क्या धर्म, नास्तिकता और न्यूएज आन्दोलन का कोई विकल्प है? 7 जून 2012

धर्म

कुछ वक़्त पहले मैंने एक सलाह-सत्र किया था और मैं समझता हूँ कि जिस विषय पर हम चर्चा कर रहे थे, वह कई और लोगों के लिए भी रुचिकर होगा। विषय है, जैसा कि अक्सर होता है-धार्मिक विश्वास और यह कि क्या कोई (धार्मिक अथवा सामूहिक) विश्वास होना आवश्यक है या नहीं?

मैं जिस महिला के साथ बात कर रहा था, उसने बताया कि उसका लालन-पालन एक नास्तिक परिवार में हुआ है। बचपन में वह कभी भी चर्च, मस्जिद या मंदिर नहीं गई और ईश्वर कभी भी उनके घर में चर्चा का विषय नहीं रहा। दरअसल पुरातन धर्मग्रंथों और आधुनिक जीवन और उसकी अनिवार्य आवश्यकताओं के बीच द्वंद्व के चलते धर्म द्वारा पैदा की जाने वाली भ्रांतियों के बगैर जीवन बिताने के लिए यह एक आदर्श स्थिति थी। वह अति-धार्मिक और अति-आस्तिक लोगों से, जो उसे अपने विश्वासों का कायल बनाने का प्रयत्न कर सकते थे, हमेशा दूर रहा करती थी। वह यह नहीं चाहती थी। लेकिन इसमें एक समस्या थी।

"मुझे महसूस होता था कि इसके अतिरिक्त भी कुछ न कुछ अवश्य होना चाहिए!" अब उसे आप कोई ‘ऊर्जा’ कह सकते हैं, सर्वशक्तिमान सत्ता कह सकते हैं या जो मन में आए कह सकते हैं। लेकिन अब वह कहाँ जाए?, उसके जैसा सोचने वाला कहाँ मिलेगा, जिससे वह पूछ सके? कहाँ मिलेगा, जो उसके जैसा हो, जिसके साथ उसके विचार और रुचियाँ मिलती हों।

धर्म उसे अप्रिय था। उसने उनका छल-प्रपंच और नियंत्रण करने की उनकी फितरत को करीब से देखा था। स्वाभाविक ही, अगली सीढ़ी, जिधर वह कदम बढ़ा सकती थी वह था, हर तरह के अस्तित्व और सिद्धांतों पर अपने बेबाक खुलेपन के साथ न्यूएज आंदोलन, क्योंकि किसी और धर्म या संप्रदाय में जाकर फिर उसी प्रपंच में वह फंसना नहीं चाहती थी। लेकिन: उसे वह भी पसंद नहीं आया। "उसमें हर बात की अति दिखाई देती थी, पागलपन की हद तक और मैं यह सब तलाश नहीं कर रही थी।"

मैंने उससे कहा कि जो वह कह रही है मैं ठीक से समझ पा रहा हूँ। बल्कि मैंने इस विषय पर एक ब्लॉग भी लिखा था, जिसमें मैंने स्पष्ट किया था कि मैं धर्म पर विश्वास नहीं करता था मगर मैं नास्तिक भी नहीं था। पहले मैं मन्त्रों और प्रार्थनाओं में विश्वास करता था और मानता था कि यही ईश्वर हैं। मैं विश्वास करता था मगर साथ ही विश्वास नहीं भी करता था। दरअसल यह संभव नहीं कि आप किसी भी बात पर विश्वास न करें, वह किसी दूसरे के शब्द हो सकते हैं या स्वयं आपके विचार या धारणाएँ; आप किसी न किसी बात पर विश्वास करते ही हैं।

लेकिन इसके लिए आपको अपना कोई समूह बनाने की या किसी समूह में शामिल होने की ज़रूरत नहीं है। न्यूएज मूवमेंट मेरे लिए एक संशोधित धर्म की तरह है। लोग पुराने धर्मों से दूर हो रहे हैं और विभिन्न धर्मों से अलग-अलग विचार ले-लेकर एक और ढांचा निर्मित कर रहे हैं। विभिन्न संप्रदाय भी इसी तरह विभिन्न विचारों और परम्पराओं का संग्रह ही हुआ करते थे। अधिकतर लोग कोई एक दिशा अपनाते हैं, जैसे कोई समूह कार्ड-रीडिंग पर विश्वास करने लगता है तो कोई फरिश्तों पर तो कोई पूर्वजन्म आदि पर विश्वास करने लगता है। कोई एक विचार-पद्धति चुन लो और उस पर डटे रहो। तो यह भी एक धर्म ही है और कुछ नहीं, जिसका एक अलग तरह का दर्शन है, जिससे भिन्न सोचने की इसमें भी कोई गुंजाइश नहीं है।

इसके विपरीत, नास्तिक कहते हैं कि हम इनमें से किसी भी सिद्धान्त पर विश्वास नहीं करते और इस तरह अपनी अलग पहचान स्थापित करने की कोशिश करते हैं। उनके पास विश्वास न करने का सिद्धान्त है-और वे भी उसी समूह में अपने आपको सहज महसूस करते हैं, जो ठीक यही बात कहता है। ईश्वर नहीं है, इस बात पर विश्वास करना भी एक तरह का विश्वास ही है।

क्या यह आपके लिए आवश्यक है कि आप इनमें से किसी न किसी समूह का चुनाव करें ही? खुश होने के लिए क्या यह ज़रूरी है कि आप किसी वर्गीकरण की सीमा में बंध जाएँ? क्या होगा अगर आप किसी भी समूह में पूरी तरह फिट नहीं होते? क्या इसके कारण आप हमेशा हमेशा के लिए दुखी हो जाएंगे? नहीं! मेरी बात पर विश्वास कीजिए कि आपको किसी और के लिखित या अलिखित वचनों का अनुसरण करने की ज़रूरत नहीं है, धर्मग्रंथों में लिखी ऋचाएँ हों या लोगों की सुनी-सुनाई बातें हों! अगर कोई कहता है कि ईश्वर पर विश्वास करो तो उसका कहना मानकर आपको भी विश्वास करने की ज़रूरत क्यों हो? इसी तरह अगर कोई कहता है कि ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास करना ठीक नहीं है तो आप उसकी बात क्यों मानें?

आपकी अपनी भावनाएँ और विचार हैं और आप कुछ बातों पर विश्वास रखते हैं। बस, उस बात पर डटे रहें, यह पर्याप्त है। दिल खुला रखें और अपने आपको किसी वर्ग में सीमित करने से बचें। अगर आप किसी समूह में फिट नहीं होते तो भी आप प्रसन्न और संतुष्ट रह सकते हैं। बल्कि मेरे खयाल से ऐसा होने पर आप ज़्यादा खुश हो सकते हैं क्योंकि तब आप बेहतर ढंग से दूसरों के विचारों पर (विश्वासों पर) गौर कर सकते हैं। आप जो भी हैं, आप जो भी अनुभव करते हैं और जैसा भी सोचते हैं, उस पर भरोसा कीजिए। यह बहुत आसान है।

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