नास्तिकता के साथ सहमति – ईश्वर एक विचार है लेकिन वह भावनाएं और प्रेम भी है- 8 जून 2012

धर्म

कल मैंने नास्तिकता का ज़िक्र किया था और कहा था कि वे भी उन्हीं बातों पर विश्वास करने वाले लोगों का एक समूह हैं। वे विश्वास करते हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है और वे इस बात को अधिकतर बड़ी नफरत के साथ कहते हैं, उन लोगों का मज़ाक उड़ाते हुए कि कोई व्यक्ति इतना मूर्ख कैसे हो सकता है कि ईश्वर पर विश्वास करे। आज मैं नास्तिकों के विश्वासों पर अपने कुछ विचार व्यक्त करना चाहूँगा।

सबसे पहली बात जो मैं कहना चाहता हूँ वह यह है कि नास्तिकों को चाहिए कि वे उनसे विपरीत विचार रखने वालों को बर्दाश्त करें। एक वक़्त था, जब लोगों को अन्य ईश्वर पर विश्वास रखने या किसी ईश्वर पर विश्वास न रखने के कारण प्रताड़ित किया जाता था। उस समय आप एक प्रताड़ित व्यक्ति हो सकते थे। इसलिए हममें से कोई भी नहीं चाहता कि ऐसा कोई वक़्त आए, जब किसी भी ईश्वर पर विश्वास करने वालों को प्रताड़ित किया जाए। मज़ाक उड़ाना ठीक है और मैं भी मानता हूँ कि कुछ धार्मिक विश्वास हैं, जिन्हें कोई भी पढ़ा-लिखा, समझदार व्यक्ति हास्यास्पद ही मानेगा। लेकिन आपको यह भी मानना होगा कि दूसरे उन पर विश्वास रखते हैं।

मैंने नास्तिकों को कहते सुना है कि ईश्वर महज एक विचार है। वह मानव मस्तिष्क की एक रचना है और एक कल्पना है, जिसका इसके अतिरिक्त कोई अस्तित्व नहीं है। मनुष्य पहले अस्तित्व में आया और फिर उसके मन में ईश्वर की रचना का विचार आया। साधारणतया मैं इस बात से सहमत हूँ और मुझे खुशी होती है कि कुछ लोग हैं, जो ऐसा कहते हैं। अधिकतर धर्मों में यह विश्वास किया जाता है कि ईश्वर ने मनुष्य की रचना की इसलिए मनुष्य से पहले और यहाँ तक कि इस पृथ्वी के अस्तित्व में आने से पहले भी वह था।

मैं इस बात को नहीं मानता और धर्म की इस बात को भी नहीं कि ईश्वर किसी मंदिर या मूर्ति में रहता है या कोई कर्मकांड करने पर वह आपकी मदद के लिए प्रकट होता है। जब आप इस ईश्वर को ऐसे कार्यों और ऐसी जगहों पर सीमित कर देते हैं तो भ्रष्टाचार शुरू होता है क्योंकि कोई न कोई उस जगह का मालिक होता है या ऐसा कोई व्यक्ति होगा, जो आपको ईश्वर के करीब पहुँचने की सेवाएँ देने का व्यापार करता हो। मेरी नज़र में किसी नाम, आकार, रंग या यरूशलम या वृन्दावन जैसे किसी स्थान से ईश्वर को जोड़ना आवश्यक नहीं है। इससे सिर्फ समस्याएँ पैदा होती हैं।

लेकिन मैं नास्तिकों से पूछना चाहता हूँ कि उस विचार के बारे में आप क्या कहेंगे, जो ईश्वर का निर्माण करता है। एक कल्पना? शायद। लेकिन भले ही वह एक कल्पना हो, अच्छी कल्पना करने में समस्या क्या है? यह अच्छी बात होगी अगर आप उसे विस्तार देकर दूसरों पर नियंत्रण स्थापित करने में उसका उपयोग नहीं करते और दूसरों को अपनी बात पर राज़ी करके उन्हें धोखा नहीं देते।

मैं मानता हूँ कि न सिर्फ वह एक कल्पना है बल्कि एक एहसास भी है, वह प्रेम है। और इसलिए मेरी नज़र में वह आपसे बहुत दूर नहीं है, किसी स्थान पर उसका निवास नहीं है, उसका कोई नाम नहीं है और ऐसा भी नहीं है कि वह किसी खास देश के लोगों के साथ ही रहना पसंद करता हो। नहीं, मेरी नज़र में वह बिकाऊ नहीं है और कर्मकांडों द्वारा प्रसन्न होने वाला या आपके पाप कर्मों पर क्रोधित हो जाने वाला भी नहीं है। वह ऐसी कोई चीज़ नहीं है, जिसके बारे में धर्मग्रंथ लिखे जाएँ या नियम-कायदे बनाए जाएँ।

एक विचार, एक एहसास, एक भावना। सिर्फ प्रेम।

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