महिलाओं पर अत्याचार, जातिप्रथा की स्थापना इत्यादि धर्म के अपराध हैं! 16 फरवरी 2012

वे सब, जो मुझे जानते हैं और नियमित रूप से मेरे ब्लॉग पढ़ते रहते हैं, जानते हैं कि मैं धार्मिक व्यक्ति नहीं हूँ बल्कि यह भी कि मैं धर्म-विरोधी हूँ। कभी-कभी लोग मुझसे कहते हैं कि 'धर्म-विरोधी' होने के कारण यह कहना कि धर्म में सब कुछ बुरा ही बुरा है, उसकी अच्छी बातों की ओर से मुंह मोड़ लेने जैसा है। मैं इस बात से असहमत हूँ और सोचता हूँ कि धर्म के प्रति अपने रवैये को एक ब्लॉग लिखकर स्पष्ट करूँ।

दरअसल, मैंने यह कभी नहीं कहा कि जनता की भलाई के लिए धर्म ने कभी कुछ नहीं किया। लेकिन मैं यह भी मानता हूँ कि धर्म ने बहुत सी नकारात्मक बातों के घटित होने की संभावना के लिए काफी स्थान रिक्त छोड़ दिया। एक ऑनलाइन चर्चा के दौरान मैंने अपने मित्रों से पूछा कि आखिर संगठित धर्म ने दुनिया को क्या प्रदान किया।

मेरा कहना था कि धर्म ने लोगों को विभाजित किया और उनके बीच परस्पर घृणा और वैमनस्य पैदा किया। उसने लोगों के साथ छल किया, और आज भी किए जा रहा है, और इस तरह धार्मिक नेता उन लोगों का शोषण करने में कामयाब होते रहे, जो उनके पास धर्म की दुहाई देते हुए मदद के लिए आते थे। धर्म ने लोगों को ईश्वर द्वारा दी जाने वाली कथित सजाओं से डरने के लिए मजबूर किया और यहाँ तक कि यह भी सिखाया कि महिलाएं पुरुषों से कमतर हैं। सबसे बुरी बात यह कि वे लोगों को मूर्ख बनाते रहे हैं और फिर प्रश्न पूछने की इजाज़त भी नहीं देते- जिससे वे आंख मूंदकर धर्मग्रंथों में लिखी हुई बातों और धर्म-प्रचारकों की शिक्षाओं पर यकीन करने पर मजबूर हो जाएँ। उसने जनविरोधी अत्याचारियों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए, जिससे वे दूसरों पर अपनी हुकूमत कायम कर सके और बिना किसी उत्तरदायित्व के अपनी मनमर्जी चलाने लगे।

स्वाभाविक ही धर्म की स्थापना इसके लिए नहीं की गई थी मगर वही हुआ और अब भी हो रहा है। इन सभी के प्रमाण विद्यमान हैं। इसकी शुरुआत धर्मग्रंथों से ही शुरू हो जाती है, जहाँ इन ग्रंथों को जानने वालों की शक्ति और समाज में महिलाओं की भूमिका और कर्तव्यों के बारे में आप एक से एक मूर्खतापूर्ण घोषणाएँ पढ़ते हैं। आप देख सकते हैं कि कई देशों में धर्म का इतना ज्यादा प्रभाव है कि महिलाओं के साथ निम्न कोटि के प्राणियों जैसा व्यवहार किया जाता है। स्वाभाविक ही सबसे पहले आपका ध्यान इस्लाम और उसमें महिलाओं की स्थिति की ओर चला जाता है। लेकिन वैसा दूसरी संस्कृतियों, धर्मों और दूसरे देशों में भी होता हुआ देखा जा सकता है! धर्म के ज़रिए पुरुषों ने वह शक्ति पाई कि वे महिलाओं पर अत्याचार कर सकें, उन्हें आदेश दे सकें कि वे कैसे रहें, कैसे वस्त्र धारण करें, सिर्फ पूजाघरों में ही नहीं बल्कि अपने घर में भी। यह धर्म के कारण ही हुआ कि आज भी कुछ देश ऐसे हैं, जहाँ औरतों पर कोड़े चलाए जाते हैं और पत्थर मार-मारकर उनकी हत्याएं की जाती हैं, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने विवाह से पहले यौन सम्बन्ध स्थापित कर लिए या पति के होते हुए या पति के मरने के बाद किसी दूसरे मर्द से यौन सम्बन्ध बना लिए। धर्म के कारण ही बहुत से देशों में मंदिरों की सबसे पवित्र मानी जाने वाली जगहों में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। धर्म के अनुसार भारत में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को न तो अपनी रसोई में प्रवेश की इजाज़त है और न ही परिवार के सदस्यों के साथ बैठकर भोजन करने की।

धर्म का एक और प्रभाव हमें जाति-प्रथा के रूप में देखने को मिलता है। इसका मूल हिन्दू धर्म और उसके धर्मग्रंथों में मौजूद है! धर्म ने उन लोगों को, जिन्होंने धर्मग्रन्थ लिखने का काम किया, यह अधिकार दिया कि वे अपने आप को ज्यादा से ज्यादा शक्तिशाली बना लें, अपने आपको समाज के सबसे ऊंचे पद पर स्थापित कर लें और कुछ दूसरों को इतना नीच घोषित कर दें कि कोई उन्हें छूने से भी गुरेज़ करे। इसके ज़रिए धर्म ने एक ‘अछूत’ जाति ही निर्मित कर डाली! धर्म ने समाज का ढांचा निर्मित किया, वहां तक तो ठीक है मगर हमें जो प्राप्त हुआ वह ऐसा घृणास्पद ढांचा है तो उसके बगैर ही हम ठीक हैं!

इसी तरह धर्म के सबसे ज्यादा धार्मिक लोगों को ऐसी शक्तियां प्रदान की गईं, जिससे न सिर्फ महिलाओं पर अत्याचार किए गए बल्कि बच्चों पर भी अत्याचार संभव हुआ। गुरुओं द्वारा बच्चों के शोषण की अनेकानेक कहानियां मौजूद हैं। लेकिन सिर्फ हिन्दू धर्म में ही ऐसा हो रहा हो, ऐसी बात नहीं है! कैथोलिक चर्चों में होने वाले लज्जाजनक घटनाओं, अनैतिक आचरणों पर गौर करें! आपको पता चलेगा कि अनगिनत बच्चे इन अत्याचारों के शिकार हुए हैं और आज भी होते रहते हैं। यह धर्म ही है, जिसने इन लोगों को इतनी शक्ति दी कि वे अपने आपको ईश्वर का रूप घोषित कर सके, जिससे किसी की उन पर किसी तरह का शक करने की हिम्मत ही न हो सके।

कुछ लोगों के लिए धर्म धन कमाने का औज़ार भी बना। बहुत से धार्मिक संस्थान और संगठन दौलतमंद हो गए। उनकी तिजोरियों और तहखानों में बड़ी मात्रा में सोना-चांदी भरा पड़ा है। मुझे बताया गया है कि वेटिकन भी किसी तरह अलग नहीं है। मुझे बताइए कि इतने सारे गुरु और स्वामी इतने धनाढ्य क्यों और कैसे हो जाते हैं, जबकि सामान्य लोगों को भर पेट खाना भी नसीब नहीं होता? लेकिन धर्मग्रंथों में आप पाएंगे कि जीवन को सुखमय बनाने के लिए, स्वर्ग या ईश्वर की प्राप्ति के लिए या मुक्ति पाने के लिए कई ऐसे कर्मकांड किए जाते हैं, जिनमें आपको सोना-चांदी और धन का दान करना होता है।

मेरी नज़र में लोगों को मूर्ख बनाकर उनका शोषण करने के लिए धर्म का उपयोग किया गया और आज भी किया जा रहा है। चाहे वह हिन्दू धर्म, इस्लाम, ईसाइयत या और कोई धर्म हो, लोग बड़ी श्रद्धा के साथ, प्रेमवश, ईश्वर की खोज में या मन की शांति के लिए धर्म के पास आते थे लेकिन धार्मिक नेता और उनकी संस्थाएं और उनके संगठन हमेशा ऐसे तरीके ढूँढ़ने में कामयाब हो जाते, जिनसे वे अपने पास आए भोले-भाले लोगों को मूर्ख बना सकें, उनके साथ धोखा कर सकें और उनका शोषण कर सकें। इस उद्देश्य से अपने हितों का ध्यान रखते हुए वे धर्मग्रंथों में अपनी मर्जी के मुताबिक परिवर्तन करने से भी नहीं हिचकते थे और लोगों पर उनका असीमित और निर्द्वन्द्व प्रभुत्व होता था और वह प्रभुत्व आज भी कायम है।

निश्चय ही धर्म लोगों को विषाक्त करने के लिए अस्तित्व में नहीं आया था मगर ऐतिहासिक तत्थ्य यही है कि लोगों पर उसका विषैला असर हुआ और आज भी हो रहा है। ऊपर लिखी मेरी बातों को लोग समझते हैं और कुछ और अधिक शिक्षित होकर और कुछ और जानकारियाँ प्राप्त करने के बाद वे गुरुओं, धार्मिक नेताओं और उनके संगठनों से विमुख हो जाते हैं। धर्म ने अपनी उपयोगिता और प्रासंगिकता खो दी है। उसका कोई भविष्य नहीं है, युवा पीढ़ी उसे त्याग रही है और मैं खुश हूँ कि वह धीरे-धीरे अपनी मृत्यु की ओर बढ़ रहा है।

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