क्या वास्तव में हमें धर्म की ज़रुरत थी अथवा है? 17 फरवरी 2012

धर्म

कल मैंने ज़िक्र किया था कि कुछ मित्रों के साथ मेरी ऑनलाइन चर्चा हो रही थी कि दुनिया की भलाई के लिए संगठित धर्मों ने क्या योगदान दिया है। कल के ब्लॉग में मैंने उसके नकारात्मक प्रभावों का वर्णन किया था और आज मैं चाहता हूँ कि अपने मित्रों द्वारा सुझाए गए धर्म के सकारात्मक प्रभावों का ज़िक्र करते हुए बताऊँ कि मैं उनके बारे में क्या सोचता हूँ।

कुछ लोग कहते हैं कि धर्म लोगों को नैतिकता की शिक्षा देता है और उन्हें आदेश देता है कि वे, उदहारण के लिए, चोरी न करें, सदा सच बोलें और प्राणिमात्र से प्रेम करें। लेकिन मेरे विचार से ऐसी नैतिक शिक्षाओं का धर्म से कोई सम्बन्ध नहीं है। ये बातें तो हर माता-पिता अपने बच्चों को सिखाते हैं, वे धार्मिक हों या न हों, वे आस्तिक हों या नास्तिक। आपको किसी की हत्या नहीं करनी चाहिए यह विचार धर्म का दिया हुआ नहीं है!

दूसरा तर्क यह था कि धर्म ने मानव मात्र और उनकी भाषाओँ के विकास में मदद की और समाज को एक ढांचा, एक व्यवस्था प्रदान की। उन्होंने कहा कि आज जो भी साहित्य, स्थापत्य, कलाएं और संगीत आदि हम देखते हैं, वे सब धर्म की देन हैं-किसी न किसी तरह से वे सभी धर्म द्वारा प्रेरित हैं, धार्मिक लोगों के आदेश से रचित या धार्मिक अनुष्ठानों में उपयोग में लाई जाने वाली चीजें हैं।

क्या आप वास्तव में इस बात पर विश्वास करते हैं कि मानव मात्र का विकास, भाषाएँ, साहित्य, स्थापत्य-कला, संगीत और दूसरी कलाएं धर्म के बगैर पैदा ही नहीं होतीं? क्या आप सोचते हैं कि धर्म नहीं होता तो हम आज भी पाषाण-युग में रह रहे होते? मैं नहीं समझता कि ऐसा होता। मेरा विश्वास है कि यह सब अलग रास्ते से होता। कलाकार धर्मग्रंथों के स्थान पर किन्हीं दूसरी बातों से प्रेरित होते, वास्तुकार चर्च की जगह कुछ दूसरे कारणों से इमारतों का निर्माण करते और लोग तब भी महाकाव्यों की रचना करते- ईश्वर के बारे में नहीं, कुछ दूसरे विषयों के बारे में- और उनका आनंद उठाते।

कृपया मुझे गलत न समझें, बहुत से धार्मिक लोगों के लिए मेरे मन में बड़ा आदर है: चाहे वे कलाकार हों, लेखक या समाजसेवक या परोपकार करने वाले लोग हों। सिर्फ इसलिए कि वे लोग धार्मिक हैं, मैं उनकी उपलब्धियों की ओर से आँखें नहीं फेर सकता। दुनिया की महानतम इमारतें धर्मों से सम्बंधित हैं मगर मैं उनमें मौजूद आश्चर्यजनक स्थापत्य को देखने से नहीं चूकता। अपने व्यक्तिगत उदाहरण से स्पष्ट करना चाहूँगा कि मैं अपने दादाजी का साहित्य पसंद करता हूँ। वे एक बहुत धार्मिक व्यक्ति थे और मैं नहीं हूँ मगर उनका साहित्य मेरी शिक्षा की बुनियाद बन गया और आज भी मैं उनके साहित्य का रसास्वादन करता रहता हूँ! मैं धर्म के परे जाकर उन महान कलाकारों को देखता हूँ और विश्वास करता हूँ कि उनकी प्रतिभा और उनका काम महज धर्म के कारण संभव नहीं हुआ है।

मुझे लगता है कि मैं धर्म-विरोधी हूँ क्योंकि मैं देखता हूँ कि कैसे धार्मिक नियम लोगों को गूढ़-गंभीर सवालों से दूर रखते हैं और उन बातों का अनुसरण करने के लिए मजबूर करते हैं, जो उनके धर्मग्रंथों और पवित्र किताबों में लिखी हुई हैं या उनके धर्मगुरु उन्हें बताते हैं। मुझे लगता है कि इस तरह का छल-छद्म अनुचित है। जब मैं धर्म पर आस्था रखता था तब मैं हिन्दू धर्मग्रंथों में लिखी बहुत सी बातों पर विश्वास करता था। मैं विश्वास करता था कि कुछ कर्मकांड पर्यावरण और आपके भविष्य के लिए लाभप्रद हो सकते हैं। मैं इन्हीं विश्वासों के साथ बड़ा हुआ और धर्म से पीछा छुड़ाने के बाद ही समझ पाया कि वे सब के सब गलत हैं। मैं सोचता हूँ कि इस तरह धर्म मेरे साथ छल किया करता था और मैं नहीं चाहता कि मेरे बच्चों के साथ भी ऐसा ही हो।

जब मैं धर्म की बात करता हूँ तो किसी व्यक्ति में मौजूद प्रेम, श्रद्धा और आध्यात्मिकता के अर्थ में नहीं। मैं बात करता हूँ मानव-निर्मित नियमों और धर्मग्रंथों की व्यवस्था की और अक्सर किसी संस्थान की और उनके लिए निर्मित मंदिरों और चर्चों की इमारतों की और साथ ही इन सबके साथ चले आने वाले धार्मिक छल-छद्म की। बिना धर्म के भी और यहाँ तक कि ‘प्रेम ही ईश्वर है’ जैसे विश्वासों के बगैर भी लोगों के भीतर प्रेम होता है और दिलों में करुणा और संवेदनाएं होती हैं।

मेरा विश्वास है कि आध्यात्मिकता बहुत व्यक्तिगत बात है, सांस्थानिक नहीं। हर व्यक्ति अपने-अपने तरीके से आध्यात्मिक होता है। भले ही आप मंदिर या चर्च न जाएं, भले ही आप ईश्वर के अस्तित्व के बारे में स्पष्ट न हों तब भी अगर आप प्रेम पर विश्वास रखते हैं तो आध्यात्मिक भी हो सकते हैं। धर्म की कोई ज़रुरत नहीं है। मेरी नज़र में उसने भला करने से अधिक नुकसान पहुँचाया है। इसलिए उसका त्याग करना ही बेहतर है और हिन्दू, ईसाई, मुस्लिम आदि होने से बेहतर है साधारण इन्सान बने रहना।

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