धार्मिकों की एक जैसी मानसिकता: मैं ठीक हूँ, आप गलत हैं – 9 फरवरी 2015

शहर:
वृन्दावन
देश:
भारत

कल मैंने आपको अपने एक भूतपूर्व मित्र के बारे में बताया था, जो सोचता था कि मैं शुरू से ही नास्तिक रहा हूँ और धार्मिक व्यक्ति होने का महज नाटक करता रहा हूँ। अपने बारे में उसका यह विचार मुझे बड़ा दिलचस्प लगा और इसलिए आज मैं बहुत से लोगों में भीतर तक मौजूद इस धार्मिक अहंकार के बारे में लिखना चाहता हूँ, जिसे वे अकसर खुलकर अभिव्यक्त भी करते रहते हैं।

मैंने यह भी बताया था कि मेरा यह भूतपूर्व दोस्त स्वयं एक धार्मिक व्यक्ति है। लेकिन अपनी जगजाहिर धार्मिकता के बावजूद जब दूसरे वैसा ही व्यवहार कर रहे होते हैं तो उनके बारे में उसे शक होता है कि वे सिर्फ नाटक कर रहे हैं। लेकिन दूसरे धार्मिकों के बारे में ऐसा सोचने वाला वह अकेला नहीं है!

बहुत से लोगों की एक सामान्य धारणा होती है: ‘जो मैं कर रहा हूँ, वह सही है’ मगर जब वही बात दूसरे करें तो वे गलत कर रहे हैं, गलत उद्देश्यों के लिए कर रहे हैं, दिल लगाकर नहीं कर रहे हैं, आदि आदि। दूसरों के साथ अपने व्यवहार में वे बेहद नम्र दिखने की कोशिश करते हैं लेकिन जब आप उस नकाब के पीछे पहुँचते हैं तो आप जान जाते हैं कि वे बहुत घमंडी और उद्दंड हैं और सोचते हैं कि सिर्फ वही सबसे सच्चे धार्मिक हैं। कई अंधविश्वासु अपने गुरुओं, आध्यात्मिक उपदेशकों और अपने जीवन में आए ऐसे ही दूसरे आदर्श व्यक्तियों से इस विश्वास की पुष्टि प्राप्त करते हैं। वे बार-बार सुनते हैं कि वे सबसे बेहतर धार्मिक हैं, वे ही सच्चे आस्थावान हैं, वे ही पूरी तरह समर्पित ईश्वर-भक्त हैं।

लेकिन वे नहीं जान रहे होते कि उनके धर्मगुरु और धार्मिक नेता सीधे उनकी जेब पर डाका डाल रहे होते हैं।

विडम्बना यह कि वे हमेशा यह शिकायत भी करते हैं कि दूसरे धार्मिक लोग सिर्फ पैसे कमाने के लिए धर्म का सहारा ले रहे हैं। वे यह नहीं देख पाते कि पैसे का यह खेल दरअसल वे खुद ही खेलना चाह रहे हैं क्योंकि उनके लिए वह अत्यंत आवश्यक होता है। उन्हें पुरोहितों की आवश्यकता है, उन्हें उन लोगों की ज़रूरत है, जो उनके लिए विशालकाय मंदिर और दूसरे पूजास्थल निर्मित कर सकें। बिना पैसे के यह सब कैसे संभव हो सकता है?

चीजों को देखने का यह बड़ा संकीर्ण नज़रिया है: मैं सब कुछ ठीक कर रहा हूँ, मैं जिन लोगों को पूज रहा हूँ, वे भी ठीक हैं- बाकी सब ढोंगी, झूठे और धोखेबाज़ हैं। चाहे वे अपने ही धर्म के धंधेबाज हों, चाहे किसी दूसरे धर्म के! आप अपने ईश्वर से प्रेम करते हैं उसी तरह दूसरे धर्मों के लोग अपने ईश्वर से प्रेम करते हैं लेकिन आप उन्हें गलत कहते हैं। यहाँ तक कि आप उनके विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर देते हैं। उसने भी वही किया, जो आप कर रहे हैं, सिर्फ उसका तरीका अलग था।

इस परिदृश्य पर गंभीर नज़र दौड़ाने पर स्पष्ट हो जाता है कि वे सब एक ही भ्रमजाल में फँसे हुए हैं और या तो निकल नहीं पा रहे हैं या निकलना ही नहीं चाहते।