श्रद्धा से नहीं, पैसे के लिए मंत्र-जाप और कीर्तन – 7 अप्रैल 2014

धर्म

हमारे स्कूल में चल रही बच्चों की नई भर्तियाँ पूरी हो चुकी हैं। हमने यह प्रक्रिया 1 अप्रैल से शुरू की थी और दूसरे ही दिन हमारे पास इतने बच्चे आ गए कि हमारी नई लोअर केजी की कक्षा और ऊंची कक्षाओं की कुछ अतिरिक्त सीटें भर गईं। उसके बाद हमें प्रतीक्षा सूची बनानी पड़ी और अभिभावकों से कहना पड़ा कि अब कोई जगह उपलब्ध नहीं है। पहले दिन से ही रमोना और पूर्णेंदु भर्ती के लिए आए नए बच्चों के परिवारों के रहन-सहन के स्तर और उनकी आर्थिक स्थिति की जानकारी लेने उनके घरों की तरफ निकल पड़े हैं। स्वाभाविक ही उन्हें रोज़ एक से एक रोचक अनुभव प्राप्त होते हैं, जिनमें से कुछ मैं आज और अगले कुछ दिनों तक आपके साथ साझा करता रहूँगा।

हमारे स्कूल के किसी भी बच्चे के अभिभावक ज़्यादा नहीं कमाते। वे किसी बड़े सरकारी ओहदे पर नहीं होते, अक्सर उनकी कोई नियमित और तयशुदा आमदनी नहीं होती और वे अपने मासिक खर्चों को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं। मज़ेदार बात यह है कि इसके लिए जो सबसे कड़ा संघर्ष कर रहे होते हैं वे मुख्य रूप से धार्मिक कामों में लगे हुए परिवार हैं!

जब उनसे पूछा जाता है कि वे अपने जीवन-यापन के लिए क्या करते हैं तो उनका उत्तर होता है कि वे आसपास के मंदिरों में पुजारी का काम करते हैं या यह कि वे कीर्तन करते हैं या मंत्र-जाप करते हैं। जो लोगों के घरों में जाकर धार्मिक कर्मकांड करवाते हैं या जो पुजारियों की मदद करते हैं, उनके लिए पूजा-सामग्रियाँ लेकर आते हैं, वे नहीं जानते कि उन्हें अगला काम कब उपलब्ध होगा। उनके लिए काम की उपलब्धता अनियमित है और खासकर इस शहर में ठीक यही काम करने वाले लोग हजारों की संख्या में हैं। वे यह काम सिर्फ इसलिए करते हैं कि वह बड़ा आसान होता है और अच्छा खासा चन्दा देने वाले तीर्थयात्री और धार्मिक लोग भी सहजता से उपलब्ध होते हैं। ऐसे धार्मिक लोग उपहार स्वरूप टीवी या फ्रिज भी दे देने में गुरेज नहीं करते, जैसा कि हमने कुछ घरों में देखा है।

जो लोग मंदिरों या आश्रमों में मन्त्र-जाप करके या कीर्तन करके पैसा कमाते हैं वे अक्सर नियमित कमाई कर पाते हैं। वे रोज़ नियमित रूप से, उदाहरण के लिए, सुबह सात से आठ बजे तक उसी मंदिर में या उसी आश्रम में जाकर भजन गाते हैं। रोज़ एक घंटे कीर्तन करने, भजन गाने या मंत्र-जाप करने पर वे लगभग 13 डॉलर यानी लगभग 800 रुपए प्रति माह कमा पाते हैं।

जब आप तीर्थयात्री या पर्यटक के रूप में हमारे शहर आएँ और मंदिर में बैठे लोगों को सारा दिन समर्पित भक्तिभाव से भजन गाते या ईश्वर की स्तुति करते हुए देखकर प्रभावित होने लगें तो एक मिनट रुकिए, अब आपको उसके पीछे छिपी वास्तविकता का पता चल गया है: भक्तिभाव नहीं, पैसा है इसके पीछे। जीविका कमाने की मजबूरी! अपने काम के प्रति वास्तविक प्रेम का पता आपको तब लगेगा जब इन लोगों द्वारा बेहद बेसुरी, नीरस और उबाऊ आवाज़ में गाए जाने वाले कीर्तन चिंघाड़ते लाउड-स्पीकरों के जरिये आपके कानों तक पहुंचेंगे।

किसी ने यह तर्क दिया कि यह तो अच्छी बात है कि धर्म के कारण उन्हें रोजगार मिला हुआ है। मुझे लगता है कि यह मानव-संसाधन का दुरुपयोग है। मैं जिन लोगों के बारे में बात कर रहा हूँ वे खासे हट्टे-कट्टे, वयस्क युवा हैं लेकिन इस देश के विकास में योगदान देने की जगह दिन भर भजन गाते हुए बैठे रहते हैं! इस तरह वे खुद अपने लिए भी कुछ नहीं करते! ऐसा करते हुए वे ध्यान नहीं कर रहे होते और न ही आंतरिक आत्मशांति पाते हैं-वे वहाँ सिर्फ बैठे रहते हैं क्योंकि उन्हें उसके थोड़े-बहुत पैसे मिल जाते हैं और यह पैसा कमाने का आसान जरिया है!

ऐसे बहुत से अभिभावक हैं जो पैसा कमाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, एक निर्माण स्थल से दूसरे तक ईंटें और सीमेंट ढोते हैं। दिन के आखिर में वे जैसे भवन का हिस्सा ही प्रतीत होने लगते हैं। धर्म उन दूसरे अभिभावकों को माइक्रोफोन पर गाते रहने को मजबूर करता है, अपनी कर्कश आवाज़ से आस-पड़ोस के लोगों को परेशान करता है और राह चलते पर्यटकों और श्रद्धालुओं को इस भ्रम में रखता है कि ये गाने वाले ईश्वर को समर्पित महान भक्त हैं।

नहीं, पहले ही मैं धर्म का विशेष प्रशंसक नहीं हूँ-और जब मैं यह सब सोचता हूँ तो धर्म के बारे में मेरे विचार और दृढ़ हो जाते हैं!

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