क्रूर धर्म किस तरह अपने अनुयायियों को यातना देते हैं – 10 अप्रैल 2013

धर्म

कल मैंने धर्म से उपजी शारीरिक क्रूरता के बारे में लिखा था, जोकि आज भी इस धरती पर व्यापक रूप से पायी जाती है। हालांकि यह सच है और स्पष्ट ही बहुत भयानक भी है, मगर क्रूरता का एक और रूप भी है जो हमारे और भी नजदीक मौजूद है, हमारे घर के आसपास और वह है मानसिक क्रूरता।

शारीरिक हिंसा क्रूरता का सबसे आम तरीका है। जब आप धार्मिक हिंसा के बारे में कुछ कहते हैं तो आप महिलाओं को कोड़े मारने वाले इस्लामिक कट्टरपंथियों की हिंसा के बारे में सोचते हैं क्योंकि उन्हें पथभ्रष्ट माना जाता है। हो सकता है आपको क्रूसेड्स के समय की ईसाइयों की हिंसा की याद आ जाए, जो हर एक को अपने धर्म में दीक्षित करना चाहते थे। या आप हिंदुओं की सती प्रथा के बारे में सोच सकते हैं जिसमें मृत पति के साथ उनकी विधवाओं को ज़िंदा जला दिया जाता था। आपको आतंकवाद, बम धमाके और आत्मघाती हमलों की याद आ सकती है।

यह सब शारीरिक हिंसा है मगर हिंसा का एक और रूप मौजूद है और वह है मानसिक हिंसा। अक्सर यह हिंसा और भी ज़्यादा क्रूर हो सकती है! जब आप अपने विचारों में घृणा और हिंसा से भरे हुए होते हैं तो आप किसी को शारीरिक हमले से भी ज़्यादा बुरी तरह ज़ख़्मी कर सकते हैं। अल्पसंख्यकों के विरुद्ध एक बार जब यह मानसिक हिंसा संस्कृति में समाकर वहाँ सूक्ष्म अवस्था में मगर मजबूती के साथ पैर जमाए बैठ जाती है तब वह बेहद खतरनाक हो सकती है।

अगर आप अब भी नहीं समझे कि मैं किस हिंसा की बात कर रहा हूँ तो मुझे कुछ उदाहरणों की सहायता से अपनी बात रखनी होगी। जैसे हमारा देश भारत, इतने अर्से बाद भी जाति प्रथा को समाप्त नहीं कर पाया है। इस प्रथा की जड़ें धर्म में हैं और धर्म के कारण आज भी बहुत से लोग हैं जिन्हें अछूत समझा जा रहा है। क्या किसी इंसान से यह कहना कि तुम मेरा हाथ मत छुओ क्योंकि तुमने एक अछूत परिवार में जन्म लिया है, एक भयानक बात नहीं है? उस व्यक्ति को कैसा लगेगा जब उसे पता चलेगा कि जैसे ही उसने आपको छुआ आपने अपने आपको शुद्ध करने के लिए नहाने का निर्णय ले लिया है?

मुस्लिम औरतों के बारे में सोचें जिन्हें अपने आपको बुर्के में छिपाना पड़ता है, अपना सिर, अपने बाल, अपना चेहरा और अपना पूरा शरीर! कुछ लोग कह सकते हैं कि यह उनका अपना चुनाव है, अपना निर्णय है, वे बुर्के में अपने आपको सुरक्षित महसूस करती हैं, उन्हें यही उचित लगता है; मगर उनका क्या जिन्हें यह अच्छा नहीं लगता फिर भी मजबूरन पहनना पड़ता है? क्या यह मानसिक यातना नहीं है कि आप किसी औरत से कहें कि वह एक निम्न कोटि की प्राणी है जो अपना चेहरा दिखाकर मर्दों को रिझाने की कोशिश करती है। जब कोई मुस्लिम औरत बलात्कार का शिकार होती है, इस्लाम का नियम यह कहता है कि उसे चार गवाह प्रस्तुत करने होंगे अन्यथा फैसला उसके विरुद्ध सुनाया जाएगा। कल्पना कीजिए, बलात्कार की शारीरिक प्रताड़ना के बाद उसे मानसिक रूप से ध्वस्त करने का पूरा इंतज़ाम है।

इसाइयत भी कोई कम क्रूर नहीं है! आज भी बहुत से ईसाई हैं जो यह समझते हैं कि समलैंगिकता एक बीमारी है या उससे बढ़कर एक पाप कर्म है! किसी समलैंगिक पुरुष या महिला से पूछिए; वे बताएंगे कि उनके पास कोई चारा नहीं है, विपरीत लिंगी व्यक्ति की ओर उन्हें यौन आकर्षण हो ही नहीं पाता। इसके बावजूद लोग उनके साथ अपराधी का सा व्यवहार करते हैं, उन्हें घृणास्पद मानते हैं और अपने बच्चों को भी उनके बारे में यही बताते हैं! वे यह घृणा उन समलैंगिक जोड़ों द्वारा गोद लिए बच्चों के सामने भी व्यक्त करते हैं जिससे वे भी अपने माँ-बाप के प्रति घृणा महसूस करें। इससे ज़्यादा क्रूर बात क्या होगी कि आप छोटे-छोटे बच्चों को यह बताएं कि तुम्हारा लालन-पालन करने वाले माँ-बाप पापी हैं?

यह सब आपके घर के सामने हो रहा है! अब आप इन्हें यह कहकर अनदेखा नहीं कर सकते कि ये सब सुदूर दुनिया की सचाइयाँ हैं। यह सब आपके आसपास हो रहा है, आपके चारों तरफ और मैं आपको सिर्फ उनसे आगाह करना चाहता हूँ! मैं चाहता हूँ कि आप देखें कि कैसे दुनिया मैं फैल रही आपसी घृणा, डर और हिंसा समाज पर धर्म के बुरे असर का परिणाम है।

कोई धर्म नहीं है जो हिंसक नहीं रहा है, अगर शारीरिक स्तर पर नहीं तो मानसिक स्तर पर है। औरतों के विरुद्ध पक्षपात और भेदभाव बौद्ध धर्म में भी मौजूद है और इस तरह वह भी किसी न किसी तरह की हिंसा से अछूता नहीं है।

मैं नहीं कहता कि आप अपना धर्म छोड़ दें। मैं नहीं कहता कि आप अपने विश्वास को तिलांजलि दे दें। मैं आपसे सिर्फ यह अपेक्षा करता हूँ कि आप सोचें कि आप क्या करना पसंद करेंगे-हिंसा और क्रूरता का पक्ष लेना या परंपरा के चक्र को तोड़ने की पहल करना और प्रेम का प्रसार करना? अब यह आप पर निर्भर है कि आप अपने हित में इस प्रश्न का क्या जवाब देते हैं!

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