क्या बुर्का न पहनकर महिलाएं पुरुषों को बलात्कार करने का आमंत्रण देती हैं? 5 फरवरी 2014

धर्म

पिछले तीन सप्ताह से मैं यौन उत्पीड़न और बलात्कार के संबंध में ब्लॉग लिख रहा हूँ। इनमें मेरा फोकस मुख्य रूप से भारत पर रहा है मगर कुछ सामान्य बातें भी इनमें आ गई हैं। हालांकि वस्त्र कभी भी बलात्कार का कारण नहीं रहे हैं, इस बारे में मैं पहले भी एक ब्लॉग में लिख चुका हूँ फिर भी आश्चर्य होता है कि बहुत से लोग अब भी लिख रहे हैं कि महिलाओं के अंगप्रदर्शक पहनावे के कारण पुरुषों के लिए अपने आपको काबू में रखना मुश्किल हो जाता है। इसी तर्क को आधार बनाकर मैं आपके सामने आज एक ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करने जा रहा हूँ, जिससे पता चलता है कि प्रचलित धारणा के विपरीत बुर्के में पूरी तरह ढँकी-छिपी महिलाएँ भी बलात्कार से बच नहीं पातीं!

जी हाँ, यह एक तथ्य है। इस्लाम ने इस मूर्खतापूर्ण विचार का अनुगमन किया कि बलात्कार होने पर वह पीड़िता का दोष माना जाएगा और उन्होंने औरतों के लिए बुर्का पहनने का यह भयंकर नियम लागू कर दिया। मुस्लिम महिलाओं को, उनके परिवार की धार्मिक कट्टरता के अनुपात में, अपने शरीर के अधिकांश या किसी भी अंग को खुला रखने की इजाज़त नहीं है। उनके विचार में महिलाओं के बाल, उनके सामान्य कपड़े, उनके हाथ, यहाँ तक कि उनका चेहरा और आँखें भी किसी पुरुष को इतना उत्तेजित करने के लिए काफी हैं कि वह उन पर बलात्कार करने के लिए उद्यत हो जाए। यह पर्दा-नुमा, आकृतिहीन परिधान उनकी सुरक्षा की गारंटी की तरह पेश किया जाता है।

जब हम पिछले दिनों लखनऊ, जहां मुसलमानों की तादाद तुलनात्मक रूप से कुछ ज़्यादा है, गए थे तब वहाँ मैंने लगभग दस साल की एक लड़की को बुर्का पहने देखा। मुझे वह बड़ा अमानवीय लगा, जैसे उस मासूम बच्ची को जेल में डाल दिया गया हो। मेरी नज़र में यह एक बीमार समाज द्वारा की जाने वाली कार्यवाही है। बुर्के के पीछे का मूल विचार यह है कि पुरुष किसी महिला को देखकर अपनी यौनेच्छाओं पर काबू नहीं रख सकते, भले ही वह महिला एक दस साल की अबोध बच्ची ही क्यों न हो। क्या पुरुष वास्तव में अपने आपको काबू में रखने में इतने असमर्थ होते हैं? मुझे यह सोचकर बड़ा दुख होता है हालांकि वह बच्ची ऐसा महसूस नहीं करती होगी और न ही उसकी माँ या बहन। मैं जानता हूँ कि उसका समाज अपने दैनिक जीवन में इतनी गहराई से नहीं सोचेगा लेकिन मेरे लिए यह बहुत कठोर बात है और यह मुझे आम तौर पर सभी धर्मों पर और विशेषकर इस मज़हब पर सवाल उठाने के लिए मजबूर करता है।

मेरी नज़र में यह पूरी तरह तर्क-हीन बात है कि पहले तो महिला से बुर्का पहनने के लिए कहा जाए कि यह उन्हें पुरुषों से सुरक्षित रखेगा और अगर बलात्कार हो ही जाए तो दोष भी उन्हीं पर मढ़ा जाएगा। कुछ लोग तर्क करेंगे कि मुस्लिम समाज में और मुस्लिम देशों में बलात्कार की घटनाएं बहुत कम देखने में आती हैं। ऐसे देशों में, जहां इस्लाम के शरिया कानून लागू हैं, बलात्कार से पीड़ित महिला को आज भी चार पुरुषों कि गवाही का इंतज़ाम करना पड़ता है, जो पुष्टि करते हैं कि उसके साथ बलात्कार होता हुआ उन्होंने अपनी आँखों से देखा है, जैसे कि खुद पर हुए बलात्कार की दोषी वही हो! इसलिए आखिर अपने ऊपर हुए बलात्कार की रिपोर्ट वह करे ही क्यों? परिवार के पुरुष और महिलाएं सभी बलात्कार को छिपाना चाहते हैं-शर्म, कलंक और यहाँ तक कि बलात्कार के परिणामस्वरूप दी जाने वाली संभावित सज़ा का डर उन्हें सताता है। जी हाँ, इतनी बुरी तरह प्रताड़ित महिला अगर चार पुरुष गवाहों को हाजिर करने में असमर्थ रहती है तो प्रकरण खारिज हो जाता है और फिर दोष उसी पर मढ़ दिया जाता है।

जी नहीं, आपके कपड़े आप पर होने वाले बलात्कार का कारण नहीं हो सकते और किसी महिला को सर से पाँव तक एक काले लबादे में ढँक देना भी उसे बलात्कार से सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकता, बल्कि उसकी संभावना बढ़ जाती है।

जी हाँ, मैं जानता हूँ कि बहुत सी मुस्लिम महिलाएं कहती हैं कि बुर्के में वे अपने आपको सुरक्षित महसूस करती हैं। प्रश्न यह है कि बुर्के के बगैर वे असुरक्षित क्यों महसूस करती हैं। कारण स्पष्ट है: क्योंकि यह आपका दोष है, उन बीमार-दिमाग धार्मिक लोगों का दोष जो खुले आम कहते हैं कि एक नाबालिग, छह साल की बच्ची को देखकर भी वे अपनी यौनेच्छा पर काबू नहीं रख पाते!

अगर आप चाहें तो मुझे धार्मिक रूढ़ियों के प्रति असहिष्णु कह लें लेकिन जब तक ऐसी स्थिति है मैं अपनी इस बात पर अडिग रहूँगा: अगर कोई धर्म औरतों से कहता है कि यौन दुराचार और बलात्कार से बचने के लिए वह अपने आपको ढँककर रखे तो यह गलत बात है और हमेशा गलत ही रहेगी और ऐसा धर्म भी मेरी नज़र में हमेशा गलत ही रहेगा।

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