धर्म में नस्लवाद – गैर हिन्दुओं को हिन्दू मंदिरों में जाने की इजाज़त नहीं- 6 जुलाई 2012

कल मैंने उन गैर हिन्दुओं के बारे में लिखा था जो अपना धर्म छोड़कर हिन्दू धर्म अपनाना चाहते हैं और समझाया था कि यह किसी भी सूरत में संभव नहीं है। कुछ दिन पहले इस तथ्य पर चर्चा हो रही थी कि बहुत से हिन्दू मंदिर गैर हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति नहीं देते। किसी ने कहा कि यह नियम बदला जाना चाहिए और चर्चा तुरंत तीखे वाद-विवाद में तब्दील हो गई। मुझे लगता है, इस विषय पर भी एक ब्लॉग-प्रविष्टि लिखने का यह उचित समय है।

दक्षिण भारत में अधिकतर मंदिरों में गैर हिंदुओं का प्रवेश पूरी तरह वर्जित है। मंदिरों में बड़े-बड़े सूचना-पट्ट लगे होते हैं, जिनमें लिखा होता है कि सिर्फ हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति है। उत्तर भारत में भी कुछ मंदिर हैं, जहां इस रूढ़ि को सख्ती के साथ लागू किया जाता है, जैसे बनारस का विश्वनाथ मंदिर। या पूर्वी भारत में पुरी का जगन्नाथ मंदिर।

मैं पहले ही यह तथ्य आपके सामने रख चुका हूँ कि हिन्दू धर्म में धर्मांतरण असंभव है। इसलिए सिर्फ वही लोग, जो हिन्दू के रूप में पैदा हुए हैं, इन मंदिरों में प्रवेश के हकदार हैं। बाकी सभी लोगों को प्रवेश की अनुमति नहीं दी सकती। लेकिन मुझे इसमें एक समस्या नज़र आती है: आप कैसे पता करेंगे कि कोई दर्शनार्थी हिन्दू है या नहीं?

किसी के पास भी ऐसा कोई प्रवेश-पत्र नहीं होता जिससे पता चले कि वह हिन्दू है या नहीं। न कोई सदस्यता-कार्ड होता है कि आप उसे दिखाकर प्रवेश पा जाएँ। मुझे पता है कि जर्मनी में एक ‘चर्च टैक्स’ होता है, जो हर ईसाई अदा करता है। वे उसकी रसीद प्रमाण के तौर पर दिखा सकते हैं कि वे उस चर्च के सदस्य हैं। लेकिन, न तो कोई ‘मंदिर-टैक्स’ होता है और न उसकी कोई रसीद हो सकती है! आखिर आप कैसे सिद्ध करेंगे कि आप हिन्दू हैं?

लेकिन कुछ बाहरी प्रतीक-चिह्न होते हैं, जिनसे आप अनुमान लगा सकते हैं कि कोई व्यक्ति हिन्दू है। उच्च वर्ण वाले जनेऊ पहनते हैं, जो कंधे पर पहना जाने वाला एक धागा होता है। आप अपेक्षा कर सकते हैं कि कुछ तिलकधारी हिन्दू भी आपको दिखाई दे जाएँ, जिनके माथे पर लगे लाल-सिंदूरी टीके से आप उन्हें हिन्दू मान सकते हैं। मगर आप यह निश्चित तौर पर नहीं कह सकते कि जिन्होंने जनेऊ नहीं पहना या तिलक नहीं लगाया है, वे सभी हिन्दू नहीं हैं! यहाँ तक कि आप यह भी निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि हर जनेऊधारी या तिलकधारी व्यक्ति ने एक हिन्दू परिवार में ही जन्म लिया है! जनेऊ कोई भी खरीदकर पहन सकता है और तिलक भी कोई भी लगा सकता है।

कोई कह सकता कि दर्शनार्थियों के ज्ञान की परीक्षा ली जा सकती है। आप बिल्कुल पता कर सकते हैं कि कोई व्यक्ति कुछ सामान्य मन्त्र या श्लोक जानते हैं या नहीं या उसने कोई हिन्दू धर्मग्रन्थ पढ़ा है या नहीं और यह भी कि मंदिर में कैसा व्यवहार किया जाता है। लेकिन इसमें भी समस्या है; कई ऐसे गैर हिन्दू भी हैं, जो जन्मजात हिन्दू नहीं हैं और सिर्फ हिन्दू धर्म में रुचि के चलते ये सब बातें अच्छी तरह से जानते हैं! बहुत से ईसाई हैं या और किसी धर्म के लोग हैं, जिन्होंने हिन्दू धर्मग्रंथों का अध्ययन किया है। मगर सिर्फ ज्ञान उन्हें हिन्दू नहीं सिद्ध करता!

तब फिर ये मंदिर कैसे तय करते हैं कि किसे प्रवेश की इजाज़त है और किसे नहीं? वे उसकी त्वचा का रंग देखकर यह तय करते हैं। जी हाँ, अंततः यही बात तय करती है कि वह हिन्दू है या नहीं!

मेरा मानना है कि यह बेहद नस्लवादी धारणा है! वे सिर्फ यह देखते हैं कि व्यक्ति भारतीय लग रहा है या नहीं। तथ्य यह है कि कोई भी भारतीय मुस्लिम, ईसाई, यहूदी, बौद्ध या किस अन्य धर्म को मानने वाला भी हो सकता है! आप किसी के चेहरे की तरफ देखकर यह अनुमान नहीं लगा सकते कि उसके माँ-बाप हिन्दू थे या नहीं! वह अपने माँ-बाप को साथ भी ले आए तब भी आप नहीं जान पाएंगे कि वे जन्मजात हिन्दू हैं या नहीं! तो आप हर उस व्यक्ति को, जिसकी त्वचा का रंग लाल, गोरा या काला है या जो देखने में काकेशियाई (Caucasian) या अफ्रीकी लग रहा है, मंदिर में प्रवेश की इजाज़त नहीं देते, भले ही वह अरसे से हिन्दू धर्मग्रंथों का, उसके कर्मकांडों और नियमों का अनुसरण कर रहा है। इसके विपरीत आप हर उस व्यक्ति को, जो देखने में भारतीय लग रहा है, इजाज़त दे देते हैं, भले ही वह ईसा मसीह या अल्लाह को मानता हो या किसी ईश्वर को मानता ही न हो, नास्तिक हो!

अगर आप इसे नस्लवाद नहीं मानना चाहते तो उसे मज़ाक अवश्य मानेंगे। यह सरासर गलत रवैया है, बल्कि बहुत मूर्खतापूर्ण है!

मेरे इस संदेह और प्रतिवाद से यह न समझा जाए कि मैं गैर हिंदुओं को मंदिर प्रवेश की इजाज़त देने की वकालत कर रहा हूँ, जैसा कि कुछ लोग समझ सकते हैं। इसके विपरीत, मेरा यह कहना है कि हर उस मंदिर का बायकाट कीजिए, जहां ऐसे नियम हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि आखिर कोई गैर हिन्दू ऐसी जगह जाना ही क्यों चाहेगा जहां लोगों के साथ ऐसा गलीज व्यवहार होता है? अगर किसी जगह आपका स्वागत नहीं हो रहा है तो वहाँ जाने की इजाज़त प्राप्त करने के लिए आप इतना प्रयास क्यों करें?

अंत में मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि किसी भी धर्म में शामिल न होकर मैं बहुत खुश हूँ। मैं जहां चाहूँ जा सकता हूँ, मैं किसी भी धर्म को मानने वाले का अपने घर में और अपने आश्रम में स्वागत कर सकता हूँ और मैं विभिन्न संस्कृतियों के, विभिन्न धर्मों और विचारों को मानने वाले लोगों से घिरा रहने के लिए स्वतंत्र हूँ।

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