व्यावसायिक हितों के चक्कर में मुमकिन हुआ धर्म-परिवर्तन कर हिन्दु बनना – 31 जनवरी 13

धर्म

कल मैंने कुंभ मेले में मौजूद पश्चिम के गुरुओं के ऊपर लिखा था और बताया था कि यह कितना अजीब है कि वैसे लोग जिनका कई हिंदु मंदिरों में कोई मोल नहीं होगा, को कई ऊंचे हिंदु पद मिल सकते हैं। मैंने बताया था कि ऐसे पद खरीदे जा सकते हैं और इसलिए धर्म की रग-रग में ख़रीद-फ़रोख़्त भरा हुआ है। हिन्दुओं ने हिन्दुत्व के मूल सिद्धांत को ही बेच दिया है कि इस धर्म में परिवर्तित होकर आना मुमकिन ही नहीं है। आइए परिवर्तन के इस प्रश्न को एक दूसरे नज़रिए से देखते हैं और तब शायद आप यह समझ पाएंगे कि मैं इसे पैसों का कारोबार क्यों बताता हूं।

अगर आप पीछे उस समय में जाएं, जब हिन्दु धर्मग्रंथ लिखे गए थे, आप यह कारण समझ पाएंगे कि क्यूं उन ग्रंथों के रचयिताओं ने हिन्दुत्व में परिवर्तन की किसी भी संभावनाओं को नकार दिया था। उनकी मानसिकता और जीवनशैली को समझिए। उन्होंने जान-बूझकर परिवर्तन को नकार दिया क्योंकि उनके पास “विशुद्ध रक्त” की अवधारणा थी। ये वही लोग हैं जिन्होंने जाति-व्यवस्था को जन्म दिया और इस नाम पर लोगों को एक-दूसरे से अलग किया, दो जातियों के बीच विवाह न हो, ताकि दो कोटि (शुद्ध और अशुद्ध ) के रक्त मिश्रित न हो सके क्यूंकि उनकी नज़र में ऐसा होना सही नहीं था। स्पष्ट रूप से वे अहिंदु रक्त को विशुद्ध हिंदु परिवारों से मिश्रित होता हुआ नहीं देखना चाहते थे- और यही वजह है कि उन्होंने ऐसा कोई विकल्प दिया ही नहीं जिसके माध्यम से आप परिवर्तित होकर हिंदुत्व के मार्ग पर आ सकें। उन्होंने यहां तक लिखा कि हिंदु होने का एक ही मार्ग है कि आपके माता-पिता हिन्दु हों।

जैसे-जैसे समय बीता, ऐसे लोग आए जो बेशक “विशुद्ध रक्त” से पनपे इन रुढ़िवादी नियमों को बदलना चाहते थे। उदाहरण के लिए आर्य समाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती ने कई ग़लत प्रथाओं को सुधारा और अधिक उदार हुए। उन्होंने पिछड़ी जाति के लोगों के लिए दरवाज़ा खोला, यहां तक कि उन्हें धर्म-ग्रंथों के अध्ययन तक का अधिकार दिलाया जिसे पढ़ने की अनुमति उन्हें तब तक नहीं मिली हुई थी। आर्य-समाज ने अंतर्जातीय विवाहों को भी मान्य किया – लेकिन इसके जरिए एक और पंथ गढ़ा गया जो हिन्दुत्व पर आधारित था।

उससे पहले, बुद्ध थे, जिन्होंने धर्म के कारण होने वाली कई बुरी चीज़ों का विरोध किया। उन्होंने वेद की बहुत सी सीखों को पूरी तरह नकार दिया और इसके कारण हिन्दुओं ने उन्हें अपनी बिरादरी से बाहर कर दिया। नतीजा: एक और धर्म।

वास्तव में, हिन्दुत्व बहुत लचीला है। मैंने एक बार इस बारे में भी लिखा था कि इसका लचीलापन किस तरह हिन्दुत्व की सबसे बड़ी कमी है। इसमें कई तरह के पंथ हैं क्योंकि लोगों ने धर्म-ग्रंथों में लिखी बातों का मतलब अपने हिसाब से निकाला, शायद वो बातें बिल्कुल स्पष्ट नहीं थीं या लोगों ने अपनी सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए इसका अर्थ निकाला! और यहीं पर व्यावसायिक हितों को साधना धर्म के मूल सिद्धांतों का अनुसरण करने से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

ऐसे भारतीय गुरुओं की भरमार है जो अनुयायियों की खोज में पश्चिम गए थे। वे वहां जाकर हिन्दुत्व के ऊपर प्रवचन सुनाते और सुननेवालों को अपना भक्त बनाते। यहीं से इस धर्म में विदेशियों और अहिंदुओं का पदार्पण हुआ। उन्होंने उन लोगों को हिन्दु बना दिया – यह इस व्यापार के लिए फ़ायदेमंद था! इन भारतीय गुरुओं को संभवतः अच्छी तरह पता था कि भले ही तकनीकी रूप से परिवर्तन के माध्यम से हिंदु बनाना असंभव हो लेकिन विदेशों में, जहां प्रतिस्पर्धा कम थी और जो एक नया बाज़ार था, अपने धार्मिक व्यवसाय को स्थापित करना ज़रूरी था, तो उन्होंने उस बिंदु की अनदेखी कर दी। वे अपनी दुकान समेटकर पश्चिम में ले गए और वहां के मुल्कों में हिन्दु फ़्रेंचाइज़ी आउटलेट खोल लिए।

यह मायने नहीं रखता कि वे इस्कॉन के श्रद्धालु हैं, दूसरे गुरुओं के भक्त हैं या भिन्न हिन्दु पंथों के सदस्य हैं, उन सबने हिन्दु होने का स्वांग रचना शुरू कर दिया, हिन्दु की तरह आचरण करने और वैसे ही वस्त्र पहनने लगे। उनमें से कुछ तो ख़ुद ही गुरू बन गए और हरिद्वार, ऋषिकेश, दक्षिण भारत समेत दुनिया के विभिन्न देशों में भी अपने आश्रम बना लिए।

कई लोगों ने इसका विरोध भी शुरू किया, कि ये भारतीय गुरू ग़लत कर रहे हैं, कि विदेशियों का तो मंदिरों में प्रवेश तक वर्जित है लेकिन अब वे ख़ुद को हिंदु बता रहे हैं। यह कह भर देना कि आप हिंदु हैं और हिन्दुओं जैस वस्त्र धारण कर लेने भर से ये लोग आपको हिंदु नहीं मान लेंगे।

हालांकि भारत में मौजूद आरएसएस जैसे आधुनिक हिन्दु संगठनों ने, जो हिन्दुत्व का प्रचार-प्रसार करते हैं और वो जिन भी चीज़ों में भरोसा करते हैं, स्वतः ही हिन्दुत्व से जुड़ जाती हैं, लोगों का धर्म परिवर्तन कर उन्हें हिन्दु बनाने की प्रक्रिया शुरू की। वो वहां जाते हैं जहां जाकर ईसाई धर्म-प्रचारकों ने पिछड़े लोगों को भोजन और रोज़गार के वादे पर ईसाई बनाया था, और उन्हें इसाइयों से ज़्यादा लालच देकर दुबारा हिंदु बना लेते हैं। हालांकि हम यह जानते ही हैं कि इसके पीछे उनकी राजनीतिक मंशा निहित होती है और वे सब हिन्दु दक्षिणपंथी कार्यकर्ता हैं। वो दावा करेंगे कि उनका राजनीति से कोई सरोकार नहीं लेकिन धर्म को अपना ध्येय साधने के लिए इस्तेमाल करेंगे।

कुछ लोगों ने मुझसे पूछा: अगर मैं धर्म के रूढ़िवादी नियमों और इसकी संकीर्णता के खिलाफ़ हूं, तो मैं उन लोगों का समर्थन क्यूं करता हूं जो अहिंदुओं द्वारा धर्म-परिवर्तन करवाकर हिंदु बनाए जाने के खिलाफ़ हैं? मैं खुलेपन का समर्थन क्यूं नहीं करता और हिन्दुओं को ये क्यूं नहीं कहता कि उन्हें विदेशियों को भी स्वीकार करना चाहिए? जवाब बेहद सरल है: मैं तो धर्म की अवधारणा में ही यक़ीन नहीं करता। मैं हिन्दुत्व की वकालत नहीं कर रहा, न ही किसी और धर्म का समर्थन कर रहा हूं। अगर आप मुझसे पूछेंगे तो मैं आपको किसी भी धर्म का हिस्सा बनने की सलाह नहीं दूंगा। लेकिन इसके बावजूद भी अगर आप ऐसा करने को लेकर दृढ़प्रतिज्ञ हैं, तो कम से कम अपनी सुविधा के अनुसार नहीं बल्कि धर्म के मूल नियमों के साथ उसका अनुसरण कीजिए। अगर आप हिन्दुत्व में भरोसा करते हैं तो आपको यह देखना चाहिए कि किस तरह धर्म-परिवर्तन की अवधारणा हिन्दुत्व के मूल सिद्धांतों के खिलाफ़ है। बेशक आप हिन्दुत्व के सबसे उदार पंथों में से कोई एक पंथ चुन सकते हैं, लेकिन तब आप उस पंथ विशेष के सदस्य होंगे, और ऐसे में आपको हिंदु नहीं बल्कि सीधे तौर पर उस पंथ का अनुगामी माना जाएगा।

अगर आप हिन्दुत्व के मूल रूप में भरोसा करते हैं तो आप इसे अपना धर्म बदल कर हासिल ही नहीं कर सकते। या तो आप जन्म से हिंदु हैं या फिर हिंदु नहीं हैं। अगर आप किसी गुरू अथवा पंथ का अनुसरण करते हैं तो आप बस एक हिन्दु-आधारित धड़े के सदस्य मात्र हैं। हालांकि मैं तो यही कहूंगा कि हम सब बस एक अच्छा इंसान बन जाएं, न कि इन धार्मिक नेताओं को मौक़ा दें, गुणा-गणित बैठाकर, अपना उल्लू सीधा करने का।

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