धर्म परिवर्तित कर ईसाई बनी अमरीकी मूल की संत गैर कैथोलिक्स की मदद करने को तैयार नहीं – 8 नवंबर 2012

कुछ हफ्ते पहले मैंने सुना कि कैथोलिक चर्च के मुखिया, पोप ने घोषणा की है कि वे 7 नए संतों को औपचारिक रूप से दीक्षित करके संत की उपाधि प्रदान करेंगे। उस समय मैंने इस समाचार पर उतना ध्यान नहीं दिया था लेकिन फिर रमोना ने मुझे बताया कि इनमें से एक संत कुछ खास हैं: वह चौथी अमरीकी मूल निवासी है जिसे संत की उपाधि से विभूषित किया जाएगा। जी हाँ, वह कैनेडा की ईसाई आदिवासी महिला है जिसे सालों से लोग पूजते आए थे और अब अंततः उन्हें संत मान लिया गया है। हास्यास्पद बात लगती है, मगर धर्म ऐसी ही अजीबोगरीब दास्तानों से भरा पड़ा है।

संत गैदेरी देगाग्विता 1656 में मोहौक गाँव की मुखिया और रोमन कैथोलिक अल्गोंक्विन, जो स्वयं फ्रांसीसी मिशनरीज़ द्वारा दीक्षित की गई थीं, के यहाँ पैदा हुई थीं। लेकिन अपनी ईसाई माँ के कारण गैदेरी ईसाई नहीं बनी थीं। गाँव में फैले चेचक से उनके अभिभावकों की मृत्यु हो गई। वे बच तो गईं मगर उनके चेहरे पर चेचक के निशान पड़ गए और उनकी आँखों की रोशनी भी बुरी तरह प्रभावित हुई। उनके चाचा ने मोहौक गाँव की परंपरा के अनुसार उनका लालन-पालन किया। जब फ़्रांसीसियों ने मोहौक पर आक्रमण करके उन्हें पराजित कर दिया तो मोहौक के लोगों को फ़्रांसीसियों से संधि करने पर विवश होना पड़ा जिसके अनुसार जेसूइट मिशनरीज़ को उनके गाँवों में धर्म प्रचार करने की छूट दे दी गई। इस तरह ईसाई मिशनरी जबर्दस्ती अमरीकी मूलनिवासियों के इलाकों में घुसे और अपने संदेश का प्रचार-प्रसार करने लगे।

एक लड़की के रूप में गैदेरी देगाग्विता के भीतर ईसा मसीह, स्वर्ग आदि विषयक धार्मिक कथाओं में दिलचस्पी पैदा हो गई। उनके चाचा और गाँव के दूसरे लोग स्वाभाविक ही उनके ईसाई बनने का विरोध कर रहे थे इसलिए उसने एक मिशन में शरण ली जहां 24 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हुई।

अब इतने समय बाद इस युवा महिला को, जिन्हें मोहौक की लिली भी कहा जाता है, संत कैसे मान लिया गया और लोगों को क्यों उनकी पूजा-अर्चना करने की औपचारिक इजाज़त भी दे दी गई, यह प्रश्न उपस्थित होता है। इसके पीछे एक तर्क तो यही है कि वे बहुत धार्मिक महिला थीं: उन्होने जीवन भर कुंवारी रहने का प्रण लिया था, उन्होंने लोगों को ईसाई धर्म में दीक्षित होने के लिए प्रेरित किया और वे स्वपीड़न जैसे प्रयोगों की भी अभ्यस्त थीं। इस तरह की बातें वे और उनके कुछ मित्र किया करते थे जिनका उनके आसपास का पुरोहितवर्ग और दूसरे शक्तिशाली वर्ग विरोध किया करते थे। गैदेरी और उनके मित्र धर्म के रास्ते पर चलना चाहते थे और सोचते थे कि जेसूइट्स उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दे रहे हैं!! इसलिए वे काँटों के बिस्तर पर सोया करती थीं, खुद अपने आपको कोड़े मार-मारकर लहूलुहान कर लिया करती थीं और गरम कोयलों से अपने आपको जला लिया करती थीं।

लेकिन उनकी मृत्यु के पश्चात चमत्कार होना शुरू हो गए। उनका चेहरा चेचक के दागों से कुरूप हो चुका था मगर मृत्यु के वक़्त उनके पास रहे लोगों ने दावा किया कि मरने के तुरंत बाद दाग बिलकुल साफ हो गए। उनके सलाहकार, उनके दोस्त और उनके पादरी ने उनकी आत्मा के बारे में बताया कि मृत्यु के कई दिनों बाद भी उन्होंने उन्हें देखा और उनकी आवाज़ सुनी। फिर स्वाभाविक ही कई दूसरे लोगों ने भी यह दावा किया कि उनकी छोड़ी हुई वस्तुओं में बीमारियों को दूर करने की शक्ति है। और सबसे ताज़ा यह कि कैथोलिक चर्च भी अब सहमत हो गया है कि उन्हें संत की उपाधि से विभूषित किया जाए।

संत की पदवी प्रदान करने की ऐसी हास्यास्पद और अंधविश्वासों से परिपूर्ण प्रक्रियाओं के बारे में मैंने पिछले साल लिखा ही था और उसमें अतिरिक्त कुछ जोड़ने की ज़रूरत नहीं है मगर इस प्रकरण में मैं समझता हूँ कि मुझे कुछ बिन्दुओं पर और गहराई और विस्तार से लिखना चाहिए।

गौर करने की बात यह है कि यह एक स्थानीय अमरीकी आदिवासी महिला का मामला है जिसे ईसाई बनाया गया था। कुछ लोग कहेंगे कि अमरीका के मूलनिवासियों का इतिहास इतना अधिक रक्तरंजित है कि वे इसे पसंद नहीं करते होंगे। विडम्बना देखिए कि पहले तो आप हजारों-लाखों की संख्या में हमारे लोगों की हत्या कर देते हैं और कई लोगों पर यह आरोप मढ़कर कि हम बर्बर और असभ्य हैं, अपने स्थानीय धर्मों को त्यागने के लिए मजबूर करते हैं और ज़बरदस्ती धर्मांतरण करवा लेते हैं और फिर उनमें से किसी एक महिला को संत बना देते हैं और उसकी पूजा करने लगते हैं। स्वाभाविक ही इस प्रतीकात्मक कार्यवाही से कुछ अमरीकी मूल के ईसाई प्रसन्न होंगे लेकिन मैं तो इसे बहुत ही बेतुकी कार्यवाही मानता हूँ, खासकर पोप द्वारा कहे ये शब्द तो पाखंड से भरे हुए हैं: ‘उनके जीवन से हमें जहां हम हैं वहीं रहने की और बिना अपनी पहचान खोए ईसा मसीह से प्रेम करते रहने की प्रेरणा प्राप्त हो।‘ भला बताइये, क्या ईसाई समाज आज भी उन्हें अपनी पहचान बनाए रखने की इजाज़त दे रहा है?

अगर आप कैनेडा के ईसाई मिशनरीज़ का इतिहास पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि वे महिलाएं हमेशा उन्हें दीक्षित करने वाले पादरियों की बात नहीं माना करती थीं। अति उत्साह में वे कुछ ज़्यादा करने का प्रयास करती थीं और बिना चर्च की अनुमति लिए अपने मठ (convents) बना लेती थीं। उन्हें इस पाप के बारे में बताया जाता था लेकिन खुद गैदेरी ऐसा किया करती थीं- जैसा कि यूरोप में मार्टिन ल्यूथर किया करते थे जब वे युवा सन्यासी थे। स्पष्ट है कि उन्होंने ईसा मसीह के विचार को गले लगाया था जिसका मूलमंत्र प्रेम था। लेकिन वे नए-नए ईसाई बने लोग ईसाई धर्म के पाप और सज़ाओं के पूरे विचारों के बारे में बहुत असपष्ट थे और उससे तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे। और यह ऐसा धर्म के कारण हो रहा था, इस प्रकरण में वह ईसाई धर्म था। जब दूसरों को आप उनकी प्राचीन संस्कृति और परम्पराओं से काटकर अपने धर्म में शामिल करते हैं तो यही होता है।

लेकिन मुझे जिस बात पर सबसे ज़्यादा आश्चर्य होता है वह है एक चमत्कार का आँखों देखा हाल जिसे, बताया गया कि संत गैदेरी द्वारा अंजाम दिया गया: जेसुइट्स ने एक प्रोटेस्टंट बच्चे के चेचक का इलाज किया। उन्होंने उससे कहा कि अगर वह रोमन कैथोलिक हो जाए तो वे इलाज में संत गैदेरी के सामान का इस्तेमाल करेंगे। जब वह तैयार हो गया तो, बताया जाता है कि उन्होंने उसके इलाज में उनके कफ़न के टुकड़े का इस्तेमाल किया! तो अब इस नए संत के बारे में क्या मतलब निकाला जाए? वह, जो खुद भी अपना धर्म बदलकर आई हुई स्त्री हैं, सिर्फ उन्हीं का इलाज करेंगी जो उनके उचित धर्म को मानने वाले होंगे। कितना अच्छा संदेश दूसरों को दिया जा रहा है, खासकर अमरीकी आदिवासियों को, जो इस महिला को सिर्फ इसलिए पूजने जाते कि वे उनकी अपनी हैं और उनके पास ऐसे इलाज की दैवी क्षमता है। लेकिन कैथोलिक चर्च नहीं चाहता कि इस उपचार का लाभ दूसरे धर्म को मानने वाले भी उठाएँ! वे चाहते हैं, ज़्यादा से ज़्यादा लोग उनके धर्म को मानने लगें जिससे आप बीमार पड़ें तो आपका इलाज एक कैथोलिक संत द्वारा किया जाएगा, बशर्ते आप भी कैथोलिक हों!

कई लोग समझते हैं कि ईसाइयत हिन्दू धर्म से बहुत अधिक आधुनिक है क्योंकि उन्होंने रोमन्स और ग्रीक लोगों के असंख्य देवताओं से मुक्ति पा ली। ऐसी कहानियाँ दर्शाती हैं कि यहाँ भी वही बेहूदापन हैं और अब तो कैथोलिक चर्च के पास दिखाने के लिए एक स्थानीय अमरीकी आदिवासी संत भी है!

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