जो पुरुष जो अपनी लड़कियों को ढँककर रखना चाहते हैं वही दूसरों की लड़कियों को नग्न देखने के सबसे ज़्यादा उत्सुक होते हैं! 5 अगस्त 2014

मैंने कल जिस विषय की तरफ इशारा किया था, उस पर आज ज़रा विस्तार से चर्चा करना चाहता हूँ: भारतीय पुरुषों का बहुत बड़ा पाखंड-और दूसरे देशों के पुरुषों का भी, जहाँ यही स्थिति पाई जाती है-कि वे चाहते हैं कि उनकी पत्नियाँ और लड़कियाँ ढँकी-छिपी रहें। वास्तव में मैं तो यह समझता हूँ कि वे भावनाओं के जंजाल में फँसे हुए होते हैं इसलिए बहुत पाखंडी रवैया अख़्तियार कर लेते हैं। और उनके इस रवैये का संचालन एक बार फिर उसी शक्ति के, यानी धर्म के, हाथों में होता है!

अगर आप ऐसे लोगों की पत्नियों और लड़कियों के साथ उनकी बातचीत सुनें तो आपको हमेशा उनके आदेश, बल्कि चेतावनियाँ सुनाई देंगी, जो वे अपनी स्त्रियॉं को देते रहते हैं, जिनमें उन्हें शालीन, मर्यादित और सादे वस्त्र पहनने के लिए कहा जाता है। अपनी कम से कम त्वचा दूसरे पुरुषों को दिखाई दे, इसका विशेष ख्याल रखने की हिदायत दी जाती हैं। ये शिक्षाएँ प्रकारांतर से स्त्रियॉं को यह बताती हैं कि अगर उनके साथ बलात्कार या कोई यौन दुराचार होता है तो उन्हीं का दोष माना जाएगा! उन्हें अपने घुटने, कंधे और सिर ढँककर रखने होंगे, जिससे कोई भी पुरुष उनकी ओर यौन आकर्षण न महसूस करे। यही सब बातें उनके पिता और उनके पति उन्हें सिखाते हैं।

अब अगर आप इन लड़कियों के पिताओं के ऑनलाइन व्यवहार पर नज़र डालें या यह जानने की कोशिश करें कि वे व्हाट्सऐप या फेसबुक पर किस तरह की तस्वीरें अपने मित्रों के साथ साझा करते हैं तो आप आश्चर्यचकित रह जाएँगे: वे अपने दिन का बहुत बड़ा हिस्सा अर्धनग्न महिलाओं की तस्वीरों को ताकते हुए बिताते हैं! वे "हॉट इंडियन गर्ल्स" शीर्षक वाले पेज फॉलो करते हैं, ऐसी समाचार एजेंसियों की सदस्यता ग्रहण करते हैं, जो उनकी ईमेल पर हर हफ्ते "हॉटेस्ट पिक्चर्स ऑन द वेब" जैसी तस्वीरें भेजती रहती हैं और जब आप उनकी पसंदीदा हस्तियों की जानकारी लेंगे तो उनमें प्रसिद्ध सुपर मॉडेल्स को अंगवस्त्रों और बिकनियों में पाएँगे। अधिकतर लोग शायद असली पॉर्न ढूँढ़ने और देखने से कतराते हैं-लेकिन अगर उन्हें यह विश्वास हो जाए कि यह पूरी तरह गोपनीय, सुरक्षित और व्यक्तिगत रहा आएगा तो वे उन्हें भी अवश्य देखेंगे।

कोई इससे अधिक पाखंडी क्या हो सकता है? आप सोचते हैं कि महिलाओं का अपनी त्वचा की नुमाइश करना गलत है, यहाँ तक कि आप अपनी पत्नी को भी नंगा देखने से कतराते हैं मगर दूसरी औरतों को, जो दूसरे पुरुषों की पत्नियाँ और बेटियाँ हैं, नंगा या अधनंगा देखने के लिए लालायित रहते हैं!

आपकी यह प्राकृतिक और उत्तेजक इच्छा होती है इसलिए आप उसे पसंद करते हैं! आप जिज्ञासु होते हैं, आप अपने अंदर मौजूद सभी इंद्रिय-संवेदनाओं और उत्तेजनाओं को जानना और महसूस करना चाहते हैं। यह बहुत प्राकृतिक है! लेकिन फिर जब आप सोचते हैं कि आप वहाँ, उन वेबसाइटों पर क्या कर रहे थे तो अपराधबोध से भर जाते हैं! फिर आप उन महिलाओं के बारे में अनुमान लगाने लगते हैं, उनका मूल्यांकन करने लगते हैं! फिर आप उन्हें गालियाँ बकना शुरू कर देते हैं, ऐसी-ऐसी बातें उनके बारे में कहते हैं, जिन्हें अपनी लड़कियों और पत्नियों के बारे में आप सुनना पसंद नहीं करेंगे! सुन लेंगे तो क्रोध से भर उठेंगे! लेकिन इसमें क्या शक कि आप उन अजनबी औरतों को देखना पसंद करते हैं।

यह सब बहुत विकृत और घृणित है, यह गलत है और यह भयंकरतम है कि इसका नतीजा बलात्कार में परिणत होता है। ऐसे लोगों द्वारा ही, जिन्होंने अपनी नैसर्गिक इच्छाओं का दमन किया होता है, बलात्कार और यौन दुराचार किया जाता है क्योंकि वे अपनी दमित इच्छाओं को इससे आगे काबू में नहीं रख पाते। ऐसे लोग सबसे बड़े पाखंडी होते हैं। और उन्हें धर्म ने ही पाखंडी बनाया है। धर्म ने सेक्स को वर्जित किया। धर्म ने सेक्स का मज़ा लेने वालों और कामोत्तेजना महसूस करने वालों के दिलों में अपराधबोध भर दिया। धर्म ने आदेश दिया कि महिलाओं को ढँका-छिपा जीवन बिताना चाहिए। धर्म कहता है कि स्त्रियाँ ही पुरुषों को बलात्कार करने के लिए उद्यत करती हैं।

पाखंड, धर्म, अपराधबोध और बलात्कार! भयानक रूप से एक दूसरे से नाभिनालबद्ध हैं! .

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