यूरोपियन सरकारों से अपील – शरणार्थियों की मदद करें लेकिन मजहब और मस्जिदों पर सख्त पाबंदी लगाएँ – 14 सितंबर 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

दो सप्ताह पहले मैंने शरणार्थियों की हृदयविदारक परिस्थिति का वर्णन किया था और यूरोपियन देशों द्वारा दिल खोलकर किए जा रहे उनके स्वागत पर अपनी प्रसन्नता व्यक्त की थी। हफ्ते भर बाद, पहले भारतीय अखबारों में पढ़ा और उसके बाद जर्मन ऑनलाइन समाचारों में देखा कि इन शरणार्थियों के लिए सऊदी अरब ने जर्मनी में 200 मस्जिदें बनवाने का प्रस्ताव रखा है। उसी आलेख में यह भी ज़िक्र किया गया था कि जर्मनी में आई एस के समर्थक पहले ही उन शरणार्थियों के साथ घुलने-मिलने की कोशिश कर रहे हैं, जो वहाँ अकेले आए हैं। इस बिंदु पर मैं यूरोपियन सरकारों से, और विशेष रूप से जर्मन सरकार से एक गुजारिश करना चाहता हूँ: धर्म को पैर पसारने का मौका कतई न दें। यह उनके लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों को यह थोड़ा अतिवादी या चरमपंथी विचार लग रहा होगा। लेकिन मैं यह भी जानता हूँ कि मेरी तरह बहुत से लोग इस विषय में चिंतित हैं हालांकि कहने में कतराते हैं क्योंकि वे क्रूर नहीं लगना चाहते, वे नहीं चाहते कि उन्हें भी चरम-दक्षिणपंथी विचारधारा का समर्थक समझ लिया जाए, वे नहीं चाहते कि उन्हें भी जातिवादियों के साथ एक ही टोकरी में रख दिया जाए। लेकिन वे चिंतित हैं, क्योंकि आई एस के समर्थकों की संख्या बढ़ती जा रही है-और उनमें से बहुत से लोग वास्तव में यूरोप के नागरिक ही हैं!

ऐसे बच्चे भी हैं, जो यूरोपियन माता-पिता की संतानें हैं, यूरोपियन मूल्यों के अनुसार और अक्सर ईसाई मूल्यों के अनुसार जिनका लालन-पालन हुआ है, इस्लाम की ओर आकृष्ट हो जाते हैं, चरमपंथी विचार अपना लेते हैं और अंततः देश छोड़कर एक ऐसे धर्म और ईश्वर की खातिर जिहाद के लिए निकल पड़ते हैं जो खुद उनके अभिभावकों के लिए भी पराया है। वे सीरिया और दूसरे युद्धग्रस्त देशों से, ठीक आतंकवादियों के गढ़ों के बीचोबीच, हाथों में बम के गोले लिए वीडियो मैसेज भेजते हैं कि वे उन शहरों और देशों को उड़ा देंगे, जहाँ रहकर वे बड़े हुए हैं!

लड़कों और लड़कियों को भर्ती किया जाता है, जबरदस्ती उनका मतपरिवर्तन करवाया जाता है और भयंकर धर्मयुद्ध में झोंक दिया जाता है। यूरोपियन परिवारों के किशोरों को, जिनकी कोई इस्लामी पृष्ठभूमि नहीं रही है, युवक-युवतियों को, जो पूरी तरह यूरोपीय जीवन में घुले-मिले नज़र आते हैं लेकिन, स्वाभाविक ही उन इलाकों में रहते हैं, जहाँ इस्लाम के मानने वालों का विशाल बहुमत है और जहाँ उस देश की भाषा कोई नहीं बोलता, जहाँ वे रह रहे हैं। बाद में वे खुद ही इन जिहादियों की भर्ती करने वाले बन जाते हैं और अपने दोस्तों को भी अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश करते हैं।

हमें सतर्क रहना होगा कि यह आतंकवाद न फैले। यह धार्मिक आतंकवाद है, इसकी जड़ में धर्म है। मैं जानता हूँ कि ऐसे विचार रखने वाला मैं अकेला व्यक्ति नहीं हूँ। हमें हर इंसान की मदद करनी चाहिए, हर एक की जान बचाने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए और यह संभव किया जाना चाहिए कि वे भी हमारे साथ मिल-जुलकर रह सकें-लेकिन हमें आतंकवाद के विस्तार के लिए ज़मीन मुहैया नहीं करानी चाहिए।

हम पहले ही इंग्लैंड के उन इलाकों के वीडिओज़ और फोटो देख चुके हैं, जहाँ इस्लाम के अनुयायी निवास करते हैं और अपने अलग नियमों का प्रचार करते हैं। इन इलाकों को वे देश के दूसरे इलाकों से काटकर रखने की कोशिश करते हैं जिससे अपना एक अलग क्षेत्र बनाकर वहाँ शरिया क़ानून लागू कर सकें। वे स्थानीय खुली संस्कृति को अपने अनुयायियों के लिए वर्जित करके अपने इलाके की महिलाओं पर दबाव डालते हैं कि उन्हें क्या पहनना चाहिए और कैसा व्यवहार करना चाहिए! मैं बिल्कुल नहीं चाहूँगा कि यूरोप के किसी इलाके में लोग शरिया क़ानून लागू करने का दावा करें!

आप जानते हैं कि सामान्य रूप से मैं धर्म का विरोधी हूँ और इसमें सभी धर्म शामिल हैं। मैं यह भी जानता हूँ कि जर्मनी में ज़्यादातर लोग बहुत धार्मिक नहीं हैं और जो हैं भी, वे ईसाइयत में विश्वास रखते हैं-वह धर्म, जिसके अनुयायी हाल-फिलहाल में इस बात के लिए नहीं जाने जाते कि दल बनाकर किसी विस्फोटक सामूहिक हिंसा में शामिल होते हों!

और ऐसी स्थिति में सऊदी अरब का इन देशों में मस्जिदें बनवाने का प्रस्ताव अत्यंत विडंबनापूर्ण और गंदा मज़ाक लगता है! खुद उसने और दूसरे मुस्लिम देशों ने, जो इस संकटग्रस्त इलाके के काफी करीब हैं, एक भी शरणार्थी को अपने यहाँ शरण नहीं दी है, जब कि ये शरणार्थी उनके स्वधर्मी भी हैं! वे अपने देश में शरण देकर उनकी मदद नहीं कर सकते-लेकिन जर्मनी में उनके लिए 200 मस्जिदें बनवा सकते हैं!? यह अत्यंत हास्यास्पद है और जब कि मैंने समाचारों में पढ़ा है कि जर्मन राजनीतिज्ञ पहले ही इसका विरोध कर रहे हैं, मुझे पूरी आशा है कि जर्मन सरकार का आधिकारिक उत्तर भी वैसा ही दो टूक होगा!

मस्जिदें तामीर करने के लिए जगह उपलब्ध कराने के किसी भी प्रयास का मैं विरोधी हूँ। इन मस्जिदों में उनके धर्मग्रन्थ पढ़ाने वाले इस्लामिक स्कूल होंगे-और पढ़ाया जाने वाले पाठ्यक्रम पर किसी का कोई अंकुश नहीं हो सकता! पुलिस कार्यवाहियों में न जाने कितनी बार सामने आया है कि इन जगहों में आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त लोगों को छिपाया जाता है। आतंकवादी हमलों के बाद कितनी ही बार हमने सुना है कि इन मस्जिदों में रहकर और इन स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करते हुए उनका वास्तविक लक्ष्य उसी देश के विरुद्ध काम करना था, जहाँ के वे नागरिक हैं और उन्हीं लोगों को नुकसान पहुँचाना था, जिनके साथ वे रहते हैं।

लेकिन फिर भी यह अपील सरकार से है, उन लोगों से है, जो इस विषय में कुछ कर सकते हैं, जनता और देश की सुरक्षा संबंधी निर्णय लेते हैं। दूसरे सभी लोगों का, सामान्य जनता का कर्तव्य यही है कि इंसानियत के नाते इन शरणार्थियों की ज़्यादा से ज़्यादा मदद करें। इसलिए इन लोगों की हर संभव मदद करें, जहाँ भी, जैसे भी संभव हो, जितना भी आपसे बन सके। खुद इंसान बनें और दूसरों के साथ भी इंसानियत का व्यवहार करें।

सिर्फ इस बात का खयाल रखें कि मजहब को अपने पैर पसारने का मौका न मिले।