अगर आप वाकई धर्म को जानना चाहते हैं तो उससे पूछिए जिसने उसे छोड़ दिया है – 6 नवम्बर 2012

धर्म

जैसा कि मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ, कल भी मैंने ज़िक्र किया था कि धर्म हमेशा आपको अपना अंधभक्त बनाने की कोशिश करेगा। वह चाहेगा कि आप गहराई से न सोचें कि धर्मग्रंथों में क्या लिखा या बताया गया है बस आँख बंद करके विश्वास करें उस पर। वे चाहते हैं कि आप उसमें मौजूद गलतियाँ और कमज़ोरियाँ न पकड़ पाएँ और पूछताछ करने लगें। और यही वे धार्मिक लोग हैं जो दरअसल अंधविश्वासी हैं और धार्मिक तर्कों की कमजोरियों को नज़रअंदाज़ करते हैं। कई बार लोग धर्म द्वारा मूर्ख बना लिए जाने के कारण खुद निर्णय लेकर, जानते-बूझते अंधविश्वासी हो जाते हैं और कुछ, बल्कि अधिकांश लोग किसी न किसी धर्म में पैदा हुए और उनका लालन-पालन भी उसी धर्म में हुआ और उसके बारे में ज़्यादा जानने की उन्होंने आवश्यकता ही नहीं समझी।

पहले उनकी बात करें जिन्होंने, मेरी तरह, एक धार्मिक या धर्मभीरु परिवार में जन्म लिया और पले बढ़े। मैं जानता हूँ कि आप धर्म के बारे में क्या सोचते हैं। यही कि दूसरी कई सामान्य और आम बातों की तरह वह भी रोज़मर्रा की महत्वहीन और सामान्य बात है। जो बचपन से आपको बताया गया है उसे स्वीकार करने के अलावा आपके पास कोई चारा भी नहीं है। जिसे आपके अभिभावकों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी, परंपरागत रूप से विश्वास किया उस पर आपका विश्वास करना भी एक सामान्य सी बात ही हैं।

वृन्दावन जैसे धार्मिक स्थान पर पलते-बढ़ते हुए मेरे लिए धर्म से परे कुछ भी सोच पाना नामुमकिन था। मेरे आसपास के लोग, मेरा परिवार, दोस्त और कस्बे के सभी लोग धार्मिक थे। किसी ने भी सपने में भी नहीं सोचा था कि धर्म गलत हो सकता है, उसमें भी कुछ त्रुटियाँ हो सकती हैं। यह चुट्कुले जैसा होता। बचपन में मैंने कोई ऐसी बात नहीं सुनी, न पढ़ी जो धर्मविरोधी हो। मैंने एक उपदेशक और धर्म गुरु के पेशे को अपनाया यह स्वाभाविक ही था क्योंकि मैं यह मानता था कि जो मैं दूसरों को बता रहा हूँ वह उचित और सत्य है। ऐसी अवस्था में धर्म को अस्वीकार करने का विचार भी आपके मन में नहीं आ सकता था।

गुफा में कुछ वक्त बिताने के बाद सब कुछ बदल गया। हो सकता है कि सम्पूर्ण एकांत और सारा वक़्त ध्यान की अवस्था में गुजारने के कारण मेरे भीतर विचार परवान चढ़ रहे थे और मैं सोच पाया कि मेरे विश्वासों से परे कुछ और भी हो सकता है। गुफा से बाहर आने के बाद जब मैंने उन्हीं धर्मग्रंथों को फिर पढ़ा तो उन्हीं शब्दों के कुछ दूसरे अर्थ मेरे सामने खुल रहे थे और समय गुजरने के साथ, धीरे-धीरे मुझे महसूस होने लगा कि मैं अब इन धर्मग्रंथों पर विश्वास नहीं कर सकता।

अगर आप धर्म के साए में पल रहे हैं तो दूसरे दृष्टिकोण को भी अपने सामने रखें। भारत में हम आपकी स्थिति की तुलना कुएं के मेंढक के दृष्टिकोण से करते हैं। मेंढक के लिए कुआं ही उसकी सारी दुनिया होता है। वह नहीं जानता की कुएं की दीवारों के बाहर हरे भरे घास के मैदान हैं, बड़ी-बड़ी झीलें हैं और अगर वह उछलकर अपनी आरामदेह दुनिया के बाहर नहीं निकला तो उसे कभी भी सचाई का पता नहीं चल पाएगा।

वे सभी, जिन्होंने आँख मूंदकर किसी का अनुयायी बनना तय किया है या जिन्हें मूर्ख बनाकर पीछे चलने के लिए मजबूर किया गया है, कभी समझ ही नहीं पाएंगे कि वे अंधविश्वासी हैं, बल्कि समझेंगे कि उन्हें सत्य की प्राप्ति हुई है, एक चमत्कार, जो उनकी मुक्ति का साधन बनेगा, आत्मिक शांति प्रदान करेगा या शायद इस अटूट विश्वास के जरिये कुछ धन-लाभ ही हो जाए। निश्चय ही आपको अपनी आँखें खोल देनी चाहिए और स्वीकार करना चाहिए कि धर्म की चालबाज़ियों के सामने आप बेबस हो गए थे और जानते-बूझते आपने अपनी आँखें बंद कर ली थीं।

अगर आप वास्तव में धर्म को जानना चाहते हैं आपको इस बात का अध्ययन करना चाहिए कि दरअसल आप किस बात पर भरोसा कर रहे हैं। गहराई में जाकर इस बात की खोज कीजिए कि धर्मग्रंथों में क्या लिखा है और अगर आप किसी चीज़ से असहमत हैं, उसमें लिखी कोई बात आपको पसंद नहीं आ रही हैं तो हिम्मत करके अपने आप से पूछिए कि क्या उस बात को आप आँख मूंदकर स्वीकार कर लेंगे। सिर्फ इसलिए कि धर्म आपसे यही अपेक्षा करता है। सिर्फ उन्हीं से बात करना काफी नहीं है जो आपसे कहते हैं कि धर्म पर विश्वास करो बल्कि उनसे भी बात कीजिए जो सोच-समझकर धर्म से दूर हुए हैं। ऐसा कदम उठाएँ और धर्म को उनकी आँख से भी देखने की कोशिश कीजिए जिन्होंने उसे छोड़ दिया है।

अंत में आप महसूस करेंगे कि आप अब कुएं के मेंढक नहीं रहे। अब आप जानते हैं कि आप उस सीमा के पार जाकर देख सकते हैं जिसे आपने दुनिया का छोर समझ रखा था। और अगर आप तय कर लें कि आप अपनी आँखें बंद नहीं रखेंगे तो आप उछलकर सीमा के पार भी निकल सकेंगे, उस तरफ, जिधर आपके लिए चुनाव की स्वतन्त्रता है।

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