ऊँचा संगीत, लम्बी चुटिया और फेसबुक पर धार्मिक तुकबंदियाँ – धार्मिक समर्पण या महज दिखावा – 13 नवम्बर 2014

आज आश्रम में चहलकदमी करते हुए हमें संगीत सुनाई दिया। वे अक्सर सुनाई देने वाले मंदिर की घण्टियों के सुरीले स्वर नहीं थे बल्कि गाने-बजाने के स्वर थे, जो हालांकि बहुत असाधारण बात नहीं है मगर दुर्भाग्य से वे घण्टियों के स्वरों से कुछ अधिक कर्कश होते हैं क्योंकि उन्हें लाउडस्पीकर से जोड़ दिया जाता है। जैसे-जैसे हम फाटक के करीब आते जाते संगीत का स्वर तीव्र से तीव्रतर होता जा रहा था और जब फाटक तक पहुँचे, जहाँ से सड़क शुरू होती थी, उसकी तीव्रता असहनीय हो गई। आश्चर्य नहीं कि एक बार फिर मेरे मन में धार्मिक लोगों की मानसिकता को लेकर तरह-तरह के विचार आने लगे!

पूर्णेंदु परिक्रमा मार्ग पर रोज़ घूमने जाता है। यह परिक्रमा तीर्थयात्रियों की धार्मिक यात्रा का एक हिस्सा होती है, जो शहर का दस किलोमीटर का एक चक्कर होता है और स्वाभाविक ही रास्ते में कई मंदिर पड़ते हैं। वह तो कसरत के उद्देश्य से घूमने जाता है मगर उसे मंदिरों की गतिविधियों को करीब से देखने का मौका मिल जाता है। गेट से वापस लौटते हुए, जिससे हम बातचीत कर सकें, पूर्णेन्दु ने बताया कि जिस मंदिर में तीखी आवाज़ में गाने बज रहे थे, महज गिनती के लोग बैठे हैं। बल्कि मंदिर लगभग खाली पड़ा है और गाने के स्वर सुनाई दे रहे हैं। बिना लाउडस्पीकर के भी सभी को संगीत सुनाई दे सकता था-वैसे भी वह इतना मधुर भी नहीं था मगर उससे कम से कम बाहर के लोगों को उससे असुविधा नहीं होती। दुर्भाग्य से उनके पास माइक्रोफोन हैं और उन्होंने कर्कश आवाज़ में वे विशालकाय लाउडस्पीकर चला रखे थे। मैं कल्पना कर सकता था कि मंदिर में वातावरण सामान्य होगा और दस से पंद्रह लोग मिलकर गा बजा रहे होंगे या आपस में अच्छा समय बिता रहे होंगे-लेकिन बाहर वही आवाज़ इतनी कर्कश थी कि जैसे दस हजार लोगों के लिए समवेत स्वरों में कोई बैंड बज रहा हो या हजारों लोगों के सामने किसी गायक मंडली का गाना चल रहा हो, जिससे सबको उनका गाना सुनाई दे सके!

मेरा निष्कर्ष, और इस निष्कर्ष पर मैं पहली बार नहीं पहुँचा हूँ, यह है कि धर्म पाखंड से परिपूर्ण है। वहाँ भीतर पूजा-अर्चना का कोई मामूली धार्मिक समारोह चल रहा होगा-लेकिन उनके लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि सारा इलाका इस बात को जाने! क्या खुद मिलजुलकर, कुछ लोगों के बीच वे यही पूजा-अर्चना नहीं कर सकते? धार्मिक लोग धर्म में उतना रुचि नहीं रखते जितना यह दिखावा करने में रखते हैं कि वे कितने धार्मिक हैं! यह एहसास मुझे बहुत समय पहले हो चुका था मगर उसके बाद इतनी बार इसके चिह्न मिले कि अब मुझे विश्वास हो गया है कि मेरा एहसास महज एहसास नहीं है बल्कि एक कटु वास्तविकता है।

क्या फेसबुक पर आपके कुछ धार्मिक मित्र भी हैं? और क्या आपने उन्हें देवताओं के फ़ोटो, धर्मग्रंथों के श्लोक, मन्त्र या ऋचाएँ पोस्ट करते हुए पाया है? भगवान ने तो अपना कोई फेसबुक प्रोफाइल नहीं बनाया है-फिर वे लोग किसे दिखाना चाहते हैं कि वे धार्मिक हैं क्योंकि भगवान तो नहीं देख पाएगा? स्वाभाविक ही वे अपने मित्रों और रिश्तेदारों को दिखाना चाहते हैं कि वे कितने धार्मिक हैं! यह सारा तामझाम वे दूसरों को यह दिखाने के लिए करते हैं कि वे भगवान और धर्म के प्रति कितने समर्पित हैं-बल्कि यह भी कि देखिए, हम आपसे ज़्यादा धार्मिक हैं!

भारत में ऊँची जाति वाले बहुत से धार्मिक लोग सिर पर पीछे की तरफ लम्बी चोटी रखते हैं। मुस्लिम और सिख दाढ़ियाँ और लंबे बाल रखते हैं। वे कहते हैं कि इससे ईश्वर के साथ बेहतर संपर्क कायम हो पाता है-जैसे लंबे बाल एरियल का काम करते हों और ईश्वरीय संदेशों को आसानी के साथ पकड़ने में कामयाब हो जाते हों! वास्तविकता यह होती है कि वे यह दर्शाना चाहते हैं और लोगों को बताना चाहते हैं कि वे उनसे ज़्यादा धर्म परायण हैं, उनका ईश्वर के साथ बेहतर सम्बन्ध है, वे अधिक ऊँची जाति के हैं और कुल मिलाकर अपने आसपास के लोगों से, जो ऐसी जीवन शैली नहीं अपनाते, बेहतर इंसान हैं! लेकिन हम सब जानते हैं कि लंबे या छोटे बाल रखने में कुछ भी दैवी या ईश्वरीय नहीं है!

मेरे विचार में इन सभी मूर्खतापूर्ण धारणाओं और कर्मकांडों ने और इस दिखावे ने ईश्वर के विचार को, धर्म, विश्वास और आस्थाओं को लाभ पहुँचाने से अधिक नुक्सान पहुँचाया है। बुद्धिमान लोग इन बातों से मुँह मोड़ लेते हैं इन बातों को उचित नहीं मानते और इन धर्मों से आसानी के साथ विलग हो जाते हैं क्योकि वे देखते हैं कि वहाँ पाखंडियों की भरमार है, जो सिर्फ दिखावा करना जानते हैं!

या जो ईश्वर के प्रति अपनी सेवा या भक्ति के रॉक कंसर्ट जैसे शोरगुल से आसपास के इलाके में रहने वाले लोगों का जीना दूभर कर देना चाहते हैं। इतना कि लोगों के लिए आपस में बातचीत करना भी नामुमकिन हो जाए।

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