुद्ध हों लेकिन मैं आपको अपनी बात का कायल करने की कोशिश नहीं करूंगा क्योंकि मैं किसी धर्म जैसा नहीं हूँ। आपको अपना निर्णय स्वयं लेना होगा!
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