कृष्ण, मुहम्मद और ईसा मसीह एक गोल मेज़ के चारों ओर बैठे हुए हैं। ये वे नए कंप्यूटर-टेबल हैं जहां टेबल की सतह एक विशाल टच-स्क्रीन की तरह काम करती है। वह सारी दुनिया प्रदर्शित कर रहा है। वे तीनों उसकी तरफ देख रहे हैं और आप उन तीनों के चेहरों पर चिंता और बेबसी साफ-साफ देख सकते हैं।
मुहम्मद दूसरे दो लोगों के चेहरों की तरफ देखते हैं और धीमी आवाज़ में पूछते हैं: तो फिर?
कृष्ण सिर ऊपर उठाते हैं और उत्तर देते हैं: "जैसा मैं चाहता था, वैसा नहीं हो पाया!" वे अपने सामने प्रदर्शित ग्लोब पर उँगलियों से टैप करते हैं और उसे तब तक घुमाते रहते हैं जब तक कि भारतीय उपमहाद्वीप सामने नहीं आ जाता। एक लंबी टैप के बाद स्क्रीन पर एक के बाद एक अलग-अलग रंगीन दृश्य उभरने लगते हैं। नदी के किनारे औरत-मर्द हाथों की अंजुरी में नदी से पानी लेकर अपने सिर पर उंडेल रहे हैं और खुशी और परम आनंद में डूबे हुए से लग रहे हैं।
"यह बहुत बुरा नहीं लग रहा है!" कृष्ण की तरफ, जो स्पष्ट ही नदी किनारे वाले उस दृश्य को देखकर अप्रसन्न नज़र आ रहे थे, प्रश्नवाचक निगाहों से देखते हुए ईसा मसीह ने कहा। कुछ कहने के स्थान पर वे उस दृश्य के नीचे दर्ज टाइमलाइन पर टैप करते हैं। वे ऐरो को आगे ले जाते हैं, जो साल 2011 पर आकर रुक जाता है। अब जो दृश्य आप देखते हैं, वह लगभग वही पुराना दृश्य होता है मगर नदी का पानी बहुत काला हो गया है और आसपास कुछ ज़्यादा लोग मौजूद हैं। "मैंने इस कर्मकांड को लागू किया था कि लोग प्रकृति की पूजा करेंगे, कि उससे उन्हें नदियों और जंगलों को साफ-सुथरा रखने और दुनिया को आदर की दृष्टि से देखने की प्रेरणा प्राप्त होगी। लेकिन वे कर क्या रहे हैं? उन्होंने इस कर्मकांड को खाली खोल में तब्दील कर दिया है। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं रह गया है कि मैं उनसे क्या करने की अपेक्षा रखता था। अब वे दूध को नदियों में बहा देते हैं, जिससे नदियों का पानी प्रदूषित ही होता है (क्योंकि पूजा में चढ़ाने वाला दूध सिंथेटिक होता है)! वे सारा कूड़ा-करकट नदियों में फेंकते रहते हैं और फिर उसी नदी में डुबकियाँ लगाकर सोचते हैं कि यह पवित्र स्नान है। दूसरी तरफ ठीक उनके सामने बच्चे भूख से मर रहे हैं! और वे सारे गुरु आजकल दूसरों को प्रेम और शांति के बारे में कुछ नहीं बताते बल्कि उनके साथ धोखेबाज़ी करके उनसे पैसा ऐंठते हैं और अमीर होते जाते हैं। उनके पास बड़ी मात्रा में सोना-चांदी इकट्ठा हो गया है और वे एक सिंहासन पर बैठकर प्रवचन करते हैं जबकि उनके भक्तगण, जिनके पास मुश्किल से अपने बच्चों का पेट भरने लायक पैसा होता है, उनके सामने दंडवत किए रहते हैं। पता नहीं हिन्दू धर्म को मानने वाले मेरे संदेश को कितना समझे हैं!" गहरी सांस भरते हुए वे टचस्क्रीन पर दोबार टैप करते हैं और अब आप पीले रंग से अपने चेहरों को पोते हुए लोगों को देख रहे हैं, जो उस मुश्किल से बह रही मटमैली नदी में बड़े-बड़े बर्तनों में रखा दूध उंडेलते चले जा रहे हैं जबकि पार्श्व में स्थित रेगिस्तानी इलाके के दृश्य में एक दुबला-पतला बच्चा दिखाई पड़ रहा है। यहाँ यह दृश्य समाप्त हो जाता है और वे फिर से पृथ्वी को देखने लगते हैं।
ईसा मसीह अपना गला साफ़ करते हैं और कहते हैं: "चलिए, शायद इसे सुनकर आपको सुकून मिलेगा कि ईसाइयत का विकास भी कोई बड़े अच्छे तरीके से नहीं हुआ…।" वे अपनी उँगलियाँ स्क्रीन पर रकते हैं और ग्लोब को घुमाकर यूरोप को बीचोंबीच ले आते हैं। एक जूते की शक्ल के देश, इटली पर टैप करते हैं तो एक और दृश्य उपस्थित हो जाता है और तीनों महापुरुष स्क्रीन पर झुककर उसे गौर से देखने लगते हैं। सफ़ेद और लाल कपड़े पहने एक व्यक्ति अपने दोनों हाथ उठाए एक विशाल भीड़ के सामने खड़ा है। "वे इसे पोप या दैवी पिता कहते हैं।" सबके मुंह के किनारे फड़क उठते हैं और सब एक-दूसरे की तरफ सिर उठाकर देखते हैं। "जैसे ही मैंने दुनिया से कूच किया वे प्रेम का अनुसरण करना भूल गए, जैसा कि मैंने उन्हें सिखाया था, और उन्हें किसी का अनुसरण करने की आवश्यकता अनुभव होने लगी। अब आपके सामने यह आदमी खड़ा है और जो कुछ भी यह आदमी कहता है, करोड़ों लोग उस पर आँख मूँदकर विश्वास करते हैं!" कृष्ण की तरफ देखते हुए वे जोड़ते हैं: "आपके गुरुओं से ज़्यादा भिन्न नहीं है यह…" और तेज़ी के साथ स्क्रीन पर टैप करते हुए दृश्य बदल देते हैं।
एक के बाद दूसरा दृश्य दिखाई पड़ता है: एक के बाद एक लोग छोटी-छोटी आलमारियों की तरफ बढ़ते हैं, जहां एक लोहे की जाली के पीछे साधारण कपड़ों में एक व्यक्ति खड़ा है, जिसके साथ वे कुछ बात करते हैं, रोते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। फिर एक छोटे से लड़के के सामने खड़ा एक और आदमी दिखाई देता है, जिसके सिर के बाल मुंड़े हुए हैं। वह कमरे का दरवाजा बंद कर लेता है। अब वे अकेले हैं। "वे चर्च नाम की इस संस्था और उसके पुरोहित पर इतना विश्वास करने लगे हैं कि समझते हैं कि वे पापी हैं और उन्हें अपने पापों का सबके सामने स्वीकार करके उसका प्रायश्चित करना चाहिए। यहाँ तक कि वे अपने बच्चों को अच्छी बातें सीखने के लिए उस पुरोहित के पास भेजते हैं। दुर्भाग्य से कुछ पुरोहित उनके विश्वास का अनुचित लाभ उठाते हैं और इन छोटे-छोटे लड़के-लड़कियों के साथ दुराचार करते हैं!" टेबल स्क्रीन पर नज़र गड़ाए, दुखी होकर वे अपना सिर डुलाने लगते हैं। सिर मोड़कर मुहम्मद की तरफ देखते हुए, धीमी गति से वे घटनाक्रम को 500 साल और पीछे ले आते हैं। "और निश्चय ही मैं उन धर्म-युद्धों और जिहादों को नहीं भूल सकता! कैसी प्रलयंकारी तबाही थी वह!" स्क्रीन पर अब सामूहिक हत्याकांडों और क्रॉस उठाए, झंडे लहराती, घोड़ों पर फर्राटे के साथ दौड़ती सेनाओं के दृश्य उभर रहे हैं।
मुहम्मद उनकी ओर चिंता के साथ देखते हैं। "वह पुरानी बात है। यह मत सोचिए कि इस्लाम के साथ आज जो हो रहा है, उससे मैं खुश हूँ!" स्क्रीन टैप करने की अब उनकी बारी है और आप देखते हैं कि एक के पीछे एक तेज़ी के साथ उड़ते हुए दो हवाई जहाज़ सीधे दो गगनचुंबी इमारतों पर चढ़ आए हैं। दृश्य बदलता है और आप एक बड़ा सा भारीभरकम जैकेट पहने एक व्यक्ति को व्यस्त सब-वे में घूमता हुआ देखते हैं। वह एक छोटे से धागे को खींचता है और यूं लगता है जैसे बम धमाके से सारा कमरा ही उड़ गया हो। मुहम्मद चीखते हैं, "देखो, ये लोग मेरे नाम पर यह सब कर रहे हैं! हजारों लोग मारे जा रहे हैं! सिर्फ इतना ही नहीं, ये देखो, लोग अपनी औरतों के साथ क्या कर रहे हैं!" वे ग्लोब को मोड़ते हुए ईरान पर टैप करते हैं। दुख, संताप और अविश्वास में उनका सिर हिल रहा है और तीनों देख रहे हैं कि कैसे एक ज़िंदा महिला को सिर तक रेत में दफ्न किया जा रहा है और आसपास हाथों में पत्थर लिए मर्द खड़े देख रहे हैं।
इस बिन्दु पर कृष्ण आगे आते हैं, स्क्रीन बंद करते हैं और स्क्रीन की तरफ घूर-घूरकर देखते हैं। ईसा मसीह और मुहम्मद भी टेबल पर हाथ रखते हैं। अचानक उनकी उँगलियों के नीचे स्क्रीन झिलमिलाने लगता है और स्क्रीन पर जहां उनकी उँगलियाँ रखी हैं, एक के बाद एक दृश्य और चित्र उभरने लगते हैं। तीनों आश्चर्यचकित होकर देखते हैं कि कैसे लोग हंसी-मज़ाक कर रहे हैं, घास पर जानवरों के साथ खेल रहे हैं, कुछ दूसरे लोग गाँव जैसी जगहों में बच्चों को भोजन करा रहे हैं, कुछ लोग समुद्र किनारे दौड़ लगा रहे हैं, और कुछ लोग जंगल में जाकर पेड़ लगा रहे हैं।
मुहम्मद के चेहरे पर मुस्कान है और वे कहते हैं: "तो इसका एक और पहलू भी है। ये लोग प्रकृति के महत्व को समझने लगे हैं, उन्हें पेड़-पौधों और जानवरों की अहमियत का पता है।" ईसा मसीह जोड़ते हैं: "हाँ, वे एक-दूसरे से प्रेम करने लगे हैं और चाहते हैं कि दुनिया भर के विवाद, लड़ाई-झगड़े और युद्ध शांति पूर्वक, बातचीत द्वारा सुलझाए जाएँ।" थोड़ी चिंता के साथ कृष्ण कहते हैं: "इनमें से कुछ लोग बूढ़े हैं मगर ज़्यादातर युवक हैं और धर्म में उनकी कोई आस्था दिखाई नहीं दे रही है। लगता है, धर्म का महत्व धीरे-धीरे घटता जा रहा है।" कुछ देर तीनों उस ओर ध्यान से चुपचाप निस्तब्ध, निःशब्द देखते रहते हैं और फिर सोचते हैं कि उनके लिए इसका क्या अर्थ हो सकता है। क्या हमारा महत्व भी कम से कमतर होता चला जाएगा?
और तब कृष्ण अपने चिंतन से इस नतीजे पर पहुंचते हैं: "धर्म के बिना भी सब कुछ ठीक चलता रह सकता है। हिन्दू धर्म, ईसाइयत और इस्लाम भी तभी शुरू हुए थे जब हम धरती पर अवतरित हुए। अब हमें धर्म की आवश्यकता नहीं है।" मुहम्मद सहमति व्यक्त करते हैं: "हाँ, अगर धर्म के खात्मे से ये सारे युद्ध और दूसरी बुराइयाँ समाप्त हो जाएँ तो यह अच्छा ही होगा। लोग हमारी पूजा करें, यह बिल्कुल अनावश्यक है।" कृष्ण सहमति में सिर हिलाते हैं: "हम हमेशा वहाँ रहेंगे, उन सबमें, उन सभी पेड़ों में, जिन्हें वे सींचते हैं और हर पशु में, जिन्हें वे खाना खिलाते हैं।" और ईसा मसीह जोड़ते हैं: "अगर वे प्रेम और शांति के साथ रहें, खुश और स्वतंत्र रहें तो हमें खुशी होगी और हम उनकी हर हंसी में, उनके हर आलिंगन में और उनकी हर भाव-भंगिमाओं में मौजूद रहेंगे।"
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