युद्ध, भ्रष्टाचार, धोखा, लालच और अमरता की इच्छा ने कुम्भ मेले की रचना करी – 21 जनवरी 2013

धर्म

इस समय भारत में एक बहुत बड़ा त्यौहार चल रहा है जिसकी ख़बरें हम टेलीविज़न और समाचार पत्रों में देखते हैं। जल्द ही कुम्भ मेला इलाहाबाद में प्रारम्भ होने वाला है, जिसमें करोड़ों लोगों के शामिल होने की उम्मीद है। मैं कुम्भ मेले का मर्म बताना चाहता हूं क्योंकि आप लोगों में से शायद बहुतों को धरती के इस सबसे बड़े धार्मिक त्यौहार के बारे में पता न हो।

हिन्दू शास्त्रों में आपको कई कहानियां मिल जायेंगी जो बुराई पर अच्छाई की कथा कहती है। इस देवासुर संग्राम में देवी, देवता अच्छाई का पक्ष लेते थे और असुर या दानव बुराई का पक्ष। उनकी अमृत पीकर अमर होने की इच्छा भी एक देवासुर संग्राम की कहानी को कहती है। दोनों शक्तियां इस बात से भलीभांति परिचित थी कि अगर वे समुद्र मंथन करेंगे तो उन्हें अमृत मिलेगा। जैसे दूध को मथने से मक्खन निकलता है वैसे ही अमरत्व को प्राप्त कराने वाला अमृत निकालने के लिये समुद्र मंथन करने की आवश्यकता होगी। अब प्रश्न है कि इतने बड़े समुद्र का मंथन कैसे किया जाये? तो इसके लिये एक पर्वत को मथानी बनाया गया और मथने के लिये एक रस्सी की जरूरत भी पड़ती है अतः एक सर्प का प्रयोग किया गया। इस समुद्र मंथन में एक ओर देव थे तो दूसरी ओर असुर थे। वह उस पर्वत को आगे पीछे खींचते रहें जिससे समुद्र मंथन हो पाया।

जब समुद्र मंथन हो रहा था तो उसमें से बहुत सी चीजें निकली जिनका वितरण देवों और असुरों में किया गया। उनके प्रयासों का परिणाम उन्हें मिला और आखिरकार समुद्र से अमृत निकला। अब ये अमृत किसे मिलना चाहिये इस बात को लेकर देवों और असुरों में युद्ध छिड़ गया। जाहिर है देवता ये बिल्कुल नहीं चाहते थे कि ये अमृत दानवों को मिले और इसे पीकर वो हमेशा के लिये अमर हो जाये और वे इसे बांटना भी नहीं चाहते थे, मतलब एक अंतहीन युद्ध तो फिर ऐसे युद्ध का क्या मतलब बनता है, जिसमें कोई विजेता ही न हो। इस प्रकार देवों ने असुरों की शक्ति का प्रयोग किया पर सारी मेहनत का फल देवता अपने लिये ही चाहते थे।

देवराज इन्द्र ने उस अमृत के प्याले को अपने पास ले लिया और भागने लगे। जैसे ही वह पृथ्वी के समीप आये तो उनसे अमृत की कुछ बूंदें छलक गयी और ये बूंदें पृथ्वी के चार अलग-अलग स्थानों हरिद्वार, इलाहाबाद, उज्जैन और नासिक में गिरी और यही कारण है कि कुम्भ मेला इन चार जगहों पर प्रत्येक बारह वर्षों में मनाया जाता है और इस तरह प्रत्येक तीसरे वर्ष किसी अन्य स्थान पर मनाया जाता है। ऐसा कहा जाता है जो भी व्यक्ति इस त्यौहार पर कुम्भ स्नान करता है वह अमरता को प्राप्त करता है।

चलिये वापस कहानी की बात करते है, एक असुर को किसी तरह से अमृत का प्याला मिल गया तो वह बहुत खुश हो गया। हुआ यह था कि विष्णु जी ने एक नारी का रूप धारण कर लिया और अमृत अपने पास ले लिया इसके बाद असुरों से कहा कि वह ये अमृत सभी लोगों में बराबर-बराबर बाट देंगे। उन्होंने देवों और असुरों की दो पंक्तियां बना दी, एक पंक्ति असुरों की और दूसरी देवों की। प्रत्येक पंक्ति में खड़े हुए लोगों को वह अमृत पिलाते जा रहे थे। भगवान विष्णु ने एक ओर तो देवों को अमृत दिया, वहीं दूसरी ओर असुरों को मदिरा दी। असुरों ने मदिरापान कर लिया और उन्हें यह आभास भी नहीं हुआ कि वे ठगे गये है। उनमें से एक असुर ने यह सब देख लिया था तो उसने अपनी पंक्ति बदल दी और वह अमृत पान करने में सफल रहा।

सूर्य और चन्द्र जो कि यह सब देख रहे थे, उन्होंने उस चतुर दानव की बात भगवान विष्णु को बतायी। भगवान विष्णु ने शीघ्र ही उसे मृत्यु दण्ड दिया लेकिन तब तक तो वह अमृत पान कर चुका था पर अमृत पान करने के बाद भी उसे इस बात की बिल्कुल भी खुशी नहीं थी कि अब वह दो स्थानों में एक साथ घूम सकता है। वह अब भी जीवित था और सूर्य और चन्द्र से थोड़ा नाराज था क्योंकि उन्होंने उस घटना को भगवान विष्णु को बता दिया था। अपनी क्रोधाग्नि में वह आज तक लड़ रहा है और जब कभी भी वह सूर्य या चन्द्र को निगलने में सक्षम हो जाता है तो उसका परिणाम हमें सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहण के रूप में देखने को मिल जाता है।

हांलांकि सारे देवताओं ने असुरों पर अपनी जीत दर्ज की और सारे देवता अमर हो गये लेकिन कैसी जीत? झूठ और फरेब का सहारा लेकर जीती हुयी बाज़ी और इस घटना को मैं काल्पनिक ही मानता हूं। वास्तविकता ये है कि धार्मिक लोग ऐसे देवताओं की पूजा करते हैं। उनमें से कुछ धार्मिक इस कुम्भ मेले में इलाहाबाद में इकट्ठा हुए है और आप सभी जानते है क्यों? क्योंकि वह अपने पाप धोना चाहते है और अमर होकर स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त करना चाहते हैं। वैसे अभी तक मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति से नहीं मिला जो अमर हो गया हो बजाय इसके उनका क्या हाल होता है इसके बारे में मैं आगे आने वाले दिनों में लिखूंगा।

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