सुधारक नहीं, गुरु नहीं, आध्यात्मिक नेता नहीं, सिर्फ एक साधारण व्यक्ति – 1 अप्रैल 2013

धर्म

अगर आप मेरे ब्लॉग लगातार पढ़ते हैं तो आपने देखा होगा कि मैं अक्सर धर्मों की आलोचना किया करता हूँ। मेरे ब्लॉग का यह एक आम विषय है। इसका कारण यह है कि मेरे जीवन के तीस साल मैंने धर्मों के बीच और उन पर व्यापक चर्चा में बिताए हैं। इस दौरान मैंने धर्मग्रंथों का अध्ययन किया, दूसरों को उनके बारे में समझाते हुए प्रवचन दिये और फिर सालों बाद यू टर्न लेते हुए धर्मों पर विश्वास करना बंद कर दिया, बल्कि यह सोचना शुरू कर दिया कि धर्म वास्तव में लोगों को अपने काबू में रखने के लिए ईज़ाद एक चालबाजी है, धोखाधड़ी है। मगर कभी कभी ऐसा लगता है कि लोग मेरे लिखने के उद्देश्य को गलत समझे हैं।

कुछ टिप्पणियों से मुझे लगा है कि कुछ लोग यह समझ रहे हैं कि मैं धर्म में, खास कर हिन्दू धर्म में परिवर्तन लाना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि लोग अपने ‘मूल’ धर्म की ओर लौटें, पवित्रता के उच्च स्तर को प्राप्त हों, एक तरह के ‘सच्चे धर्म’ को अपनाएं। ये लोग, स्पष्ट ही, सोचते हैं कि मैं कोई सुधारक हूँ जो अपने धर्म की बुरी हालत से असन्तुष्ट होकर ऐसा कोई उपाय खोजने में लगा है कि उसमें कुछ परिवर्तन करके उसे नई दुनिया के विचारों के अनुकूल बनाया जा सके, उसे नई चुनौतियों का सामना करने हेतु सक्षम बनाया जा सके। यानी वे समझते हैं मैं धर्म को अपने विचारों के अनुसार ढालना चाहता हूँ। कुछ दूसरे समझते हैं कि मैं एक ‘आध्यात्मिक गुरु’ हूँ, एक तरह का आधुनिक गुरु जो अपने आपको ‘धार्मिक’ कहलाना पसंद नहीं करता और उसकी जगह ‘आध्यात्मिक’ शब्द का प्रयोग करता है। मैं इनमें से कोई भी नहीं हूँ। मैं सुधारक नहीं हूँ और मेरी धर्म को बदलने में कोई रुचि नहीं है। मैं किसी नए धर्म की खोज में भी नहीं लगा हूँ और न मैं धार्मिक व्यक्तियों के साथ कोई चर्चा ही करना चाहता हूँ कि सच्चा, असली या मूल धर्म-और इसलिए उनकी नज़र में एक अच्छा धर्म- कौन सा है या कैसा होना चाहिए या उसमें कौन सी बात बाद में जोड़ी गई है और इस कारण उसमें विकृति आ गई है जिसे सुधारा जा सकता है या सुधारा जाना चाहिए। मेरी नज़र में यह धार्मिक लोगों का एक बहाना होता है। वे जानते-समझते हैं कि धर्म एक गलत अवधारणा है और वह हमें कई गलत बातें भी सिखाता है लेकिन उसे स्वीकार करने और उसका बहिष्कार करने के स्थान पर वे तर्क प्रस्तुत करने लगते हैं कि धर्म में सारी बुराइयाँ बाद में जोड़ दी गई हैं और हमें सिर्फ उसकी मूल पवित्रता को पुनः स्थापित करना है।

नहीं, जब मैं धर्म की आलोचना करता हूँ तब मेरे दिमाग में यह सब कतई नहीं होता। मैं नहीं मानता कि धर्म पहले कभी अच्छा रहा था। इसके विपरीत, मैं विश्वास करता हूँ कि धर्म की स्थापना ही इसलिए की गई थी कि लोगों पर कुछ निहित स्वार्थी तत्वों का नियंत्रण कायम किया जाए, और इस बात को मैं अच्छा कैसे मान सकता हूँ? उस समय जब धर्म की स्थापना की गई, लोग समझ में न आने वाली चीजों से डरते थे। धार्मिक और स्वार्थी लोग उनके सामने उन रहस्यमय बातों का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करते थे और इस तरह उनके अज्ञान और डर को उनके गले की जंजीर और पट्टा बनाकर उन पर अपना शिकंजा कसने में कामयाब होते थे। यह न तो पावन कर्म है न उससे लोगों का कोई भला होता है।

धर्म वर्तमान समय में एक पुरातनपंथी विचार है क्योंकि हमने उन सवालों के उत्तर खोज लिए हैं जिनके कारण पहले-पहल धर्म की स्थापना की गई थी। ऐसे विश्वासों को पकड़कर बैठने की हमें क्या ज़रूरत है जो हमें और कुछ नहीं दे सकता? आदिम, बर्बर धर्मग्रंथों के साथ सिर्फ धूर्तता और डर ही बचे रह गए हैं इसलिए चाहे कोई भी धर्म हो, उसे भूत के अवशेष समझकर दफना दिया जाना ही उचित होगा। मनुष्य के इतिहास में पहले भी कई धर्म मृत्यु को प्राप्त हुए हैं और आज के धर्म भी समय आने पर इतिहास के पन्नों में दफन हो जाएंगे।

तो, धर्मों को बदलने के काम में मेरी कोई रुचि नहीं है। मैं यह भी नहीं कहता कि मैं धर्मों का खात्मा कर देना चाहता हूँ-कोई अहंकारी ही ऐसा कह सकता है! मैं आपसे ज़्यादा से ज़्यादा इतनी अपेक्षा रखता हूँ कि आप अपने दिमाग पर ज़रा ज़ोर डालें और महसूस करें कि स्वयं आपके लिए क्या उचित है। मैं कोई सुधारक या गुरु नहीं हूँ, न ही मैं कोई आध्यात्मिक नेता हूँ। मैं सोचने समझने वाला एक साधारण व्यक्ति हूँ जो अपने ब्लॉग के माध्यम से अपनी स्वतंत्र राय व्यक्त करता हूँ।

अगर आप ईमानदारी और प्रेम से जीवन बिताना चाहते हैं तो धर्म की आपको कोई आवश्यकता नहीं है। उसे आध्यात्मिकता, एक ऐसा शब्द जिसे कई पेचीदा और भ्रामक तरीकों से इस्तेमाल किया जाता है, कहने की भी आपको ज़रूरत नहीं। सिर्फ प्रेम करें और ईमानदारी के साथ अपना जीवन व्यतीत करें-और किसी बात की कोई आवश्यकता नहीं है!

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