"मैं ईश्वर की इच्छा से गरीब हूँ और इस बारे में कुछ नहीं किया जा सकता" – धर्म का बुरा प्रभाव – 26 मार्च 2015

धर्म

मैंने परसों के अपने ब्लॉग में बताया था कि भारतीयों के लिए अपने जीवन में और सामान्य रूप से जीवन के नैसर्गिक बदलावों को स्वीकार करना पश्चिमी लोगों के मुक़ाबले आसान होता है। दुर्भाग्य से इसके असरात सिर्फ सकारात्मक ही नहीं होते और आज के अपने ब्लॉग में मैं इसी विषय पर अपने विचार लिखना चाहता हूँ।

क्या हो अगर आप जीवन को जस का तस स्वीकार तो करें मगर उसमें मौजूद बुरी बातों को लेकर परेशान भी न हों? क्या आप कल्पना नहीं कर सकते कि अगर ऐसा हो जाए तो वह आपके जीवन में कितनी नकारात्मकता पैदा कर सकता है? सामान्य रूप से मैं मानने के लिए तैयार हूँ कि यह सकारात्मक नज़र आता है-बशर्ते वह आपके अंदर निष्क्रियता न पैदा करे और इतना असमर्थ न बना दे कि आप जीवन में कोई बदलाव न ला सकें। हमारे स्कूल के बच्चों के अभिभावकों के साथ दैनिक जीवन में हुए अनुभव यहाँ प्रस्तुत हैं: जब गरीब लोग अपनी बुरी हालत को जस का तस स्वीकार कर लेते हैं और उनसे बाहर निकलने की कोशिश तक नहीं करते।

जी हाँ, हमने बहुत से गरीब परिवारों के साथ बातचीत की है, बहुत से पुरुष और महिलाएँ, जो बहुत गरीबी में किसी तरह ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं। बहुत से लोग काम तो करते हैं लेकिन उन्हें इतनी कम मज़दूरी मिल पाती है कि बड़ी मुश्किल से अपना और अपने बच्चों के पेट भर पाते हैं। फिर भी जब आप उनके घर जाते हैं और उनके पास काम नहीं होता तो वे सिर्फ यूँ ही घर में पड़े-पड़े समय गुज़ार देते हैं। वे बताते हैं कि वे पुजारी हैं या रिक्शा चलाते हैं और कभी काम मिल जाता है तो कभी-कभी काम नहीं भी मिल पाता। कहीं-कहीं उनका कोई बड़ा लड़का या लड़की कोई काम करके पैसे कमा लेते हैं और इस तरह परिवार का गुज़र-बसर हो ही जाता है। फिर और अतिरिक्त प्रयास करने की ज़रूरत क्या है?

वे कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करते। अपनी वर्तमान परिस्थिति से निकलने और ऊपर उठने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास करने का, थोड़ी अधिक मेहनत करने का उनके अंदर कोई उत्साह ही नज़र नहीं आता!

यही वास्तविकता है- अगर हमारे लिए ईश्वर यही चाहता है, अगर यही उस सर्वशक्तिमान की इच्छा है…हम उनके मुख से ऐसे वाक्य अक्सर सुनते हैं और एक नास्तिक के रूप में यह बात मुझे उद्वेलित करती है, मैं अविश्वास से भर उठता हूँ! वास्तव में मैं समझ नहीं पाता कि आप कैसे नहीं देख पाते कि आप भी खुशहाल हो सकते हैं, आपके पास भी पर्याप्त खाने-पीने के लिए हो सकता है और कैसे आप सोच सकते हैं कि कोई कंजूस, सर्वशक्तिमान अधम यह निर्णय करे कि आप जीवन में सफल नहीं हो सकते! और यह धर्म के कारण पैदा हुई मानसिकता है!

हिन्दू धर्म ऐसी शिक्षाओं से भरा पड़ा है, जो लोगों से अपनी नियति स्वीकार करने के लिए कहती हैं, कि वे संघर्ष न करें, कि वैसे भी होनी-अनहोनी पहले से ही लिख दी गई है। यही कारण है कि अपने शराबी पतियों से रोज़ मार खाने वाली महिलाएँ भी तलाक के बारे में सोच भी नहीं पातीं: कि मेरे जीवन में यही लिखा है, ईश्वर यही चाहता है, यही मेरी नियति है।

इसलिए स्वाभाविक ही, परिवर्तन को स्वीकार करने का माद्दा रखना एक अच्छी बात है और यह खुशी की बात है कि भारतीय संस्कृति में यह बड़े पैमाने पर मौजूद है क्योंकि इसकी भारतीयों को आवश्यकता भी है। लेकिन उन्हें चाहिए कि वे पश्चिमी लोगों से परिश्रम और अनुशासन सीखें और अपनी दुखदाई परिस्थितियों से बाहर निकलने और जीवन को बेहतर बनाने की कोशिश करें!

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