बच्चों का मनोहारी खेल अगर धार्मिक वयस्कों द्वारा खेला जाए तो हास्यास्पद तमाशा लगता है- 19 सितम्बर 2013

कल मैंने आपको बताया था कि कैसे हम धर्म और उसके द्वारा स्फूर्त अंधविश्वासों से दूर रखते हुए अपरा का लालन-पालन कर रहे हैं। जब वह खिलौनों के साथ खेल रही होती है, मैं उसे खेलते हुए देखता हूँ और पाता हूँ कि उसके खेल धार्मिक लोगों की बहुत सी क्रियाओं से मेल खाते हैं। जब मैं इस बात पर गौर करता हूँ तो इनके बीच मौजूद अनोखे और दिलचस्प अंतर पर ध्यान केन्द्रित हो जाता है: जब अपरा ऐसा करती है तो वह बड़ा मनोहारी लगता है लेकिन जब कोई वयस्क वही बात करता है तो वह बेहूदा लगने लगता है!

इसका सबसे बड़ा उदाहरण तब मिलता है जब हमारी बेटी रुई के भरकर बनाए गए खिलौनों के साथ खेलती है। उनमें भालू, कुत्ते, बत्तखें और कई जानवर होते हैं और वे मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हैं। वह उनके साथ बात करती है, उनके साथ चलती-फिरती है और उन्हें सुलाती और खिलाती भी है। निर्जीव खिलौनों के साथ खेलती बच्ची की यह छवि मुझे हिंदुओं के उस व्यवहार की याद दिलाती है, जिसमें वे भगवान की मूर्तियों को तरह-तरह की खाने की वस्तुएँ अर्पित करते हैं।

यह बच्ची अभी कल्पना-लोक में विचर रही है, इस बच्ची की अवस्था अभी इतनी कम है कि वह कुछ भी कल्पना कर सकती है और इस तरह वह अपना जन्मदिन भी इन निर्जीव जानवरों के साथ मना लेती है और सोचती है कि उसने अपने कई दोस्तों के साथ जन्मदिन की पार्टी की है। वह उन्हें काल्पनिक केक खिलाती है या काजू के टुकड़े उनके मुंह के रखकर सोचती है कि उन्होंने काजू खा लिए, जबकि हर बार वह स्वयं ही सब कुछ चट करती रहती है। यह सब करते हुए वह बिल्कुल स्वाभाविक लगती है और मैं बताना चाहता हूँ कि वह पूरी निष्ठा, 100% निष्ठा, के साथ उन्हें खिलाती है। हम सब देखते रहते हैं और उसका यह भोलापन हमें बहुत रमणीय और आकर्षक लगता है।

जब धार्मिक लोग ऐसा करते हैं तब वास्तव में वे अपनी कल्पना का उपयोग नहीं करते। उनसे कहा गया है कि अपने भोजन को, खुद खाने से पहले, भगवान को भोग लगाओ और वे एक नीरस काम की तरह वैसा करते रहते हैं। शायद कुछ लोग पूरे भक्तिभाव के साथ ऐसा करते हों परन्तु अगर आप तटस्थ रहते हुए उन्हें ध्यान से देखें तो मुझे विश्वास है कि आपको भी उनकी हरकतें कुछ अजीब ही लगेगी: एक वयस्क, समझदार व्यक्ति नीचे झुककर एक मूर्ति को, जो अपरा के खिलौनों से ज़्यादा प्राणवान नहीं है, भोजन करा रहा है! मैं यह देखता हूँ और सोचता हूँ कि धर्म एक वयस्क व्यक्ति की भी क्या दशा कर सकता है!

बच्चा बड़ा होकर एक दिन जान जाता है कि उसके कठपुतलियों जैसे खिलौने वास्तविक नहीं हैं और उन्हें भोजन कराना आवश्यक नहीं है। उन्हें भूख नहीं लगती जबकि वास्तविक जानवर और बगीचे में उड़ते पक्षी खाने की तलाश में इधर-उधर भटकते रहते हैं क्योंकि ज़िंदा रहने के लिए भोजन अनिवार्य है। अब बच्चे ने यह जान लिया है।

इस तरह धर्म आपको उसी, दो साल के बच्चे की, मानसिक अवस्था में पहुंचा देता है, जिसके प्रभाव में आप एक मूर्ति को खाना खिलाने का नाटक करने लगते हैं और समझते हैं कि जो भोजन आप उसके सामने रखते हैं, वाकई वह उसे ग्रहण करता है? जबकि आप भी जानते होते हैं कि यह सच नहीं है!

मैं हमेशा कहता रहता हूँ कि बच्चे की तरह होना अच्छी बात है और मैं यह भी कहूँगा कि रचनात्मकता को अक्षुण्ण रखने के लिए अपनी कल्पनाशीलता को बनाए रखें और आसपास के लोगों से अलग सोचने का साहस दिखाएँ। लेकिन अपनी कल्पना का सकारात्मक उपयोग करने में और धर्म-ग्रन्थों और पोंगा-पंडितों के आदेश पर एक नीरस दैनिक अनुष्ठान करने में अंतर है। यह न सिर्फ हास्यास्पद है, बल्कि पूरी तरह मूर्खतापूर्ण और हानिकारक भी है।

जब एक बच्चा ऐसा करता है तो वह मनोहारी लगता है। अगर वही बात एक वयस्क करता है तो वह अजीबोगरीब और बेतुका लगता है। कई बार लगता है कि यह हँसकर टालने की बात नहीं है, शोक मनाने की बात है। यह धर्म की एक चाल है कि आपके मस्तिष्क को इतना सुन्न कर दिया जाए कि आप उसके आदेशों पर प्रश्न ही ना कर सकें, भले ही वह आदेश कितना भी मूर्खतापूर्ण क्यों न हो। आपसे कहा जा रहा है कि आप अपने दिमाग का दरवाजा बंद करके, जैसा कहा जा रहा है वैसा करते चले जाएँ।

यही अंतर है- अपरा अपनी बिल्लियों, भालुओं और चिड़ियों को भोजन कराती है क्योंकि उसे इस तरह खेलने में मज़ा आता है। धार्मिक लोग समझते हैं कि ऐसा न करना पाप है। अपरा का मस्तिष्क अभी विकास करेगा और एक दिन उसकी समझदारी उसे ऐसा करने से रोक देगी। लेकिन, धार्मिक लोग सदा के लिए अपने इस मतिभ्रम के साथ जीते रहेंगे।

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