धर्म द्वारा भ्रमिभूत व्यक्ति अच्छा या बुरा कुछ भी कर सकता है – 26 नवंबर 2012

धर्म

मुझे लगता है कि जीवन में कभी न कभी हर व्यक्ति अपने धार्मिक विश्वासों के बारे में अवश्य पुनर्विचार करता है। जो किसी एक धर्म को मानने वाले हैं, सोचते हैं कि क्या उनका धर्म ठीक है या कोई दूसरा धर्म उन्हें ज़्यादा आकर्षक लगने लगा है। जो किसी धर्म में विश्वास नहीं करते वे सोचते हैं कि धर्म से दूर रहकर कहीं वे उसकी कुछ अच्छाइयों से वंचित तो नहीं हो रहे हैं। कुछ साधारण लोग यह सोचते रहते हैं कि धर्म ने आखिर उन्हें या मानवता को क्या दिया है। मैं यहाँ बताने की कोशिश करता हूँ कि क्यों मैं यह समझता हूँ कि धर्म अच्छी और बुरी दोनों बातों को हवा दे सकता है और यह भी कि क्यों आपको दोनों ही बातों पर भरोसा नहीं करना चाहिए।

यह तो बिल्कुल ज़ाहिर सी बात है कि धर्म ने बहुत सी क्रूरताएँ की हैं। धर्म के नाम पर युद्ध लड़े गए हैं, असहाय लोगों का जबर्दस्ती धर्म-परिवर्तन कराया गया है और विभिन्न धर्मों के आतंकवादी रोज़ ही सीधे सादे मासूम लोगों का खून बहा रहे हैं। धर्म यानी लोगों को किसी विश्वास में दीक्षित करना; जिससे वे उस विश्वास का आँख मूंदकर अनुसरण करें। इस तरह तो कोई भी बुरा और ताकतवर व्यक्ति या संस्था दूसरों को अपने काम पर और अपने विचारों पर विश्वास दिला सकते हैं और अपना अनुकरण करने के लिए मजबूर कर सकते हैं जिससे दोनों मिलकर वह बुरा काम कर सकें। आपको सोचने की ज़रूरत नहीं है, अपना दिमाग चलाने की ज़रूरत नहीं है। अपनी बुद्धि और भावनाएँ ताक पर रखिए और बस विश्वास कीजिए!

इसके विपरीत धर्म के कारण बहुत से लोगों ने बहुत अच्छे और महान कार्य किए हैं। उनके द्वारा किए जाने वाले बहुत से चैरिटी कार्य गरीबों को भोजन मुहैया कराते रहे हैं और गरीबों को उनके पैरों पर खड़ा करने की कोशिश की गई है। इसके अलावा और भी कई अच्छे कार्य भी धर्म के कारण ही संभव हुए है। धर्म ने लोगों को मज़लूमों की सहायता करने के लिए प्रोत्साहित किया और जो वाकई धर्म में आस्था रखते थे, सिर्फ इसलिए कि धर्मग्रंथों में ऐसा लिखा हुआ है, अच्छे कार्य करने की ओर प्रवृत्त हुए। इसलिए जब लोग मुझसे कहते हैं कि धर्म के चलते बहुत सी अच्छी बातें हुई हैं तो मैं उनसे सहमत होता हूँ और उनसे कहता हूँ, “बिल्कुल! यह सच है!” धर्म द्वारा प्रेरित होकर लोगों ने बहुत अधिक अच्छे कार्य किए- लेकिन इसी तरह बहुत से दूसरे लोग धर्म की प्रेरणा से ही बहुत अधिक बुरे कार्य करने की भी ओर प्रेरित हुए। धर्म से अच्छी बातें भी निकलीं और बुरी बातें भी और मैं मानता हूँ कि समस्या धर्म को अपने मतलब के लिए तोड़-मरोड़कर पेश करने वालों से है। समस्या यह समझने की भी है कि कालांतर में धर्म को मानने वाले बहुत गैरजिम्मेदार और मतलब-परस्त होते चले गए।

यह ऐसा ही था जैसे धर्म ने आपको नशेड़ी बना दिया और नशे में आप अच्छा या बुरा काम करते चले गए और तब आप जो भी काम करते उसकी अति कर देते। आप अपने आपे में नहीं रहे और दूसरे स्रोतों से आदेश प्राप्त करते रहे और उन आदेशों का पालन भी करते रहे। धर्म और धर्म-गुरुओं ने आत्मघाती बमबारों का विचार प्रस्तुत किया कि ऐसे लोग मरने के बाद स्वर्ग जाएंगे अगर वे दूसरे धर्मों के पर्याप्त लोगों का जीवन खत्म कर दें। धर्म ने ही लोगों से कहा कि अनाथालय बनवाएँ और बच्चों को भूख से मरने से बचाएं।

मुझे लगता है कि अच्छा यह होगा कि आप इन सब बातों से ज़रा हटकर अपने दिल में झाँकें। धर्मगुरुओं के आदेशों को कुछ देर के लिए दूर रखें और अपने दिमाग का इस्तेमाल करें और अपने दिल से सोचें, भावनाओं पर भरोसा करें। आपको पता चलेगा कि नैतिकता का स्रोत धर्म नहीं है बल्कि स्वयं आपका दिल है।

मुझे लगता है कि यह बेहतर विकल्प होगा अगर आप दूसरों के लिए आपके भीतर जागी संवेदना के चलते, उनके लिए कोई अच्छा कार्य करने की आवश्यकता अनुभव करते हुए, स्वतः ये कार्य करें। बिना किसी बाहरी दबाव के, आपकी अपनी भीतरी प्रेरणा और आवेग के चलते दूसरों की सेवा करें। और मुझे पूरा विश्वास है कि अगर लोग अपने आपको कुछ अधिक जिम्मेदार महसूस कर लें तो बिना धर्म के या धर्मग्रंथों के और बिना धर्मांधता के भी अच्छे काम किए जा सकते हैं और उन बुरे कामों को करने का या उनमें किसी तरह शामिल होने का तो प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता जो कि आज धर्म और धर्म के चलते किए जा रहे हैं।

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