कल मैंने लोगों की सामूहिक रूप से हत्या करने वाले हत्यारे आन्द्रेस बियरिंग ब्राइविक के बारे में लिखा था, जिसने कुछ समय पहले बड़ी संख्या में नार्वे के लोगों की हत्या कर डाली थी। जैसी कि उम्मीद थी, कल उसने न्यायालय में बिना किसी पश्चाताप या अपराध-बोध के एक बयान दिया। मैंने उसके मेनिफेस्टो के बारे में कुछ लेख पढ़े हैं, जिसमें बताया गया है कि उसमें कई बार भारत का ज़िक्र किया गया है। वह कहता है कि दुनिया भर के मुस्लिम-विरोधी संगठनों को, जिनमें इजराइल के यहूदी, चीन के बौद्ध, भारत के हिन्दू राष्ट्रवादी और यूरोप और अमरीका के ईसाई कट्टरपंथी शामिल हैं, इस्लाम के विरुद्ध एकजुट होकर काम करना चाहिए।
ऐसा लगता है कि वह भारत के हिन्दू राष्ट्रवादियों से बहुत प्रभावित है और बीजेपी और आरएसएस की वेब-साइटों का ज़िक्र भी करता है। उसके संगठन के कुछ सदस्यों पर वहां हिन्दू आतंकवाद फ़ैलाने का आरोप भी लग चुका है और उनमें से कुछ ने अपना अपराध स्वीकार भी किया है और अब न्यायालयों में उनके अपराधों की सुनवाई हो रही है।
कल ही मैंने यह भी कहा था कि ऐसे विचार और रवैये सारी दुनिया में पाए जाते हैं: हर देश में, हर संस्कृति में। भारत में दंगों या धार्मिक कारणों से होने वाली हिंसा के समय हम इन्हें बड़ी स्पष्टता के साथ देखते और महसूस करते हैं। एक लेख में बीजेपी के एक लोकसभा सदस्य, बी पी सिंघल के बयान का यह अंश पढ़कर मैं हैरान रह गया: 'मैं उस शूटर के उद्देश्य का समर्थन करता हूँ लेकिन उसके तरीके का नहीं। अगर आप देश का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तो आपको कुछ न कुछ उग्र, असरकारक और नाटकीय करना ही पड़ता है लेकिन आपको लोगों की हत्याएं नहीं करनी चाहिए।'
'वसुधैव कुटुम्बकं' का मन्त्र जपने वाले इन हिन्दू राष्ट्रवादियों से मैं कहना चाहता हूँ कि आपके पाखण्ड का अब पर्दाफाश हो चुका है। मैं अपनी प्राथमिक कक्षाओं में यह मन्त्र पढ़ चुका हूँ और उसमें ऐसे अतिवादी विचारों के लिए कोई जगह नहीं है।
आप देख सकते हैं, ब्राइविक और इस भारतीय सांसद के विचारों में कोई अंतर नहीं है। ब्राइविक, मानसिक रूप से कुछ ज़्यादा बीमार हो सकता है मगर दोनों का बुनियादी रवैया बिल्कुल एक है और यह रवैया सारे संसार में हर जगह देखने को मिलता है!
ऐसे विचार और ऐसी जघन्य कार्यवाहियां किसी भी धार्मिक समूह में दूसरे समूह के खिलाफ देखने में आती हैं। एक देश में मुसलमान ईसाइयों के विरुद्ध लड़ रहे हैं तो किसी दूसरे देश में हिन्दू मुसलमानों के खिलाफ और कुछ दूसरे देशों में दो धर्मों के लोग आपस में एक-दूसरे की हत्या करते दिखाई देते हैं। वे किस धर्म को मानते हैं या किस धर्म के विरुद्ध लड़ रहे है, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, दोनों में एक साम्यता स्पष्ट दिखाई देती है: दोनों घृणा करते हैं।
दुनिया भर में इस कदर फैली घृणा बेहद डरावनी है लेकिन हकीकत भी यही है। इसी घृणा के चलते न जाने कितने लोग जान से हाथ धो बैठे हैं! न जाने कितने रोज़ मारे जा रहे हैं! किसी धर्म के फैलाव को नहीं, इस घृणा को रोकने की ज़रूरत है। ऐसे घृणित विचार किसी के भी मन में मौजूद हो सकते हैं: पड़ोसी, सहकर्मी, बाज़ार में साथ खड़ा कोई व्यक्ति; किसी के मन में भी!
ऐसे विचारों से उपजी हिंसा को हम कैसे रोक सकते हैं? दुनिया भर के मनश्चिकित्सकों, मस्तिष्क सम्बन्धी अनुसंधानकर्ताओं और वैज्ञानिकों से मैं एक अपील करना चाहता हूँ: मुझे लगता है कि महज घृणा के चलते किसी की हत्या करना एक तरह की बीमारी है। कृपा करके इस बीमारी का कारण ढूंढिए। बहुत से लोग अपना गुस्सा व्यक्त करते हैं मगर सिर्फ कुछ ही होते हैं, जो अपनी जिद में हथियार लेकर दूसरों की हत्या करने निकल पड़ते हैं। उनके मस्तिष्क में क्या चल रहा है? क्या समय रहते आप उनके भीतर पनप रहे इस विचार और इस रवैये को पहचान सकते हैं? क्या कोई विकल्प ढूंढ़ा जा सकता है कि इन विचारों से ग्रसित व्यक्ति हत्या करने की हद तक न पहुंचे?
मेरा विचार है कि यह एक मानसिक बीमारी ज़रूर है मगर इसके पीछे कोई न कोई अन्य बात होती है। ऐसा क्या होता है जो उन्हें दूसरों की हत्या करने के लिए प्रेरित करता है? अगर हम बीमारी के कारण को ढूंढ़ लें तो उसके इलाज की संभावना भी सामने आएगी। इसमें कोई शक नहीं कि कोई भी हत्यारा अपराध करने से पहले पुलिस या किसी डॉक्टर के पास जाकर नहीं बताएगा कि वह इस मानसिक बीमारी से ग्रस्त है। इसलिए सिर्फ इस बीमारी का इलाज ढूंढ़ना ही काफी नहीं है। हमें इस मानसिक समस्या का कारण भी ढूंढ़ना होगा और उसके बाद उसका इलाज। इसका उपाय समाज को बदलने में निहित है। बच्चों का लालन-पालन करने के तरीकों में परिवर्तन लाकर, शिक्षा-व्यवस्था में परिवर्तन लाकर और वयस्कों के आपसी व्यवहार में भी परिवर्तन लाकर। समाज से उस कारक को मिटाकर, जो घृणा का संचार करता है, उसे इतना बढ़ा देता है कि एक व्यक्ति दूसरों की हत्या करने पर आमादा हो जाता है।
अब हम इतना ही कर सकते हैं कि आपसी व्यवहार में हम सहिष्णु बनें और खुद अपने आपसे प्रेम करें। हमें सहिष्णुता और करुणा को अपने जीवन में सक्रियता से लागू करना होगा। अपने बच्चों को प्रेम करना सिखाना होगा और साथ ही इस बात पर नज़र रखना भी कि आपके आसपास के लोग घृणा फैलाने वालों से दूर रहें, वैसे विचारों को पास भी न फटकने दें। इस बात को समझें कि हम एक विश्व हैं और सभी इंसान हैं। याद रखें कि हम सिर्फ जाति, रंग, भाषा, संस्कृति और धर्म अलग होने के कारण भिन्न जीव नहीं हो गए हैं बल्कि सभी इस विशाल मानव समाज के ही हिस्से हैं।
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