अपराध और धर्म – ये इतने करीब क्यों हैं? 30 मई 2012

धर्म

कल मैंने कहा था कि सभी धर्म-ग्रन्थ हिंसा से भरे पड़े हैं और लिखा था कि मैं इस हिंसा का अनुमोदन नहीं कर सकता। हो सकता है कि जब धर्म-ग्रंथ लिखे गए थे तब समाज में भी बड़े पैमाने पर हिंसा मौजूद रही हो मगर आज हमें इसके विपरीत बात लोगों को समझानी होगी। दुर्भाग्य से आज मैं देखता हूँ कि न सिर्फ धर्म-ग्रन्थों में अपराधी मौजूद हैं बल्कि ये धर्म-ग्रंथ अपराधियों का समर्थन और निर्माण भी करते हैं। मैं यह नहीं कहता कि सभी धार्मिक व्यक्ति अपराधी हैं। बिलकुल नहीं! लेकिन मैंने हमेशा देखा, सुना और अनुभव किया है कि अधिकतर अपराधी अक्सर धार्मिक होते हैं।

बचपन में हमारे घर के पास ही कुछ लोग रहा करते थे, जो अक्सर जेल आते जाते रहते थे और पुलिस हर वक़्त उन पर नज़र रखती थी, क्योंकि वे गंभीर अपराधी थे। इसके बावजूद, जब भी वे बाहर होते, रोज़ मंदिर में उनसे बिना नांगा मुलाक़ात हो जाती थी। वहाँ वे तरह-तरह के कर्मकांड किया करते थे और प्रसाद बंटवाने का और भंडारा लगवाने का पुण्य काम किया करते थे। इसके अलावा वे अक्सर तीर्थयात्रा पर भी जाते रहते थे। आप उनके पास खड़े होकर उनके मुख से निकलती धर्मग्रंथों की सबसे पवित्र ऋचाएँ, स्तोत्र और सबसे विनीत प्रार्थनाएँ सुन सकते थे, जिनमें ईश्वर द्वारा संसार की उत्पत्ति का वर्णन होता था। लेकिन आप जानते होते थे कि वे कई तरह के अपराधों में लिप्त हैं।

मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ, जो अपने दादा के दादा की कहानियाँ सुनाते हुए बड़ा खुश और गौरवान्वित महसूस करता था। वह बताता था कि वह व्यक्ति यानी उसके पूर्वज डाकू थे। लेकिन वे धार्मिक डाकू थे। कल मैंने काली नामक एक देवी का ज़िक्र किया था और बताया था कि वह अपने गले में असुरों के सिरों की माला धारण करती है। तो उस व्यक्ति के पूर्वज इसी काली नामक देवी के भक्त थे। लोगों को लूटना ही का उनका धंधा था और अगर कोई प्रतिरोध करता था तो वे उसकी हत्या भी कर देते थे। लेकिन वे बहुत से धार्मिक कार्य भी किया करते थे और इस तरह अपनी कमाई का हिस्सा लोगों की 'सहायता करने' में भी खर्च करते थे। वे रोबिनहुड जैसे डाकू थे। इस तरह कभी-कभी हत्या करने वाले वे एक अच्छे, धार्मिक और पवित्र व्यक्ति थे।

'चंबल' नामक इलाका यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं है और पहले वहाँ बड़ी संख्या में डाकू रहा करते थे। उन इलाकों से होते हुए रात में निकलना खतरे से खाली नहीं था और लोग दिन में ही उधर से गुजरते थे, जब डाकुओं का खतरा थोड़ा कम हो जाता था। डाकुओं से संबन्धित सभी कहानियों में इस बात का उल्लेख अवश्य होता है कि सभी डाकू बहुत धार्मिक हुआ करते थे।

इस थीम (कथानक) पर मैंने बहुत सी फिल्में देख रखी हैं। आज भी आप ऐसी फिल्में देखते ही रहते हैं, जिनमें अक्सर खलनायकों को (बुरे व्यक्तियों को) धार्मिक व्यक्ति के रूप में प्रदर्शित किया जाता है। एक दिन वे चोरी करते हैं, लूट-पाट करते हैं, हत्याएँ करते हैं और दूसरे दिन किसी मंदिर में बैठकर पूजा-अर्चना करते हैं। एक बार मैंने वृन्दावन के एक मंदिर की कुछ पुरानी कहानियाँ बताते हुए उन मंदिरों से जुड़े हुए अपराधियों की चर्चा की थी। लेकिन यह कैसे हो सकता है? क्योंकि किताबों और कहानियों की तरह फिल्में भी समाज का आईना होती हैं और यह सच्चाई है कि धर्म अपराधियों को पनाह देता है।

मैं पुनः कहना चाहता हूँ कि हर धार्मिक व्यक्ति अपराधी नहीं होता। मैं पश्चिमी देशों के विषय में कुछ नहीं कह सकता कि वहाँ क्या हालत है। जैसे इटालियन और रशियन माफिया के धार्मिक होने या न होने के बारे में मैं निश्चित रूप से कुछ नहीं जानता। लेकिन अपनी संस्कृति में, अपने देश में मैं ऐसे नाटक, फिल्में और जीवित व्यक्तियों को देखते हुए ही बड़ा हुआ हूँ, जो धर्म और अपराध के नजदीकी संबंध को साफ-साफ दर्शाते हैं।

जैसा कि मैं पहले भी लिख चुका हूँ, मैं मानता हूँ कि धर्म अगर अपराधों में वृद्धि नहीं करता तो कम से कम उसे प्रोत्साहित तो करता ही है क्योंकि वह अपराधों के प्रायश्चित्त और पापों से मुक्ति की संभावना प्रस्तुत करता है। हिन्दू धर्म में तो आप बड़ा से बड़ा पाप, जैसे गोहत्या या ब्रह्महत्या, करके भी पापमुक्त हो सकते हैं। आपको सिर्फ किसी खास मंदिर में जाकर श्रद्धापूर्वक पूजा-अर्चना करनी है, मन हो तो पुजारी को बताना है, कुछ कर्मकांड, जिन्हें चाहें तो आप स्वयं भी कर सकते हैं, करने के लिए उसे थोड़े से रुपए देना है और फिर आप उस पाप से मुक्त हो जाते हैं। इतना करने के बाद आश्चर्यजनक रूप से आपका अन्तःकरण पूरी तरह निर्मल हो जाता है और चाहें तो अब आप कोई दूसरा अपराध कर सकते हैं! अब आपको अपने पिछले अपराध-बोध से मुक्त हो जाना चाहिए-बस कुछ कर्मकांड, थोड़ा सा खर्च और आप पूरी तरह पाप-मुक्त हो चुके हैं।

बात यह है कि कुछ लोग होते हैं, जो पेशेवर अपराधी होने के साथ ही धार्मिक भी होते हैं और कुछ लोग पेशेवर धार्मिक होने के अलावा अपराधी भी होते हैं। मैं नित्यानन्द, निर्मल बाबा, कुमार स्वामी, कृपालु, प्रकाशनन्द, आसाराम जैसे अनेक झूठे (फेक) गुरुओं की बात कर रहा हूँ, जिनके लिए धर्म न सिर्फ पैसा कमाने का धंधा है बल्कि वह अपनी प्रतिष्ठा के चलते, धर्म का अतिरिक्त उपयोग लोगों का शोषण करने, उनके साथ धोखाधड़ी और दुर्व्यवहार करने, यहाँ तक कि महिला भक्तों के साथ बलात्कार करने, में भी कर सकते हैं। वे धर्म की सहायता से आसानी के साथ अपराधी भी बन सकते हैं।

यह एक और कारण है, जिसके चलते मैं मानता हूँ कि धर्म संसार में व्याप्त अनगिनत बुराइयों की जड़ है।

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