इस्लामिक कानूनों वाले देशों में महिलाओं के विरुद्ध होने वाला वैधानिक अत्याचार – 14 नवम्बर 2011

धर्म

हाल ही में मैंने दो समाचार-आलेख पढ़े, जिनमें मुस्लिम देशों में महिलाओं की स्थिति का वर्णन किया गया है। इन आलेखों ने एक बार फिर मेरे इस इरादे को मजबूत किया है कि मैं उन देशों में कभी नहीं जाना चाहूँगा, जहाँ इस्लाम धर्म के अनुसार कानून बनाए जाते हैं।

जो पहला आलेख मैंने पढ़ा वह सऊदी अरब में महिलाओं के कार चलाने से सम्बंधित है। सऊदी अरब में किसी भी देश की महिलाओं के कार चलाने पर सख्त पाबन्दी है। कोई तर्क नहीं, वे कार नहीं चला सकतीं, बस! कुछ महिलाओं ने, जिनके पास कार चलाने के विदेशी लायसेंस थे, जून माह में इन कानूनों का विरोध किया था। ये महिलाएं एक-दूसरे को कार चलाने के लिए प्रोत्साहित किया करती थीं और कार चलाते हुए अपने चित्र और विडिओ इन्टरनेट पर पोस्ट किया करती थीं। कुछ समय पहले तक पकड़ में आने पर महिलाओं से लिखवा लिया जाता था कि वे आगे से कार नहीं चलाएंगी लेकिन अब कार चलाते हुए पाई जाने वाली महिलाओं को दस कोड़ों की सजा सुनाई जाती है। उसने यहाँ तक कहा कि वह इस क़ानून के विरोध में नहीं बल्कि आवश्यकतावश कार चला रही है। इस सम्बन्ध में कोई लिखित कानून भी नहीं है मगर ऐसी धार्मिक परम्परा है, जो सिर्फ इसलिए कायम है कि महिलाओं की स्वतंत्रता को और कम किया जाए। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि घूमने-फिरने की आज़ादी महिलाओं को पाप करने के लिए प्रोत्साहित करेगी।

इस पूरी कहानी की विडम्बना यह है कि अभी हाल ही में राजा ने अगले चुनावों में महिलाओं को वोट देने की अनुमति प्रदान करने का वादा किया था। क्या यह पागलपन नहीं है कि आज भी दुनिया में यह सब हो रहा है?

दूसरे आलेख में छपे ऐसे ही एक और समाचार से मेरे मन में फिर यही विचार आया था। एक ईरानी अभिनेत्री को एक साल के कारावास और 90 कोड़े लगाए जाने की सज़ा सुनाई गई थी। उसका अपराध? यह कि उसने एक फिल्म में काम किया था। अपने उस रोल में वह एक ऐसी अभिनेत्री का किरदार निभा रही थी, जिसके नाटकों में काम करने पर तेहरान के सरकारी अधिकारियों ने पाबन्दी लगाई हुई थी और इसलिए उसे गुप्त रूप से काम करना पड़ता था। इस फिल्म पर ईरान में पाबन्दी लगी हुई थी और उसे गैरकानूनी तौर पर दिखाया जाता था।

जब भी मैं इस तरह के समाचार पढ़ता हूँ तो इस बात पर स्तब्ध रह जाता हूँ कि कैसे आज भी दुनिया में यह सब हो रहा है। ऐसे न्यायालय हैं जो इस तरह की सजाएं दे रहे हैं! ऐसा नहीं है कि कोई भीड़ मामले को अपने हाथ में ले रही हो और फिर चीजें बेकाबू हो जाने के कारण अधिकारियों को कार्यवाही करनी पड़ी हो। बिल्कुल नहीं, यह एक नियंत्रित, सोचा-समझा निर्णय होता है, जिसे शांति के साथ, कानूनी तौर पर अंजाम दिया जाता है। यह क़ानून एक धर्म का क़ानून है, इस्लाम का, और यह सोचकर मैं स्तब्ध रह जाता हूँ कि ये कानून कितने हिंसक, अनुचित और बर्बर तरीके से महिलाओं के साथ पेश आते हैं। सऊदी अरब में किसी दूसरे यातायात सम्बन्धी अपराध में सिर्फ अर्थदंड का नियम है मगर महिलाओं को कार चलाने पर कोड़े लगाए जाते हैं! और जो महिलाएं अपना काम करती हैं, उन फिल्मों में अभिनय करती हैं, जो यथार्थ का चित्रण करती हैं, उन्हें भी कोड़े खाने पड़ते हैं! यह बड़ा ही क्रूर है, बेहद अन्यायपूर्ण! यह पूरी तरह गलत बात है। मगर यही उनका कानून है।

यही कारण है कि मुस्लिम देशों में, जहां के कानून इस्लाम के मुताबिक चलते हैं, जाने की मेरी इच्छा नहीं होती। मुझे इन मुस्लिम देशों में रहने वाले अपने कई मित्रों के निमंत्रण मिलते रहे हैं लेकिन मेरे अंदर ज़रा सी भी रुचि नहीं जागती कि मैं वहाँ जाऊँ। मुझे लगता है कि इस धर्म में इतना ज़्यादा लिंग-भेद है और महिलाओं पर इतना ज़्यादा अत्याचार होता है कि जिस देश में भी इस धर्म का कानून चलता है, वह मुझे ज़रा भी आकर्षित नहीं करता। वह मुझे ठीक ही नहीं लगता।

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