धार्मिक भावनाएँ बड़ी नाज़ुक होती हैं और इन दिनों बड़ी आसानी से आहत हो जाती हैं। लोग इस बात का तक खयाल रखने लगे हैं कि किसी दूसरे धर्म को मानने वाला बुरा न मान जाए इसलिए सिर्फ ईसाइयों को ही ‘मैरी क्रिसमस’ कहा जाए। लोग कह देते हैं कि इससे उनकी धार्मिक भावनाएँ आहत होती हैं। लेकिन आपका क्या कहना है जब धर्म किसी की भावनाओं को आहत करता है? जब धार्मिक मान्यताएं, रीति-रिवाज और अन्धविश्वास दूसरों के दिलों को चोट पहुंचाते हैं? क्या उन विश्वासों का कोई औचित्य है? क्या वह धर्म ठीक है? मैं खुद ऐसे ही एक कटु अनुभव से गुज़र चुका हूँ: उसके पीछे हिंदुओं का यह विश्वास है कि किसी घर में किसी की मृत्यु होने के बाद वह घर अपवित्र हो जाता है और तेरह दिन तक अपवित्र ही रहता है; मृत्यु के तेरहवें दिन धर्म द्वारा निर्धारित कुछ कर्मकांड उस घर में न करवा लिए जाएँ तब तक घर के लोग अछूत माने जाते हैं।
ये लोगों के बहुत आम रीति-रिवाज और विश्वास हैं और हमारी माताजी के देहांत के बाद दो सप्ताह तक इनका कटु अनुभव हम उठाते रहे। यह स्वाभाविक है कि कुछ लोग धार्मिक परम्पराओं का निर्वाह कुछ दूसरे लोगों के मुक़ाबले अधिक कट्टरता के साथ करें और इस तरह कुछ लोग तेरह दिन की जगह तीन दिन तो कुछ दूसरे दस दिन के अंतराल को वह समय मानते हैं जब वह घर और उसमें रहने वाले लोग अपवित्र अवस्था में होते हैं।
हो सकता है आपको यह समझने में दिक्कत आए इसलिए मैं कुछ उदाहरण देकर अपनी बात समझाता हूँ। उस अंतराल में उस घर में कोई बाहर का व्यक्ति प्रवेश नहीं करता। अगर कोई किसी काम से या किसी मेहमान को लेकर या यूं ही शोक प्रदर्शन के लिए उस घर में आता है, तो वापस अपने घर में प्रवेश करने से पहले उसे सारे कपड़े उतारने पड़ते हैं, नहाकर पवित्र होना पड़ता है जिससे उसका घर अपवित्र होने से बच जाए। अगर दूसरे आपके घर आएं तो वे आपके घर में पानी तक नहीं पीएंगे, भोजन करने की तो बात ही छोड़ दीजिए। आप अपने यहाँ आए आगंतुक के लिए पानी लेकर न आएँ, क्योंकि वे पीएंगे ही नहीं।
जैसे समय के अंतराल में मतभेद है उसी प्रकार कुछ लोग ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि कुछ दिन ऐसे होते हैं जब आप उस अपवित्र घर में प्रवेश कर सकते हैं और कुछ दिन नहीं कर सकते। अम्माजी के देहांत के बाद मेरा एक मित्र, दूसरों की तरह, शुक्रवार के दिन घर आया और कहने लगा कि उसे अम्माजी के देहावसान के बारे में सोमवार को यानी दाहसंस्कार वाले दिन ही पता चल चुका था। गप्पबाजी के लहजे में उसने कहा: "देखो, मंगलवार को तो ऐसी जगहों में जाते ही नहीं हैं; बुधवार को मैं आना चाहता था मगर व्यस्त था; गुरुवार को भी अपवित्र जगहों में नहीं जाया जाता; इसलिए मैं आज ही आ गया क्योंकि फिर कल शनिवार है, इस दिन ऐसी जगहों में जाना तो, आप जानते हैं, बहुत ही बुरा माना गया है!"
आप देख सकते हैं कि धर्म क्या करता है! उस समय जब आप शिद्दत के साथ महसूस करते हैं कि आपके मित्र आपके साथ हों, उस वक़्त जब आपके दुख की कोई सीमा न हो, आपके मित्र आपके यहाँ नहीं आएंगे क्योंकि धार्मिक विश्वास उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं। वे पड़ोस में ही क्यों न रह रहे हों वे नहीं आएंगे! एक मित्र मेरे दरवाजे तक तो आया मगर भीतर नहीं! यह नहीं कि मेरे प्रति उनका प्रेम कम हो गया है- सिर्फ धार्मिक रूढ़ियाँ और अंधविश्वास ही इसके जिम्मेदार हैं! वे दरवाजे तक आते हैं, भीतर आना चाहते हैं मगर धार्मिक विश्वास उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं। वे अन्दर तभी आएंगे जब हम उनकी नज़रों में पुनः पवित्र हो जाएंगे।
इसका दूसरा पहलू यह है: आम तौर पर कुछ धार्मिक संस्कार करने के बाद ही पवित्र हुआ जा सकता है। मगर हम लोग ऐसे किसी भी कर्मकांड में विश्वास नहीं रखते और और अम्माजी के देहावसान के बाद कोई धार्मिक संस्कार नहीं किया। क्या इसका मतलब यह हुआ कि हम सदा-सदा के लिए अपवित्र ही बने रहेंगे? बाद में तो मित्रों को आना ही होगा और तब वे कैसे अपने आने को जायज़ ठहरा सकेंगे? हमने पवित्र होने के लिए कुछ नहीं किया है इसलिए आपके लिए आज भी हम अपवित्र ही हैं।
यहाँ अस्पृश्यता से मेरी भावनाओं को ठेस नहीं पहुँचती, मुझे अपने मित्रों से भी कोई शिकायत नहीं है-धार्मिक विश्वास हैं जो मुझे दुखी करते हैं, अंधविश्वासों से मुझे तकलीफ होती है! क्योंकि मेरे मित्र परम्पराओं और रीति-रिवाजों के गुलाम हैं, वे स्वयं अपने निर्णय लेने में असमर्थ हैं।
खैर, मैंने अपने इस दर्द का दोष इन रिवाजों पर, धर्म पर और अंधविश्वासों पर मढ़ दिया है और उन सभी दोस्तों के लिए मेरे दिल में निश्छल प्रेम के झरने को वैसे ही बहने देने का निश्चय किया है।
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