धर्म-सुधारक और मनुष्य के लिए समाज की आवश्यकता- 1 जून 2012

धर्म

पिछले कुछ दिनों से मैं धर्म के विकास और पुरातन काल और आधुनिक काल में उसके नकारात्मक प्रभावों के बारे में लिखता रहा हूँ। कई ऐसे लोग हुए हैं, जो मानते थे कि धर्म नियंत्रण और छल-कपट का औज़ार बन चुका है और वे धर्म के इन नकारात्मक प्रभावों को दूर करना चाहते थे। विभिन्न धर्मों में ऐसे लोग पैदा हुए और उन्हें धर्म-सुधारक कहा गया मगर अक्सर धर्म के ठेकेदारों (धर्म के शक्तिशाली लोगों) द्वारा उन्हें प्रताड़ित ही किया जाता रहा। तथ्य यह है कि इनमें से कोई भी धर्म का या कम से कम उसके नकारात्मक प्रभावों का खात्मा नहीं कर पाया।

जब धर्मग्रंथ लिखे गए तब जो शक्तिशाली थे और जो धर्मग्रंथ लिख सकते थे, उन्होंने अपने (हित में) नियम बना लिए। हिन्दू धर्म में जाति-प्रथा अस्तित्व में आई और स्वाभाविक ही जिनके पास ताकत थी, अपने आपको ऊंची जाति का घोषित कर दिया और उन्होंने दूसरे लोगों को इस तरह वर्गीकृत किया जिससे धन कमा सकें और उनके लिए लड़ सकें। लोगों ने उनका अनुगमन किया-मनुष्य हमेशा ऐसी बातों पर विश्वास करता आया है, जो उनके लिए सुविधाजनक और आसान होती है। कठिन विषयों का सामना करने की तुलना में विश्वास करना ज़्यादा आसान था। और कठिन विषय बहुत से थे-जाति-प्रथा अकेला ऐसा विषय नहीं था! लेकिन लोगों ने धर्मग्रंथों का बिना दाएँ-बाएँ देखे, बल्कि आँख मूँदकर अनुपालन करने को प्राथमिकता दी।

सिद्धार्थ गौतम बुद्ध आए और उन्होंने देखा कि धर्म में बहुत सी गड़बड़ियाँ हैं। धर्म पर अंधे विश्वास का उन्होंने विरोध किया-विशेषकर जाति-प्रथा का। उन्होंने कहा कि हम सब एक जैसे ही हैं, एक समान हैं और इस तरह मौजूद धर्मग्रंथों का विरोध किया। तो आप देखेंगे कि समाज में बहुत से अच्छे और सकारात्मक परिवर्तन हुए। लेकिन वे भी पूरी तरह दोषरहित नहीं थे। उदाहरण के लिए महिलाएं पूरी तरह बराबरी प्राप्त नहीं कर पाईं, उन पर कई पाबन्दियाँ जारी रहीं। उनमें कई कमियाँ थीं मगर वे लोकप्रिय हो गए क्योंकि उन्होंने धर्म की कई नकारात्मक बातों पर खुलकर आक्रमण किया था।

उन्होंने नए धर्म की स्थापना के बारे में सोचा तक नहीं होगा या यह भी नहीं सोचा होगा कि वे कोई धर्म-सुधार कर रहे हैं, लेकिन हुआ ठीक यही! बुद्धिज़्म एक धर्म के रूप में स्थापित हो गया और बहुत से लोगों ने, खासकर वे, जिन्हें पुराने हिन्दू धर्म ने निचली जाति का घोषित कर रखा था, हिन्दू धर्म छोडकर बौद्ध धर्म अपना लिया।

और भी कई सुधारक हुए-जैसे मार्टिन ल्यूथर, जिन्होंने प्रोटेस्टंट आंदोलन की शुरुआत की, जॉन कैल्विन, जिनके विचार भी मिलते-जुलते ही थे और दयानंद सरस्वती, जिन्होंने आर्य समाज की स्थापना की। इन सभी को अपने धर्मों को लेकर समस्याएँ थीं और वे उसमें परिवर्तन करना चाहते थे। लेकिन उन परिवर्तनों से धर्म समाप्त नहीं हुए बल्कि उनके कई दूसरे रूप अस्तित्व में आ गए।

यह मानव स्वभाव है कि वह समूह में रहना चाहता है। हम अपना एक समाज बनाना चाहते हैं, हम अपने जैसे लोगों से घिरे रहना चाहते हैं और एक जैसे विचारों और धारणाओं पर विश्वास करना चाहते हैं। यह बहुत स्वाभाविक था कि जो लोग हिन्दू धर्म की जाति-प्रथा को पसंद नहीं करते थे या उसकी कुछ दूसरी बातों से उनकी असहमति थी, उन्होंने सीधे मंदिर जाना बंद नहीं कर दिया या उस धर्म की सभी बातों पर से उनका विश्वास नहीं डिगा। वे अपने लिए एक समाज चाहते थे और भले ही धर्म की इन बातों पर उन्हें विश्वास नहीं था, जब उन्हें एक नया धर्म दिखाई दिया तो वे धर्म परिवर्तन करके नए धर्म में शामिल हो गए।

मेरी नज़र में, नास्तिक भी उससे कुछ अलग नहीं कर रहे हैं, जो किसी समय बुद्ध ने किया था-उन्होंने भी अपना एक अलग समूह बना लिया है, जिसमें कुछ दूसरी बातों पर विश्वास किया जाता है, जैसे इस बात पर कि ईश्वर नहीं है!

कोई नहीं जानता कि कल क्या होगा! हो सकता है कि जिन धर्मों को आज हम जानते हैं, समाप्त हो जाएँ या आगे और विकसित होते रहें या कुछ नए धर्मों की स्थापना भी हो। मैं धर्म के विषय में और भी लंबी चर्चा कर सकता हूँ लेकिन मैं नहीं समझता कि अपने नियमों और क़ानूनों वाले ये समूह या ये समाज वास्तविक रूप में कभी भी समाप्त होंगे। लोग एक लंगर (सहारा) चाहते हैं, जिसे वे थाम सकें। और वे उसी चीज़ का सहारा लेंगे जिसका सहारा दूसरे भी ले रहे हैं, सिर्फ इस डर से कि कहीं अकेले न पड़ जाएँ। वह सहारा ठीक हो या गलत, अधिकतर इस बात की तरफ से लापरवाह होंगे।

मैं धर्म-सुधारक नहीं हूँ। मैं किसी को अपनी बात पर सहमत नहीं करना चाहता। मैं सिर्फ अपने अनुभवों के बारे में लिखता हूँ, अपने विचार और भावनाएँ व्यक्त करता हूँ। और इसी अनुभव के आधार पर मैं कहना चाहता हूँ कि मैं नहीं चाहता कि कोई मेरा अनुयायी बने। मैं अपना कोई अलग समूह, धर्म, पंथ या समाज भी नहीं बनाना चाहता। अगर कोई मेरी बातों से प्रभावित होकर अपने आप में मगन रहना चाहता है तो मुझे खुशी होगी। अगर मैं प्रेममय जीवन जीता रह सका और अपने विचार यहाँ व्यक्त करता रह सका तो मैं उतने से ही प्रसन्न रहूँगा। बस इतना ही।

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